भाषा एवं साहित्य समाज का दर्पण है : प्रो. डॉ. सरोज व्यास

हिमालिनी अंक जून 022 । राजस्थानी महिला जिनका विवाह सत्रह वर्ष की आयु में हुआ । दो सुपुत्रों का लालन–पालन करते सम्पूर्ण पारिवारिक जिम्मेदारी निभाते हुए निरंतर पढाई जारी रखी । हिंदी एवं संस्कृत–साहित्य में डबल एम.ए., बी.एड., एम.एड. के अलावा दर्शनशास्त्र में पीएच.डी. और शिक्षण क्षेत्र में अपनी विशेष पहचान बनाई । वर्ष १९९७ में जयपुर स्थित शिव बाल निकेतन स्कूल से बतौर शिक्षिका शुरुआत करने के बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा । डॉ. व्यास की छः पुस्तकें, दस से अधिक शोधपत्र, विभिन्न विषयों पर सैंकड़ों लेख एवं कविताएँ राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित हो चुकी हैं ्र शिक्षा एवं साहित्यिक सपÞmर में, प्रो. (डॉ.) सरोज व्यास ने शिक्षाविद्–लेखिका–कवियित्री एवं प्रेरक वक्ता के रूप में स्थापित किया हैं ।
वर्तमान में, डॉ. व्यास नई दिल्ली के गुरु गोबिंद सिंह इन्द्रप्रस्थ विश्वविद्यालय से सम्बद्ध फेयरफील्ड इंस्टिट्यूट ऑपÞm मैनेजमेंट एंड टेक्नोलाजी कालेज में बतौर प्रधानाचार्या–निदेशक जैसे प्रतिष्ठित पद पर अपनी सेवाएँ प्रदान कर रही हैं । मानवीय संवेदनाओं से ओतप्रोत व्यक्तित्व कारण अपने सहकर्मियों एवं विद्यार्थियों में डॉ. व्यास माँ एवं बहिन के रूप में अत्याधिक सम्मान पाती हैं । डॉ. सरोज अपनी इस सफल एवं सुखद जीवन यात्रा में पतिदेव डॉ. (अधिवक्ता) ओ.पी. व्यास को श्रेय देती हैं, जिनकी प्रेरणा एवं सहयोग ने ही उन्हें इस मकाम तक पहुँचाया है । पिछले दिनों वरिष्ठ पत्रकार–लेखक–हिमालिनी ब्यूरो प्रमुख– एस.एस.डोगरा ने प्रो. (डॉ.) सरोज व्यास से बातचीत की । आपके समक्ष प्रस्तुत है वार्ता के प्रमुख अंश ः
० वैवाहिक जीवन की शुरुआत के साथ पढाई के सपÞmर की बीती यादों पर प्रकाश डालें ?
१७ वर्ष की आयु में संस्कृति एवं भारतीय आदर्श मूल्यों के पोषक परिवार में विवाह उपरांत अध्ययन चुनौती नहीं था, अपितु सुखद अवसर था । हाँ अल्हड़ युवावस्था, घर–गृहस्थी एवं अध्ययन में सामंजस्य अवश्य कठिन रहा । मैं अक्सर पढ़ते–पढ़ते सो जाती थी और जब कभी परिजनों द्वारा पकड़ी जाती थी, तब बड़ी ही मासूमियत से झूठ बोल देती थी की ‘आँख बंद करके पुनरावृति कर रही थी’ । मेरी छोटी ननद अधिकांशत मेरे साथ ही रहती थी, एक दिन उसने पुस्तक को उलटा करके मेरे हाथ में दे दिया । मेरे बड़े देवर ने अचानक पूछा – दिखाइये आप क्या पढ़ रही है, मैं नींद मे थी उलटी पुस्तक उन्हें दिखाते हुये बोली – देख लीजिये । मेरी इस हरकत से सभी खिलखिलाकर हँस पड़े और मैं…
० शिक्षिका÷प्रधानाचार्या÷निदेशक जैसे पदों तक पहुँचने पर कैसा महसूस करती है ?
– ससुराल पक्ष के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुये, कहना चाहूंगी कि मुझे मिले अवसर प्रोत्साहन और सम्मान से अभिभूत हूँ ।
० हिंदी भाषा एवं साहित्य में अपने योगदान का उल्लेख कीजिये ?
– व्यक्तिगत और व्यावसायिक स्तर पर क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर हिन्दी भाषा में व्याख्यान÷भावों तथा विचारों की अभिव्यक्ति करते समय हिन्दी के प्रति अपने अनुराग को बनायें रखकर कर्तव्य निर्वहन करती हूँ ।
० उच्च शिक्षा में हिंदी भाषा की कितनी अहम भूमिका है ?
– भाषा कोई भी हो शिक्षा के प्रत्येक स्तर पर उसकी उपयोगिता एवं भूमिका रहती है ।
० आन‘लाइन एवं सोशल मीडिया द्वारा शिक्षा पर तुलनात्मक विचार व्यक्त कीजिये ?
– कक्षा–कक्ष में शिक्षक केवल विद्यार्थियों को शिक्षित करता है लेकिन ऑनलाइन शिक्षा में विद्यार्थी के साथ उसके परिजन भी सम्मिलित होते हैं । कक्षा–कक्ष में विद्यार्थियों की समान भागीदारी रहती है लेकिन ऑनलाइन शिक्षण में तकनीकी व्यवधान एवं अवसरवादिता के कारण विद्यार्थियों में अरुचि दिखायी देती हैं ।
० कक्षा–कक्ष शिक्षण में कक्षा प्रबंधन और अनुशासन की समस्या ऑनलाइन की अपेक्षा कम रहती है । किसी भी भाषा और साहित्य का समाज में क्या योगदान होता है ?
– भाषा एवं साहित्य समाज का दर्पण है, भावों एवं विचारों की अभिव्यक्ति और संचार का माध्यम है । सभ्यता, संस्कृति, इतिहास और ज्ञान का संग्रह एवं संकलन भाषा द्वारा ही संभव है ।
० क्या भावी पीढ़ी हिंदी भाषा से दूर होती जा रही ?
– हाँ भावी पीढ़ी हिन्दी भाषा से दूर हो रही है क्योंकि भारतीय संस्कृति पर पाश्चात्य संस्कृति हावी हो गई है । अभिभावक एवं अध्यापकों के मन में अकारण ही एक ग्रंथि बन गई कि अंग्रेजी ही विकास और प्रगति का मार्ग है इसलिए वह अपने बच्चों को अंग्रेजी भाषा के लिए प्रोत्साहित करते है ।
० हिंदी भाषा को लेकर अपने का‘लेज की कुछ महत्वपूर्ण उपलब्धियों के बारे में बताएँ ।
हिन्दी दिवस और पखवाड़े का आयोजन ।
साप्ताहिक समाचार पत्र में हिन्दी लेख ।
उच्च पदासीन अधिकारियों के हिन्दी में उद्बोधन ।
कविता एवं कहानी लेखन प्रतियोगिता का आयोजन ।
० भारतवर्ष में हिंदी भाषा की वर्तमान स्थिति पर अपने विचार भी व्यक्त कीजिये ।
– भारत में हिन्दी भाषा की स्थिति अत्यंत दयनीय है । उसका प्रमुख कारण भारतीय शिक्षा नीति, प्रबुद्ध भारतीयों की मानसिकता, पाश्चात्य संकृति के प्रति अनुराग एवं विषय विशेषज्ञों का अभाव है ।

