Wed. Jul 22nd, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

त्रिविवि हिन्दी विभागः विगत और वर्त्तमान

 

डा. श्वेता दीप्ति:भारातकी स्वतन्त्रता के साथ ही उसका प्रभाव नेपाल में भी पडÞा। विक्रम सं. २००७ में विगत १०४ वर्षसे चले आ रहे राणा शासन का अन्त हुआ। इसके बाद ही देश में विकास हेतु कुछ कदम परिचालित हुए, इसी के तहत वि. सं. २००९ में शिक्षा समिति का गठन किया गया। सरदार रुद्रराज पाण्डे की अध्यक्षता में ४६ सदस्यों का एक आयोग गठन किया गया और यह तय हुआ कि पाँच वर्षों के भीतर देश में एक राष्ट्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना की जाएगी। राजा त्रिभुवन की यह हार्दिक इच्छा थी कि ऐसा हो पर विभिन्न कारणवश यह परिकल्पना मर्ूत्त रूप नहीं ले पाई।

tu hindi magazine
त्रिविवि हिन्दी विभागः विगत और वर्त्तमान

उनके इस स्वप्न को साकार करने हेतु बडा महारानी कान्तिराज लक्ष्मी देवी ने वि. सं. २०१२, चैत्र महीने के १८ गते को त्रिभुवन विश्वविद्यालय योजना आयोग की घोषणा की जिसमें ८ सदस्य शामिल थे। इस आयोग ने त्रिभुवन विश्वविद्यालय सम्बन्धी पहले चरण का कार्य राजा त्रिभुवन के १२वें जन्मोत्सव पर शुरु किया। तत्पश्चात् ५३वें जन्मोत्सव पर स्नातकोत्तर की पढर्Þाई शुरु हर्ुइ। विश्वविद्यालय की स्थापना से पहले एस.एल.सी. बोर्ड और स्नातक तह की पर ीक्षा बिहार के पटना बोर्ड से संचालित होती थी। काठमान्डू स्थित त्रिचन्द कालेज भी पटना विश्वविद्यालय से ही सम्बन्धन प्राप्त था। प्रायः सभी शिक्षक भी भारतीय मूल के ही थे। तर्राई के सभी विद्यालयों में अध्ययन का माध्यम हिन्दी ही थी।

विश्वविद्यालय की स्थापना के साथ ही अन्य विभागों की ही तरह हिन्दी विभाग की भी स्थापना हर्ुइ। विराटनगर, राजविर ाज, जनकपुर, वीरगंज, नेपालगंज के अलावा काठमान्डू में स्नातक स्तर पर हिन्दी अध्ययन की व्यवस्था है। हिन्दी का अतीत इन महाविद्यालयों में भले ही संतोषजनक र हा हो किन्तु वर्त्तमान स्थिति दयनीय ही है। विद्यार्थियों की संख्या नगण्य है। शिक्षा का व्यवसायीकरण और रोजगारमूलक होने की वजह, शायद इसकी जडÞ में हो। क्योंकि ये मानना कि हिन्दी की ही ऐसी दशा है, गलत होगा। संस्कृत, इतिहास जैसे कई और भी विषय हैं जिनकी हालत अच्छी नहीं कही जा सकती। किन्तु हिन्दी के साथ पंचायती शासनकाल में सौतेला व्यवहार किया गया। शिक्षा का सारा कार्यभार सरकार की जिम्मेदारी हो गई और यहीं से हिन्दी का पतन भी शुरु हुआ। फिर भी हिन्दी की जडÞें आज भी नेपाल की मिट्टी को उर्वरा बना र ही है। र्सवसाधारण के लिए यह उनकी अपनी ही भाषा है।

यह भी पढें   सार्वजनिक छुट्टियों को कम करने के लिए एक अध्ययन कार्यदल गठित करने का निर्णय

नेपाल के शैक्षिक विकास में हिन्दी का योगदान भुलाया नहीं जा सकता है। नेपाली साहित्य के विकास में हिन्दी और हिन्दी साहित्य का अविस्मरणीय योगदान है। नेपाल में स्नातकोत्तर और अनुसंधान की व्यवस्था सिर्फकेन्द्रीय हिन्दी विभाग त्रिभुवन विश्वविद्यालय में है। हिन्दी विभाग के प्रथम विभागाध्यक्ष डा. कामेश्वर शर्मा थे, आप भारतीय थे और आपकी नियुक्ति कोलोम्बो योजना के अर्न्तर्गत की गई थी। तत्पश्चात् स्व. प्रा. डा. कृष्णचन्द्र मिश्र ने विभागाध्यक्ष का कार्यभार सम्भाला। हिन्दी भाषा और हिन्दी विभाग के प्रति इनका लगाव और योगदान अविस्मरणीय है। वर्त्तमान में हिन्दी विभाग की विभागाध्यक्षा प्रा. डा. उषा ठाकुर हैं और आप हिन्दी विभाग को उत्कृष्टता प्रदान कर ने के लिए सतत प्रयत्नशील हैं। स्नातकोत्तर अध्ययन द्विवषर्ीय शिक्षा प्रणाली पर आधारित है किन्तु भविष्य में सेमेस्टर प्रणाली लागू होने की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। स् नातकोत्तर पाठ्यक्रम स्तरीय है और छात्रों को उपयोगी शिक्षा देने में सक्षम है।

