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डॉ श्वेता दीप्ति, हिमालिनी, अंक मार्च 023। लगभग आठ दशक पूर्व तनहूँ के ग्रामीण बहुनपोखरा में एक साधारण परिवार में जन्मे रामचंद्र पौडेल को नेपाल के चौथे कार्यकाल के लिए राष्ट्रपति बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है । लंबी राजनीतिक विरासत रखने वाले पौडेल इससे पहले कई बार देश के कार्यकारी पद के लिए प्रतिस्पर्धा करने में सफल नहीं हुए । पौडेल एक ऐसे नेता हैं, जिन्होंने अपने पांच दशक लंबे राजनीतिक करियर में कई बार सभामुख और मंत्री के रूप में काम किया है । वि.सं.२००१ साल असोज २९ गते को मिलुंग बहुनपोखरा में पैदा हुए पौडेल के राजनीतिक सफर को समझने के लिए हमें साल वि.सं. २०१५ में वापस जाना होगा । पौडेल वि. सं.२०१५ से नेपाली कांग्रेस के सदस्य हैं । बचपन से ही राजनीति से जुड़े पौडेल ने अपने नेतृत्व में २०१६ में पोखरा में हिमालयन एसोसिएशन की स्थापना की थी । इसी तरह वि.सं.२०१८ में उन्होंने कांग्रेस द्वारा चलाई गई सशस्त्र क्रांति में सक्रिय रूप से भाग लिया ।

पौडेल ने अपनी स्कूली शिक्षा नंदिरात्रि हाई स्कूल में प्राप्त की । राजनीति में उनकी रुचि छात्रकाल से ही थी । नंदिरात्रि हाई स्कूल और रानीपोखरी हाई स्कूल में उन्होंने एक छात्र संघ की स्थापना की थी । २०१९ साल में जुद्धोदय हाइ स्कुल में विभिन्न २२ विद्यालयों के छात्रों का एकजुट कर उन्होंने स्वतन्त्र विद्यार्थी युनियन की मांग और उससे सम्बन्धित आन्दोलन का नेतृत्व किया था । पौडेल वर्ष ०२३ में सरस्वती कैम्पस के स्वतन्त्र विद्यार्थी युनियन के सभापति में निर्वाचित हुए । वर्ष ०२४ में पौडेल प्रजातान्त्रिक समाजवादी युवा संघ के संस्थापक सचिव बने । इसके साथ ही गण्डकी छात्र संघ के संस्थापक अध्यक्ष भी हुए । सक्रिय राजनीति की शुरुआत करने वाले पौडेल २०२७ में स्थापित नेपाल विद्यार्थी संघ के संस्थापक केंद्रीय सदस्य बने । एक मध्यमवर्गीय किसान परिवार में जन्मे, पौडेल ने नेपाली साहित्य और संस्कृत (शास्त्री) में त्रिभुवन विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर तक की पढ़ाई की है । पौडेल की पत्नी के साथ चार बेटियां और एक बेटा है ।

सामान्य कृषक परिवार में जन्म लेने वाले पौडेल के घर में राजनीतिक वातावरण था । उनके बचपन के दोस्त ८६ वर्षीय फणींद्रराज मिश्र कहते हैं कि, उनके पिता दुर्गा प्रसाद में भी राजनीतिक चेतना थी । पौडेल के करीबी लोगों का कहना है कि उनकी राजनीतिक यात्रा काफी संघर्षपूर्ण रही जहाँ उन्हें पारिवारिक स्तर पर आर्थिक परेशानियों का भी सामना करना पड़ा । १५ वर्ष की उम्र में राजनीति में सक्रिय पौडेल को वर्ष २०१८ से कई बार जेल जाना पड़ा । जिसे अगर जोड़ा जाए तो उन्होंने अपने जीवन के १५ वर्ष जेल में गुजारे हैं । इस तरह राजनीतिक जीवन में २०१८ से २०६२ तक करीब १५ वर्ष जेल में कैदी के रूप में उन्होंने अपना जीवन बिताया । उन्हें पहली बार २०१८ के भरतपुर काण्ड के विरोध करने पर हिरासत में लिया गया था । इसी तरह, कीर्तिपुर स्थित त्रिभुवन विश्वविद्यालय में झोडा काण्ड का विरोध कार्यक्रम करने पर उन्हें हिरासत में लिया गया और उन्हें २०२८ से २०३२ तक जेल में कैद रखा गया । पञ्चायती राजतन्त्र के विरुद्ध संघर्ष करने के क्रम में भी उन्हें बार–बार जेल की हवा खानी पड़ी ।

रामचन्द्र पौडेल की राजनीतिक यात्रा
प्रारम्भिक शिक्षा के बाद पौडेल अपनी उच्च शिक्षा के लिए पोखरा गए और उसके बाद काठमान्डू आ गए । पोखरा में उनका झुकाव कम्युनिष्ट की तरफ था किन्तु, वो कम्युनिष्ट पार्टी से स्वयं को आबद्ध नहीं कर पाए । पोखरा का तत्कालीन समय कम्युनिष्ट प्रभाव का था, शायद यही वजह रही होगी कि उनकी दिलचस्पी कम्युनिष्ट की तरफ हुई । किन्तु वो कम्युनिष्ट हो नहीं पाए । राजनीतिक यात्रा के शुरुआती दौर में उनका साथ वीपी कोइराला के साथ रहा । वर्ष २०२५ में विश्वेश्वरप्रसाद कोइराला सुन्दरीजल जेल से रिहा हुए थे उसी समय उनकी मुलाकात सेन्ट्रल जेल में रामचन्द्र पौडेल के साथ हुई थी । यह भी एक संयोग ही था कि उसी समय कोइराला की मुलाकात पौडेल के साथ ही कम्युनिष्ट नेता मनमोहन अधिकारी तथा शम्भुराम श्रेष्ठ से भी हुई थी । कोइराला और पौडेल के साथ की इस मुलाकात के बाद इनकी राजनीतिक सहयात्रा काफी लम्बे समय तक चली ।

पौडेल छोटी उम्र से ही शीर्ष नेताओं के बीच संघर्ष के दौरान कांग्रेस की राजनीति में समन्वयक और उदारवादी की भूमिका निभाते रहे हैं । वीपी कोइराला जिस समय बनारस में थे, तभी उनके और सुवर्ण शमशेर जी के बीच मतभेद हो गया था । उस समय पौडेल उनके बीच मध्यस्थता की थी यह बात पौडेल कई बार स्वयं कहते आए हैं । बाद में कई बार गिरिजाप्रसाद कोइराला और कृष्णप्रसाद भट्टराई के बीच भी हुए मतभेद को समाप्त करने में उन्होंने महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया था । पौडेल वर्ष २०३४में पहली बार नेपाली कांग्रेस के केन्द्रीय सदस्य के रूप में निर्वाचित हुए थे उसके बाद से वो निरन्तर केन्द्रीय समिति में रहे । कांग्रेस के उपसभापति बने और २०७२ में कार्यवाहक सभापति हुए और १३ वें महाधिवेशन में सभापति पद में शेरबहादुर देउवा के साथ पराजित हुए ।
पंचायत काल के अंत के बाद वर्ष ०४६ में प्रजातन्त्र की पुनःस्थापना के बाद पौडेल ०४८ के निर्वाचन में तनहुँ १ से संसद सदस्य के रूप में निर्वाचित हुए थे । उसके बाद की सरकार में स्थानीय विकासमन्त्री बने । दूसरी बार ०४९ में वो स्थानीय विकास तथा कृषि मन्त्री बने । ०५१ साल के मध्यावधि चुनाव में तनहुँ २ से सांसद निर्वाचित हुए । ०५१ में प्रतिनिधिसभा में सभामुख निर्वाचित हुए । पौडेल वर्ष ०५६ में तनहुँ २ से संसद सदस्य में तीसरी बार निर्वाचित हुए और वर्ष ०५७ में उपप्रधानमन्त्री, गृह तथा सञ्चारमन्त्री की महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी सम्भाली । वर्ष ०६२ में कांग्रेस के महामन्त्री बने ।
वर्ष ०६३ में शान्ति तथा पुनःर्निमाण मन्त्री बने । उसके बाद माओवादी शान्ति प्रक्रिया में आने के बाद वो शांति सचिवालय के संयोजक बने और वर्ष ०६४ में कांग्रेस के उप–सभापति बने ।
२०६४ चैत २८ गते को पहला संविधान सभा का निर्वाचन हुआ जिसमें वो चौथी बार तनहूँ २ से निर्वाचित हुए । वर्ष ०६५ में वो नेपाली कांग्रेस संसदीय दल के नेता में निर्वाचित हुए । वर्ष ०७० में सम्पन्न संविधान सभा के दूसरे निर्वाचन में तनहुँ २ से पाँचवी बार निर्वाचित हुए । किन्तु २०७४ साल के प्रतिनिधि सभा निर्वाचन में उन्हें पराजय का मुँह देखना पड़ा । विगत मंसिर में सम्पन्न निर्वाचन ने उनकी जीत के साथ छठी बार उनके लिए संसद का दरवाजा खोल दिया ।

१७ बार कोशिश रही प्रधानमन्त्री बनने की
नेपाल के प्रमुख कार्यकारी पद प्रधानमन्त्री पद के लिए पौडेल ने १७ बार प्रतिस्पर्धा की, बावजूद इसके वो सफल नहीं हो पाए । वर्ष २०६७ सावन में प्रधानमन्त्री के लिए हुए निर्वाचन में पौडेल कांग्रेस से उम्मीदवार थे । एमाले से झलनाथ खनाल और तत्कालीन एकीकृत माओवादी के पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचण्ड’ उम्मीदवार थे । इन तीनों के द्वारा संवैधानिक प्रावधान के अनुसार मतसंख्या हासिल नहीं करने पर सात बार इनके बीच प्रतिस्पर्धा हुई । किन्तु जब इनमें से किसी को भी स्पष्ट मत नहीं मिला तो प्रचण्ड इस दौड़ से बाहर हो गए । इसके बाद खनाल के साथ उन्होंने १७ बार प्रतिस्पर्धा की । इसके बाद तो निर्वाचन का परिणाम नहीं आने के बाद निर्वाचन सम्बन्धी नियमावली ही परिवर्तन करने की नौबत आ गई । तत्पश्चात् खनाल प्रधानमन्त्री के रूप में निर्वाचित हुए । इसके बाद पौडेल की काफी किरकिरी हुई, वो मजाक के पात्र बन गए थे । लेकिन उनकी राजनीति में सक्रियता बरकरार रही । यहाँ तक कि अब तो वो स्वयं ही कहने लगे थे कि, अब उनकी राजनीतिक यात्रा अवसान की तरफ है इसलिए उन्हें देश की ओर से कोई महत्त्वपूर्ण स्थान जरूर मिलना चाहिए ।

वर्ष ०७९ मंसिर ४ गते के आम निर्वाचन के बाद पौडेल लगातार यह कहते आ रहे थे कि नेपाली काँग्रेस और माओवादी को मिल कर सरकार बनाना चाहिए । बाद के बदलते समीकरण का दोष भी उन्होंने काँग्रेस पर ही लगाया था । पौडेल प्रचण्ड को पहले कार्यकाल में प्रधानमंत्री बनाने के पक्ष में थे और गठबन्धन को बचाने चाहते थे । बदले हुए राजनीतिक माहोल में गठबन्धन को वापस लाने की कोशिश में वो निरन्तर प्रयासरत रहे । प्रधानमंत्री प्रचण्ड के लिए उनका नरम रूप उन्हें उनके करीब लाया । साथ ही शेरबहादुर देउवा भी अपनी गलती सुधारना चाहते थे, फलस्वरूप आज वो नेपाल के तीसरे राष्ट्रपति के रूप में पदासीन हैं ।
लेखन में अभिरुचि
पौडेल की लेखन में अभिरुचि रही है । उनकी कई कृतियाँ प्रकाशित हैं । प्रजातान्त्रिक समाजवाद, आस्थाको यात्रा, कृषि क्रान्ति र समाजवाद, राजनीतिको मार्ग, नेपाली काँग्रेस रूपान्तरणको मार्ग आदि दर्जन पुस्तक प्रकाशित हैं । कुछ कविता और निबन्ध संग्रह भी प्रकाशित हैं ।
विभिन्न सम्मानों से सम्मानित
पौडेल को विभिन्न मानवाधिकार पुरस्कार मिले हैं, जिनमें महेंद्र विक्रम शाह पुरस्कार (महेंद्र विक्रम शाह नेपाल लोकतंत्र कांग्रेस के संस्थापक हैं), जापानी सरकार द्वारा सम्मानित राजकीय सम्मान ‘ऑर्डर ऑफ द राइजिंग सन’ – २०२०) शामिल हैं ।

सबल और दुर्बल पक्ष
लम्बी और अथक राजनीतिक सक्रियता पौडेल की राजनीतिक जीवन की प्रमुख पुँजी है । वर्ष ०१७ के बाद से नेपाल के राजनीतिक संघर्ष में वो निरन्तर संलग्न रहे और पार्टी द्वारा दी गई सभी जिम्मेदारियों का निष्ठापूर्वक निर्वहन किया । देखा जाए तो काँग्रेस में नीतिगत–वैचारिक चिन्तन करने वाले नेता के रूप में हम उन्हें ले सकते हैं । अपने राजनीतिक जीवन में वो कई बार मंत्री बने किन्तु उन पर कभी भी कोई गम्भीर आरोप नहीं लगा है । भ्रष्टाचार का उन पर कभी आरोप नहीं लगा । उन्हें एक साफ छवि वाले नेता के रूप में देखा जाता है । नेपाल की राजनीति में दलों का टूटना और नए दलों का निर्माण करना बहुत ही आम सी बात है । किन्तु पौडेल की निष्ठा सदैव काँग्रेस पार्टी के लिए रही । कई उतार चढ़ाव उनकी राजनीतिक यात्रा में बनी रही किन्तु उन्होंने कभी कोई नई पार्टी का गठन नहीं किया । विश्लेषकों का मानना है कि यह उनकी कमजोरी रही किन्तु कई इसे सकारात्मक रूप में भी लेते हैं । पौडेल की भूमिका सदैव समन्वयकारी की रही है । राष्ट्रीय राजनीति में इनकी मजबूत स्थिति रही है । पौडेल ने सशस्त्र द्वन्द्वरत तत्कालीन नेकपा माओवादी को मूल प्रवाह की राजनीति में लाने के लिए ऐतिहासिक वार्ता और सहमति के काम में अग्रणी भूमिका का निर्वाह किया था । पौडेल विस्तृत शान्ति सम्झौता के मसौदाकार तथा सहमति और सहकार्य के पक्षपाती भी रहे हैं ।

प्रत्येक व्यक्ति में कुछ कमजोरियाँ भी होती हैं । पौडेल के ऊपर लघुताभाषी नेता का आरोप लगता रहा है । राष्ट्रीय नेता होने के बाद भी उनकी सोच और चिन्तन का दायरा संकुचित रहा है । उनकी पार्टी में भी उन्हें छोटे दिल का कहने वालों की कमी नहीं है ।

उनके व्यक्तित्व का कमजोर पहलू ये रहा कि अन्य नेताओं की ही तरह परिवारवाद के मोह में पौडेल भी फसते गए । पुत्र चिन्तन पौडेल को राजनीतिक शक्ति के बल पर सरकारी नियुक्ति दिलवाना, समधी युवराज भुसाल को राष्ट्र बैंक का गभर्नर बनाना, परिवार के दवाब में काम करना, उनके व्यक्तित्व को कमतर बनाता है । पौडेल के पीछे नेता कार्यकर्ताओं की भीड़ कभी भी नहीं रही । शायद इसके पीछे यह कारण रहा हो कि वो अपने निष्ठावान कार्यकर्ताओं को संरक्षण या लाभ नहीं दे पाए और सिर्फ अपने आपके लिए सोचते रहे । जिसके कारण उनके साथ लम्बे समय तक कोई टिक नहीं पाए । विश्लेषक मानते हैं कि वो राजनीति के चतुर खिलाड़ी नहीं हैं । शायद यही वजह थी कि आज तक उन्हें देश का प्रमुख पद नहीं मिल पाया था ।

राष्ट्रपति पद की चुनौतियाँ
गणतन्त्र नेपाल के पहले राष्ट्रपति में डा. रामवरण यादव निर्वाचित हुए थे । उसके बाद विद्यादेवी भण्डारी ने २ कार्यकाल राष्ट्रपति के पद पर रह कर अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह किया । उसके बाद देश के इस सर्वोच्च पद पर रामचन्द्र पौडेल आसीन हुए हैं ।
नेपाल के संविधान २०७२ को जारी करने के बाद देश के प्रथम राष्ट्रपति डा. रामवरण यादव पदमुक्त हुए थे । उसके बाद देश की पहली महिला राष्ट्रपति बनने का सौभाग्य विद्यादेवी भण्डारी को मिला । यादव के साथ ही भण्डारी का कार्यकाल भी विवादित रहा ।

डॉ. यादव के कार्यकाल में तत्कालीन प्रधानसेनापति रुक्माङ्गद कटुवाल प्रकरण ने उन्हें विवादित बनाया था । उस समय सरकार द्वारा किए गए सिफारिस को राष्ट्रपति द्वारा कार्यान्वयन नहीं होने के कारण तत्कालीन प्रधानमन्त्री पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचण्ड’ ने इस्तीफा दे दिया था ।

वहीं राष्ट्रपति के रूप में भण्डारी के दोनों कार्यकाल में उनकी भूमिका सफल से अधिक विवादित मानी जाएगी । तत्कालीन प्रधानमन्त्री केपी शर्मा ओली द्वारा प्रतिनिधिसभा विघटन के लिए दो बार सिफारिश करने पर राष्ट्रपति भण्डारी ने दोनों ही बार प्रतिनिधिसभा विघटन के सिफारिस का अनुमोदन किया जिसे दोनों ही बार सर्वोच्च अदालत असंवैधानिक कह कर खारिज कर दिया था ।
राष्ट्रपति द्वारा संविधान के मर्म और भावना के अनुरूप भूमिका के निर्वाह नहीं करने पर उनकी जीवनशैली पर चटकारे लेकर गप किए गए और उनकी आलोचना की गई । उनकी राजशाही शैली ने राष्ट्रपति पद की मर्यादा को ही कम कर दिया । ऐसे में देश के तीसरे राष्ट्रपति से जनता की उममीद है कि वो दलीय आवरण में खुद को ना लपेट कर संवैधानिक राष्ट्रपति के रूप में संविधान द्वारा दी गई जिम्मेदारी और कार्यभार का निष्पक्षता के साथ निर्वाह करें । यही एक मार्ग है जिससे देश के इस सर्वोच्च पद की गरिमा पुनः स्थापित हो सकती है । संघर्षपूर्ण राजनीतिक यात्रा के पश्चात् मिली यह महत्त्वपूर्ण उपलब्धि उनके लिए सुखद और सफल सिद्ध हो यही नेपाल की जनता की चाहत है ।

Editor Himalini



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