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छठ : लोक जीवन से प्रत्यक्ष जुडा पर्व,” : बिम्मी कालिन्दी शर्मा



बिम्मी कालिन्दी शर्मा, बीरगंज, 30 ऑक्टोबर 022। सूर्य एक दृश्यमान ब्रह्मांड के प्रत्यक्ष देव हैं। यह सारी सृष्टि सूर्य के राप और ताप से चल रही है। इस पृथ्वी पर उगने वाले सभी भोज्य पदार्थ और पौधे सूर्य द्वारा ही पोषित होते हैं। जैसे एक नास्तिक भी सूर्य की गर्मी और उसके महत्व को नकार नहीं सकता है । जीवन तब तक है जब तक ईस पृथ्वी पर जल और आकाश में सूर्य देव अवस्थित है। छठ पर्व की एक विशेष विशेषता यह है कि यह सह-अस्तित्व सहजीवन के महत्व को पुख्ता करता है । एक ऐसे समय में.जब ईंसान अलग- अलग टापू में कैद जैसे हो गए है तब एक ही घाट पर एक साथ हजारों व्यक्ति एक ही देव का स्मरण करें और उनको अर्ध्य दे यह वास्तव में अदभुत है । और लोक-जीवन से जुडीउसी वास्तविकता का सम्मान करने के लिए ही छठ पर्व किया जाता है जिसके द्वारा ईस पृथ्वी का पोषण होता आ रहा है

खरना

छठ पर्व के लिए सभी नदियों और झीलों की सफाई की जाती है। छठ पर्व समरसता का लोक पर्व है जो ग्रामीण जीवन में आनंद के पलों का सृजन करता है। छठ एक ऐसा त्योहार है जो एक दूसरे के खेतों में उत्पादित उत्पादों को आपस में बांट कर और बाजार में बेचकर ग्रमीणों के चेहरों पर मुस्कान पैदा करता है। चाहे वह मूली हो, केला हो, बोडी(लोबिया) हो या फिर सुतनी। जो चीजें अन्य समय में अनावश्यक मानी जाती हैं उन्हें भी छठ पर्व में महत्व दिया जाता है। छठ पर्व जातिवाद की “महाव्याधि” से ऊपर उठकर सद्भाव और समरसता का संदेश देता है। यह पर्व अद्वितीय है।
तथाकथित चमार जाति द्वारा बनाई गई डाला, डगरी, सुपली और ढकीया ऐसी वस्तुएं हैं जो छठ पर अत्यावश्यक होती है । छठ के दिन ये तथाकथित चमार जाति के लोग भी व्रत रखते हैं और अपनी हैसियत के अनुसार खर्च करते हैं और उसी घाट पर अर्ध्य देते हैं जहां तथाकथित ऊंची जातियों लोग भी पूरे तामझाम के साथ अर्ध्य देते हैं. हमारी लोककथाओं में एक ही घाट पर एक बाघ और एक बकरी का पानी पीने की कथा वर्णित है । छठ के दिन बाघ और बकरी का एक ही घाट पर पानी पिने का दृश्य सचमुच जीवंत हो उठता है।जब एक ही घाट से अमीर,गरीब और कथित ऊँचे और निची जाति के लोग पदभेद और सारे मतभेद भुला कर एक ही साथ एक ही समय में अस्ताचलगामी सूर्य और उदित सूर्य को अर्ध्य देते हैं । उस समय ऐसा लगता है कि समय सचमुच थम गया है। ऐसा लगता है कि इस दृश्य के अलावा दुनिया में और कोई खूबसूरत दृश्य नहीं है। रोवां खड़े होने लगते हैं। ह्रदय भावबिभोर हो जाता है और आंखों में खुशी के आंसू आने लगते हैं। ऐसा लगता है कि हम इस दृश्य को निर्निमेष यूंही देखते रहें ।
छठ हमारे जैसे अहंकारी समाज के लिए एक महान पाठ भी पढ़ाता हैं, जो दलितों या अपने से निचे स्तर के लोगों को नीचा देखते है, और हेय ब्यवहार करते हैं । उनके लिए शाम को अस्त होते सूर्य को अर्ध्य दिए जाने से यह सबक मिलता है कि किसी ऐसे व्यक्ति को नीचा न देखें जो दिनहीन हो। सूरज की तरह जो आज शाम को डूबता है और कल सुबह उगता है, वह हेय ईंसान भी कल मजबूत होगा समय उसका भी बदलेगा जैसे आज ढलता हुआ सुरज कल पूरी उर्जा के साथ फिर उगता है । इसलिए ईस सृष्टि में पैदा हुए प्रत्येक प्राणी का महत्व है। किसी को दु:ख मत दो रुलाओ मत वह भी कल सूर्य कि तरह फिर से उदित होगा । वैसे तो देवी छठी मैया की पूजा मिट्टी की मूर्ति या टीला बनाकर की जाती है, लेकिन वास्तव में यह सूर्य पूजा का पर्व है।

खरना छठ

खेती की समाप्ति के बाद किसान फुर्सत में होते हैं इस छठ पर्व के बहाने वह आपस में जुड़ते हैं और न केवल अपनी खुशी या गम ही नहीं बांटते बल्कि अपने पास मौजूद सामग्री का भी आदान-प्रदान करके छठ पर्व पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं । सभी वर्त और त्यौहार में सबसे कठीन और भरपूर शुद्धता का व्रत छठ को माना गया है । और किसान इस लोक उत्सव को और एक दुहरे से जुड कर सह-जीवन से अधिक सार्थक बनाते हैं। यदि कुम्हार घडा, हाथी और ढकना नहीं बनाता, दलित कहे जाने वाले चमार बांस की वस्तुएं नहीं बनाते, तो यह त्योहार खत्म हो जाएगा और यह बिना सूरज के अंधेरी रात की तरह होगा जिसकी कोई सुबह नहीं होगी । परम्परा का नष्ट होने से समाज भी धिरे-धिरे विसर्जित हो जाता है इसलिए तो सृष्टि में प्रत्येक जाति का महत्व है । मुसलमानों ने भी.छठ पर्व कर के इस छठ पर्व की महिमा और भक्ति को बढ़ाने का नेक काम किया है।
दशहरा खत्म होते ही गाँव में बजने वाले छठी मैया के गाने न सिर्फ कान को पवित्र करते हैं बल्कि दिल भी शुद्धता से भर जाता हैं और आल्हादित होने लगता है । कार्तिक का महीना, जब ग्रीष्मकाल लगभग समाप्त हो जाता है और सर्दियों की शुरुआत के साथ सूर्य की किरणें नरम हो जाती हैं, वास्तव में मह हमय अद्भुत है, जहां सूर्य देव अपने ताप में नरमी ला कर और दिनों को छोटा करते हुए, छठ का उपवास करने वालों का साथ देते हुए प्रतीत होते हैं ।
मधेसी और बिहारी ग्रामीण समाज में, जिस दिन नव विवाहिता बेटी का ‘गौना’ भी छठ के पारण के दिन ही होता है। चूंकि इस दिन को शुभ माना जाता है और छठ का प्रसाद ठेकुवा के समान बेटी की विदागरी के लिए कोई अन्य शुद्ध और मीठा व्यंजन नहीं हो सकता । इसलिए छठ की अगली सुबह घाट में उगते सूरज को अर्ध्य दे कर छठीमाई की पूजा की जाती है और घर में बेटी की गौना कर के विदाई दी जाती है। उस दिन केवल छठ घाट ही नहीं, बल्कि घर भी बेटी की विदाई के कारण खाली-खाली और सूना हो जाता हैं ।
इसलिए छठ पर्व, जो आज भी अपने दिल में ग्रामिणता को समेटे हुए है, में मधेश और बिहार की वह अलौकिक सुगंध है जो इस त्योहार को लोक उत्सव बनाती है। छठ त्योहार की महिमा इस कारण भी है कि इसे स्थानीय रूप से उत्पादित वस्तुओं का उपयोग प्रसाद के रुप में करके मनाया जाता है । जब तक सूर्य और पृथ्वी का संबंध है, इन दोनों के बीच रहने वाला मनुष्य इस छठ पर्व को मनाता रहेगा और इस पृथ्वी की सुंदरता को सार्थक बनाने के लिए ईस पर्व को मनाते ही रहना चाहिए ताकि मानवता अक्षुण रह सके और यह धरा ईंसानों के रहने लायक बना रहे । ?
जय सूर्यदेव ??
जय छठीमैया ??



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