यह भी पढें   आज का मौसम

हिन्दी साहित्य, संस्कृत साहित्य, भारतीय एवं पाश्चात्य काव्यशास्त्र, भाषाविज्ञान, अनुवाद, शोधप्रविधि और पत्रकारिता जैसी उपयोगी विधाओं का र्सवांगीण अध्ययन हिन्दी विभाग के द्वारा संचालित किया जाता है। विभाग में छात्रों की संख्या कम होने के बावजूद शिक्षक हतोत्साहित नहीं हैं। समय परिवर्तनशील है और आने वाला समय हितकर होगा यह उम्मीद है। पिछले तीन-चार वर्षों में हिन्दी के प्रति रुचि बढÞी है और यही वजह है कि छात्रों की संख्या भी बढÞ रही है। वर्त्तमान में पन्द्रह से बीस छात्रों की संख्या है। त्रिविवि हिन्दी विभागः विगत और वर्त्तमान डा. श्वेता दीप्ति @ हिमालिनी l जनवरी/२०१४ ज्ञठ आप जितनी अधिक दूसरों की भलाई करते हैं, उतनी ही स्वयं अपनी भलाई करते हैं। विभाग का अपना एक अलग पुस्तकालय है। छात्र इसका उपयोग करते हैं, जो पुस्तकें अनुपलब्ध हैं उनके लिए भारतीय पुस्तकालय और केन्द्रीय पुस्तकालय का सहयोग लेते हैं। आवश्यक पुस्तक समय-समय पर भारतीय राजदूतावास के द्वारा भी उपलब्ध करायी जाती हैं। हिन्दी विभाग के द्वारा विभाग की अपनी पत्रिका ‘साहित्यलोक’ का प्रकाशन होता है जिसके प्रकाशन हेतु आर्थिक मदद भारतीय दूतावास के द्वारा प्राप्त होती है।

इतना ही नहीं पिछले दो वर्षों में हिन्दी अध्येता छात्रों के लिए प्रोत्साहन राशि भार तीय दूतावास ने प्रदान किया है और विभाग आशान्वित है कि, यह क्रम भविष्य में भी जारी रहेगा। नेपाल में हिन्दी अनुसंधान के लिए विस् तृत संभावनाएँ हैं, किन्तु संसाधनों की कमी और विश्वविद्यालय की उपेक्षा ने इसमें जटिलता पैदा कर दी है। हिन्दी के प्रति दुर ाग्रह की भावना ने इसके विकास की राहों में रोडÞे अटकाए हुए हैं। हिन्दी अनुसंधाताओं के लिए यहाँ व्यापक क्षेत्र है जिनका लाभ लिया जा सकता है। उम्मीद है भविष्य में इसकी राहें प्रशस्त होंगी। नेपाल में हिन्दी के कई विद्वावान हैं जिनमें से कई हिन्दी विभाग से जुडÞे हुए हैं और इन्होंने हिन्दी भाषा का प्रतिनिधित्व विदेशों में किया है। स् व. प्रा. डा. कृष्णचन्द्र मिश्र, डा. रामदयाल र ाकेश, प्रा. डा. उषा ठाकुर, प्रा. डा. र्सर्ूयनाथ गोप और उप प्रा. उमानाथ शर्मा जैसेर् कई विद्वानों ने हिन्दी भाषा का नेपाल की ओर से विश्व स्तर पर प्रतिनिधित्व किया है। किन्तु विश्वविद्यालय में इनकी वरीयता और विद्वता की अवहेलना की गई और इन्हें उचित मान-सम्मान नहीं मिल पाया। यहाँ भी इन्हें विश्वद्यािलय की नीति का शिकार होना पडÞा। बावजूद इसके इनकी महत्ता कम नहीं होती। इनके अतिरिक्त भी नेपाली भूमि हिन्दी विद्वानों से भरी हर्ुइ है। नेपाली साहित्यकारों ने भी हिन्दी भाषा में अपना बहुमूल्य योगदान दिया है। सत्य तो ये है कि साहित्यकार किसी एक सीमा या भाषा से बँधा ही नहीं र ह सकता। उसकी सीमाएँ अनन्त होती हैं, उनका आकाश अनन्त होता है। काश ये अनन्तता हर दिल में आ जाय तो हिन्दी जैसी समृद्ध, सहज और भावपर्ूण्ा भाषा को उचित स्थान प्राप्त हो सके। आशा जीवन में संचार लाती है और आगे बढÞने का मार्ग प्रशस्त करती है। हिन्दी विभाग भी भविष्य के प्रति आशान्वित है। J

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *