Mon. Jun 17th, 2024

वर्तमान परिदृश्य में, संसदीय राजनीति में पदों के लिए सौदेबाजी को खुले तौर पर अधिक प्रभावी माना जाता है । इसने न केवल दलगत राजनीति में देखे जाने वाले सत्ता के अत्यधिक भूखे लोगों को प्रोत्साहित किया है, वल्कि राजनीतिक आचरण, सिद्धांतों और सत्यनिष्ठा के विषय को घिनौना और शर्मनाक भी बना दिया है



 

नेपाल के हर राजनीतिक आंदोलनों और बदलाव पर नजर डालें तो युवाओं की भूमिका सबसे अग्रणी दिखाई पड़ेगी । आंदोलन को संचालित करना, व्यवस्थापन तथा नियंत्रण का जिम्मा लेने के साथ ही वृद्ध नेताओं के सुरक्षा का जिम्मेवारी जैसे जटिल कार्यों को युवा लोग अपनी कंधो पर ढोते रहें हैं । विश्व के सभी राजनीतिक परिवर्तन और क्रांति को सफलता के अंजाम तक पहुंचाने में वे लोग एक योद्धा की भांति अपनी जवानी और जीवन दोनों को दांव पर लगाते रहे हैं । जबकि वही बूढ़े नेता लोग जिनकी बैशाखी युवा लोग होते हैं; हरेक आंदोलन की सफलता के बाद चुनाव में सफलता लाने के लिए फिर से युवा शक्तियों का इस्तेमाल करना शुरु कर देते हैं । और अपने–अपने कुटुंबो, नाते–रिश्तेदारों, पैसेवालों, व्यापारियों तथा उद्योगपतियों के हाथों राजनीतिक मूल्य, आदर्श, अवसर और सत्ता को बेचना शुरू कर देते हैं । नेपाल में आज से १७ वर्ष पहले तक जो माओवादी खूनी जनयुद्ध चल रहा था; वह इसका ज्वलंत उदाहरण है ।

 

अपना जीवन उत्सर्ग करने वाले लड़ाकू आज खाड़ी देशों में परिवार को बचाने के लिए जी तोड़ परिश्रम करने को बाध्य हैं । तो वही दूसरी ओर बूढ़े नेतालोग अपनी कुर्सी को अपने हाथों में सुरक्षित रखने के लिए अपने बच्चों को भी राजनीतिक स्थायित्व प्रदान करने के लिए सारे कुकर्म करने को तैयार रहते हैं । मानवता के नाम पर संसार का सबसे निकृष्ट और पतित संस्कार यही है । जो अपनी सत्ता सुख के लिए अपनों के ही जीवन और भविष्य से खिलवाड़ करे । वह भी निर्लज्जता के हद पार कर के ।

सांसारिक जीवन में सत्ता का आकर्षण सभी प्रकार के सुखों, आकांक्षाओं और आकर्षणों से सर्वोपरि माना गया है । क्योंकि सत्तासीन होते हीं पूरी कायनात उसी के हुकÞ्म की गÞुलाम हो जाता है । घर से लेकर गली, मोहल्ला, गाँव, शहर, जिला, क्षेत्र, राज्य, देश अथवा विश्व ही क्यों न हो । आज के इंसानों ने वैज्ञानिक संसाधनों के बल पर धरती को पूर्ण रूप से अपने भोग की वस्तु बना लिया है । उसी धरती पर शासन करने के लिए इंसान ने अपने लिए राजनीति व्यवस्था का निर्माण किया है । इस अखंड पृथ्वी को खंड–खंड करने का श्रेय भी इसी सत्तासीन होने के भाव को जाता है । सामाजिक विकास के उच्चतम आयामों में जहां एक ओर विज्ञान सम्मत भौतिक समृद्धि आवश्यक है वहीं दूसरी ओर सद्भाव, प्रेम, सहिष्णुता, सहयोग, अपनत्व और सृजनशीलता का होना अति महत्वपूर्ण माना जाता है । भौतिक समृद्धि से भी अधिक हार्दिक और मानसिक समृद्धि की आवश्यकता है । हृदय में अगाध प्रेम, भाव में सौम्यता, विचार में सृजनशीलता, व्यवहार में कुशलता, संबंध में मधुरता और व्यवस्था में सामंजस्यता ही सामाजिक उत्थान तथा उच्चतम संस्कार और सभ्यता का द्योतक है । आज यह हमारे लिए एक यक्ष प्रश्न बनकर रह गया है ।

प्रकृति के आकर्षण तथा अस्तित्व रक्षण के स्वाभाविक नियम के कारण धरती पर मौजूद प्रत्येक प्राणी अपने वर्चस्व के लिए संघर्ष कर रहा है । फिर वो चाहे स्वयं प्रकृति हो, जीव–जंतु हो, पेड़–पौधे हो, जानवर हो या इंसान हो । परंतु आज के मानवों में यह जंग इस कदर बढ़ चुकी है कि अपना प्रभाव बनाये रखने के लिए वो किसी भी हद तक गिरने को तैयार हो जाता है । आज नेपाल की राजनीति में जो भी निम्नतम आचरण संभव हो सकता वह सब बड़े गौरव और निर्लज्जता के साथ हो रहा है । हम खुद भी विदेशियों के हाथों बिकने में प्रतिष्ठा अनुभव करते हैं । क्योंकि सत्ता में बने रहने के लिए शक्ति की आवश्यकता होती है और शक्ति का श्रोत संपत्ति है; जो अपनी इज्जत, इतिहास और गरिमा को बेचने पर विदेशियों से प्राप्त होता है । आज नेपाल के हर राजनीतिक दलों और शीर्षस्थ नेताओं का यही हाल है ।
राजनीति में विचार की महत्ता है । विचार आधारित आचरण की आवश्यकता है । आम जन, निर्वाचित प्रतिनिधियों, सांसदों, विधायकों व सत्ताधीशों से ईमानदार आचरण चाहते हैं । संविधान आदर्श राजनीति के वातावरण में बना था । राजनीति को लाभ का क्षेत्र नहीं वल्कि राष्ट्र और जनता के सेवक का क्षेत्र माना जाता था । विश्व पुरुष, भारतीय प्रधान मंत्री सम्माननीय नरेंद्र मोदी जी कहते हैं, ‘धन कमाना है तो, व्यापार करो । और सेवा करना है तो राजनीति करो ।” परंतु, नेपाली समाज में सबकुछ राजनीति से ही संभव है ।

यह भी पढें   निर्वाचन आयोग के आयुक्त में कृष्णमान प्रधान के नाम की सिफारिश

अब मूलभूत प्रश्न यह उठता है कि क्या राजनीति का मुख्य ध्येय सत्ता ही है ? क्या राजनीति का मुख्य लक्ष्य परिजनों को लाभ पहुंचाना ही है ? कदापि नहीं, राजनीति लोकमंगल का कर्मक्षेत्र है । कौटिल्य ने ‘अर्थशास्त्र’ में लिखा कि सर्वप्रथम राजा को चाहिए कि रानियों और पुत्रों, परिजनों से बचे । उन्होंने राजपुत्रों को केकड़े जैसा बताया है । डॉ. राममनोहर लोहिया यों ही वंशवाद के विरोधी नहीं थे । गांधी के राजनीतिक अधिष्ठान में परिजनों का अता–पता नहीं चलता था । तिलक, गोखले, सुभाष चंद्र बोस, विपिन चंद्रपाल, लोहिया, अंबेडकर, दीनदयाल उपाध्याय और एसए डांगे आदि भारत के महान राजनैतिक विभूतियों की राजनीति का लक्ष्य सत्ता या परिजन लाभ नहीं था, लेकिन सत्ता के बाद कांग्रेस का लक्ष्य एक परिवार की सत्ता हो गया । इस परिवार के विरुद्ध बोलना भारत विरोधी भी कहा गया । १९७५–७७ के बीच ‘इंदिरा इज इंडिया’ का नारा वरिष्ठ कांग्रेसजनों ने ही दिया था । यह परम गुलामी का द्योतक था और है । और आज इसका परिणाम भारतीय कांग्रेस को भुगतना पड़ रहा है । साथ ही इसका सीधा असर नेपाल के कांग्रेस, कम्युनिष्ट, माओवादी, मधेसवादी आदि पार्टियों मे सहजता से देखा जा सकता है । यह लोकतंत्र नहीं, नोटतंत्र का प्रभाव है । इनमे गांधी, लोहिया का क्षणिक मात्र भी प्रभाव नहीं पड़ा, जबकि विश्व के सभी लुटेरों और गद्दारों का गहरा प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है । संभवतः यह हमारी गलत शिक्षा और संस्कार का परिणाम है ।

जिस प्रकार एक व्यक्ति का विद्वान होना, संपन्न होना, शक्तिशाली होना और गौरवशाली होना हमारे लिए विकास और सम्मान का प्रतीक है । उसी प्रकार हमारा परिवार, वंश, संतान, हमारे बच्चें, इन सबका सामूहिक विकास, संरक्षण और संवर्धन होना वर्तमान के मानव सभ्यता के लिए स्वागत योग्य कदम है । वास्तव में परिवार एक ऐसी सशक्त संस्था का नाम है जिसके गोद में सृजन और प्रलय नृत्य करती है । जिसके आंगन में राम, कृष्ण और रावण, कंश ठुमक–ठुमक चलते हैं । जिसके पाकशाला के सामने आज के वैज्ञानिक मेडिकल विश्वविद्यालय बौने है । जिसके बुजुर्गो के सामने आधुनिक विश्वविख्यात नोबेल पुरस्कार विजेता विद्वान भी नाटे हैं । परिवार अपने आप में एक राष्ट्र था, विश्व था, सरकार था, राजनीतिक प्रणाली का उदगम था, सारे सिद्धांत और मर्यादा का श्रोत था । लेकिन हमने उसे भी आधुनिकता के नाम पर तोड़ डाला । अतः राष्ट्र भी एक विशाल परिवार ही है । जो राष्ट्र को परिवार मानते हैं, वे अपने कुटुम्बों और बाकी में भेद नहीं करते । राजनीति राष्ट्र नामक बड़े परिवार के समग्र वैभव और अभ्युदय के लिए तपस्या है । यह पुत्र–पुत्री या दामाद को लाभ पहुंचाने का सार्वजनिक उपक्रम नहीं है । राजनीति यश देती है, अधिकार और शक्ति देती है, लेकिन बदले में अनेक कर्तव्य भी देती है । संविधान में राष्ट्रपति, विधायकों, सांसदों, मंत्रिगणों, राज्यपालों व न्यायाधीशों के लिए शपथ का प्रारूप है । शपथ में कर्तव्य पालन में भय, पक्षपात, द्वेष और राग से दूर रहने के निर्देश हैं । परंतु लोभ और अज्ञान के कारण लोग भ्रष्टाचार मे लिप्त हो जाते हैं । ऐसे मे जीवन भर का आदर्श और त्याग भी दो कौड़ी का सावित हो जाता है । उदाहरण के लिए गिरिजा , प्रचंड, उपेन्द्र और महंत जी का परिवार मोह । कभी मधेस के मसीहा के रूप मे गौरव प्राप्त लोग आज कांग्रेस और कम्युनिष्ट के जूते चाट रहे हैं ।

यह भी पढें   जेठ ३२ से लेकर असार २ गते तक मध्य तथा पश्चिम तराई में अत्यधिक गर्मी की संभावना

वर्तमान के सभी प्राणियों में श्रेष्ठ मनुष्य अपनी समाज में अकेला नहीं, वरन् अन्य लोगों के साथ रहने के दौरान वह दूसरों को प्रभावित भी करता है और स्वयं भी दूसरों से प्रभावित होता रहता है । प्रभाव का अर्थ है–एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को अपनी इच्छानुसार बदलना या कार्य करने के लिए प्रेरित करना है । क्योंकि इसी प्रेरणा ने मनुष्य रूपी प्राणी को देवत्व का दिव्य ज्योति प्रदान किया है । वर्तमान में प्रभाव के दो रूप हैं– १. शक्ति और २. सत्ता । यदि एक व्यक्ति अपनी बात मनवाने में बल प्रयोग करता है अथवा बल प्रयोग करने की धमकी देता है तो वह शक्ति कहलाती है । जब शक्ति को वैधानिक स्वीकृति मिल जाती है तो उसे सत्ता कहते हैं । यही कारण है कि लोग सत्ता हथियाने के लिए अनेकों हथकंडो को अपनाते हैं । कर्म कुकर्म में भेद तक करना नहीं चाहते । कल उनका भी अंत हो जाएगा; इस पर ध्यान तक नहीं देना चाहते हैं । शायद इससे बड़ा मूढ़ता और पशुता और क्या हो सकता है !

परिवार का निर्माण हो अथवा सामाजिक समूह; इन सब के भीतर सामूहिक सुरक्षा का भाव अंतर्निहित था । अन्य जंगली जानवरों तथा आक्रांताओं से सशक्त रूप में सामना करने के प्राकृतिक उद्देश्य के कारण सामूहिक जीवन पद्धति का निर्माण हुआ था । परंतु आज वही मानव अपनों से ही असुरक्षित महसूस कर रहा है । आज के प्रत्येक संगठित समूह अथवा राजनीतिक पार्टी में सत्ता के तत्व मूल रूप से मौजूद रहते हैं । संगठित समूह में तीन प्रकार के व्यक्ति होते हैं ।

१. साधारण व्यक्ति, साधारण सदस्य,

२. वे व्यक्ति जिनके पास उत्तरदायित्व होता है और इसके साथ उनके पास सत्ता भी होती है जिसके माध्यम से वे अपने दायित्व का निर्वाह करते हैं,

३. प्रधान प्रशासक; सत्ता की दृष्टि से समूह की रचना इसी प्रकार की होती है; जिसमें ये तीनों तत्व पाए जाते हैं । सत्ता शक्ति के प्रयोग का संस्थात्मक अधिकार है, वह स्वयं शक्ति नहीं है । सत्ता का संबंध पद या प्रस्थिति से होता है जबकि शक्ति का व्यक्ति से । सत्ता सदैव संस्थाकृत होती है अतः विशिष्ट रूप से मूल्यवान समझी जाती है । सत्ता वैधानिक शक्ति है जिसका पालन व्यक्ति स्वेच्छा से परंतु संविधान तहत करता है । उदाहरणार्थ, प्राचार्य, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मेजर, आदि के अधिकार ‘सत्ता’ की श्रेणी में आएँगे, क्योंकि उन्हें जो अधिकार और शक्ति प्राप्त हैं, वह संविधान, नियमों, कानूनों, आदि के द्वारा प्राप्त है । यह केवल राजनीतिक क्षेत्र में ही नहीं, वरन् सामाजिक–आर्थिक जीवन में भी क्रियाशील रहती है । वास्तव में सत्ता शक्ति का संस्थागत रूप है । जिसका आज भरपूर दुरुपयोग किया जा रहा है । इसके द्वारा मानवता को शर्मशार किया जा रहा है । शिक्षा और संस्कार को बौना बनाया जा रहा है । अयोग्य, उद्दंड और निकम्मों को सत्तासीन कर मानवता के सामूहिक संहार का बहुमतिय योजना बनाया जा रहा है । और इस सब के पीछे विद्वान, उद्योगपति, व्यापारी, अधिकारी तथा वैज्ञानिकों की गौरवमय गाथा छुपा है ।

यह भी पढें   भारतीयाें के लिए लिमिट करेंसी पर काम किया जा रहा है : मुख्यमंत्री कार्की

ध्यान रहे ! राजनीति में जब मूल्यों, निष्ठा और त्याग के मूल्यों और मान्यताओं को लात मारी जाती है तब परिवार और समाज में स्वार्थ, षडयंत्र तथा अति–महत्वाकांक्षी प्रवृत्तियाँ उभरने लगती हैं । और इस तरह की प्रवृत्ति से पोषित चरित्र मानव समाज, देश और समग्र विश्व के लिए विध्वंसक सावित होता है । वे तत्काल व्यक्तिगत लाभ और सत्ता के लिए समाज और राष्ट्र को एक दीर्घकालिक, विनाशकारी, आत्मघाती गृहयुद्ध में फंसाने की कोशिश करते हैं । लोगों को लूटने और देश को बेचने की परंपरा से सुसंस्कृत हमारे कुछ नेता और दल पिछले कुछ वर्षों से इसे एक राजनीतिक संस्कृति के रूप में विकसित कर रहे हैं, जिस पर गंभीर होना आज हमारा प्रथम दायित्व बन गया है । बिना किसी पूर्वाग्रह के ऐसी शक्तियों का डटकर मुकाबला किए बिना हम सुरक्षित नहीं रह सकते हैं । यह आज का सामाजिक, राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक तथ्य है ।

वर्तमान परिदृश्य में, संसदीय राजनीति में पदों के लिए सौदेबाजी को खुले तौर पर अधिक प्रभावी माना जाता है । इसने न केवल दलगत राजनीति में देखे जाने वाले सत्ता के अत्यधिक भूखे लोगों को प्रोत्साहित किया है, वल्कि राजनीतिक आचरण, सिद्धांतों और सत्यनिष्ठा के विषय को घिनौना और शर्मनाक भी बना दिया है । इसलिए यहां नैतिक आदर्शों की बात करना असफलता के प्रतीक होता जा रहा है । इसलिए श्रेष्ठ शिष्टाचार वाले लोग भी अपनी शक्ति को बनाए रखने हेतु लोगों की निम्न–स्तरीय भावनाओं को पोषित करने के लिए मजबूर रहते हैं । एक सभ्य, संस्कारवान , प्राज्ञ तथा इमानदार व्यक्ति अपनी जीवन और प्रतिष्ठा बचाने के लिए दुष्टों के आगे मौन हो जाए तो उस देश और संस्कृति को कौन बचाएगा ? आज हम नेपालियों की हालत इससे भी निम्नतर है ।

एक राजनीतिक विचारधारा नैतिक आदर्शों, सिद्धांतों, मिथकों या सामाजिक आंदोलन, संस्था या एक बड़े समूह के प्रतीकों का एक समूह है । ये राजनीतिक विचारधाराएँ बताती हैं कि समाज को कैसे कार्य करना चाहिए, और एक निश्चित सामाजिक व्यवस्था के लिए एक राजनीतिक प्रारूप क्या होना चाहिए ? अब हमें देखना यह है कि हम नेपाली लोग अपनी जीवन यात्रा को कैसे व्यवस्थित करना पसंद करते हैं ! संसार मे अनेकों सिद्धांत है; और सब का कही न कही उपयोगिता भी है । वर्तमान में देखा जाए तो निम्न लिखित सभी सिद्धांतों को लात मारकर न समाजवाद न साम्यवाद; मिलिजुलीखाऊँवाद को अपना मौलिक सिद्धांत बना चुका है । यह लोकप्रिय सिद्धांत आज विश्वव्यापी प्रतिष्ठा को प्राप्त करने लगा है । अब पार्टी के कार्यकर्ता और नेता खुद को पार्टी का एक अंग कहना भी पसंद नहीं करते हैं । स्थानीय नेता कार्यकर्ता को भले ही शर्मिंदगी, अपमान, क्षोभ होता हो, आक्रोश और वगावत के भाव तूफान कि तरह झकझोरते हो । लेकिन सत्तालिप्सा से पीडि़त केन्द्रीय नेताओं के लिए यह, महज एक राजनीतक खेल भर मात्र रह गया है । चाहे कोई आर्थिक, भौतिक और अस्तित्वगत रूप से नष्ट ही क्यों न हो जाए । तत्काल हम किस वाद से अभिप्रेरित हैं ? यह जानना जरूरी है । आम जाना मानस मे उत्पन्न मायुशी, निराशा और जीवनांत तक दिख रहे लंबा अंधकारमय भविष्य को लेकर सब चिंतित दिख रहे हैं । यह सामूहिक क्षोभ किस पार्टी और व्यक्ति को ले डूबेगा यह कहना बहुत कठिन हो गया है ।

 



About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Loading...
%d bloggers like this: