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अमेरिका की अंतराष्ट्रिय धार्मिक स्वतंत्रता रिपोर्ट- भारत विरोधी अंतराष्ट्रिय षडयंत्र का हिस्सा : ललित झा

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ललित झा । अमेरिकी विदेश मंत्रालय द्वारा जारी अंतराष्ट्रिय धार्मिक स्वतंत्रता रिपोर्ट, अमेरिकी विदेश नीति का एक प्रमुख रणनीति है जिसके माध्यम से अमेरिका पूरे दुनियाँ में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थितियों परिस्थितियों के संदर्भ में अपना स्वार्थ प्रेरित विचार जाहीर करता है। पिछले सोमवार को अमेरिकी विदेश मंत्री एंटोनी ब्लिंकन् द्वारा जारी इस रिपोर्ट में नेपाल एबम भारत के संदर्भ में जिस तरह की टिप्पणी किया गया है उसको लेकर विवाद उत्पन्न हो गया है


दुनियाँ के कई प्रमुख देशों ने इस रिपोर्ट की आलोचना करते हुए इसे स्वार्थ प्रेरित एबम आधारहीन सूचनाओ पर आधारित बताया है। अंतराष्ट्रिय धार्मिक स्वतंत्रता रिपोर्ट में भारत की प्रमुख सत्ताधारी दल भारतीय जनता पार्टी पर आरोप लगाते हुये कहा गया है कि भारतीय जनता पार्टी एक हिंदू राष्ट्रवादी पार्टी है जो नेपाल की हिंदुवादी संस्थाओ, राजनीतिक दलो तथा संगठनो को आर्थिक सहयोग देती है और नेपाल को फिर से हिंदू राष्ट्र घोषित करने का प्रयास किया जा रहा है। इसके साथ ही भारत पर राजतंत्र की वापसी का आरोप भी लगाया गया है। अमेरिकी रिपोर्ट में नेपाल के प्रमुख हिंदुवादी तथा राजावादी पार्टी राष्ट्रिय प्रजातंत्र पार्टी, विश्व हिंदू परिषद नेपाल तथा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ नेपाल जैसे संगठनो पर भारत से फंड लेकर नेपाल को फिर से हिंदू राष्ट्र घोषित करने के लिए प्रयास करने का आरोप लगाया गया है। हलांकि भारतीय विदेश मंत्रालय ने इस रिपोर्ट पर कड़ी आपत्ति व्यक्त करते हुए इसे एकपक्षिय रिपोर्ट कहा है। भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने कहा है कि यह रिपोर्ट गलत व भ्रामक सूचना पर आधारित एक तथ्यहीन रिपोर्ट है। जानकारों के अनुसार इस अमेरिकी रिपोर्ट से अमेरिकी कूटनीति की असली मंशा जाहिर होती हैं। इस रिपोर्ट की भाषा और तथ्यों से यह स्पष्ट है कि नेपाल में अमेरिकी संस्थाओ का असली मकसद क्या है?
अमेरिकी धार्मिक स्वतंत्रता रिपोर्ट पर कई लोगों ने सवाल उठाते हुए कहा है कि अमेरिका ये तो बता रहा है कि भारतीय संस्थायें पैसा देकर नेपाल को हिंदू राष्ट्र घोषित करने मे लगा हुआ है लेकिन यह नही बता रहा कि नेपाल में हजारों चर्च खोलने तथा हिंदुओ को ईसाई बनाने के लिए पैसा कौन दे रहा है? देखते ही देखते नेपाल में 10 हजार से अधिक चर्च कैसे हो गया? अमेरिका को इस पर भी रिपोर्ट जारी करना चाहिए। सन् 1951 तक नेपाल में ईसाईयों की आवादी शून्य थी। विक्रम संवत 2050 तक यानी 1992-93 में नेपाल में ईसाइयों की आबादी मात्र 50 हजार के करीब थी जो वर्ष 2017-18 में छलांग लगाकर 4 लाख 50 हजार हो गयी तथा 2021 के जनगणना में इसके 10 लाख के पार पहुँचने का अनुमान है। आखिर ईसाइयों की आवादी इतनी तेजी से नेपाल में क्यों बढ़ रही है? दरअसल अमेरिका और उसके ईसाई धर्मावलंबी साथी देश नेपाल में डॉलर के साथ साथ ईसाई धर्म का भी निर्यात कर रहे है।

अमेरिकी विदेश मंत्रालय के अनुसार यह रिपोर्ट नेपाल में कार्यरत ईसाई धार्मिक समूह गैर सरकारी संस्था, मानव अधिकार कर्मी, संचार माध्यम तथा पत्रकार जैसे स्रोतों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है। अमेरिका का मानना है कि वर्ष 2022 में ईसाई संस्थाओ के लिए नेपाल में कार्य करना कठिन हो गया है क्योंकि धर्मांतरण में संलिप्त ईसाई संस्थाओ के प्रतिनिधियों पर धर्मांतरण विरोधी कानून के तहत करवाई होने लगी है। नेपाल में चल रहे ईसाई संस्थाओ के धर्मांतरण के खेल को इस घटना से अच्छी तरह समझा जा सकता है। बर्दिया गुलरिया नगरपालिका में धर्मांतरण में लिप्त एक ऑस्ट्रेलियन महिला समेत पांच नेपाली नागरिकों की गिरफ्तारी। उसके पास से बाईबल, पर्चा, सी डी, समेत कई चीजें बरामद की गयी थी। नेपाल पुलिस द्वारा गिरफ्तार ऑस्ट्रेलियन महिला का नाम क्याटिया ग्रान, और पासपोर्ट न. एन 70073711 था,। इसके साथ ही स्वेता मानंधर्, श्रीजन मानंधर्, तेज बहादुर शाही तथा दल बहादुर को भी गिरफ्तार किया था। नेपाल पुलिस द्वारा मुलुकि ऐन-74 के धारा 155 के तहत मामला दर्ज कर जब इसका अनुसंधान किया गया तो कई चौकानेवाला रहस्योद्घाटन हुआ। धर्मांतरण कराने के आरोप में उस ऑस्ट्रेलियन महिला को नेपाल से डिपोर्ट कर दिया गया। नेपाल पुलिस के अनुसंधान में नेपाल में धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर चल रहे धर्मांतरण का अंतराष्ट्रिय खेल उजागर हो गया है। पुलिस अनुसंधान में यह स्पष्ट हो गया कि नेपाल में ईसाई संस्थाओ, गैर सरकारी संस्थाओ, मानव अधिकार कर्मियों के सहयोग से किस तरह अंतराष्ट्रिय धर्मांतरण अभियान का संचालन किया जा रहा है। इस अभियान का उद्देश्य नेपाल में अगले दशक तक ईसाई लोगों की जनसंख्या, 13 से 15 प्रतिशत तक पहुंचाने की है।

नेपाल में अमेरिकी चाहत–अमेरिका नेपाल में अपनी मजबूत उपस्थिति चाहता है। इसके लिए मजबूत धार्मिक प्रभाव होना जरूरी है क्योंकि मजबूत धार्मिक प्रभाव के बिना राजनीतिक, कूटनीतिक तथा सामाजिक प्रभाव अधूरा माना जाता है। दरअसल इस सबके पीछे अमेरिका का इरादा नेपाल में अपनी मजबूत भूराजनीतिक उपस्थिति हाशिल करना है। अमेरिका अपने मकसद मे कामयाब भी हो रहा है। नेपाल के राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक मामलों में अमेरिका के बढ़ते प्रभाव से यह बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है।

नेपाल की राजनीति में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी तथा जनमत पार्टी के उदय से अमेरिका के बढ़ते प्रभाव को भली भाँति समझा जा सकता है।

अमेरिका और ईसाई संस्थाओ के निशाने पर मुख्यतः पहाड़ी क्षेत्रों के आदिवासी जनजाति तथा मधेस के दलित आबादी होते हैं लेकिन डॉलर और डी. भी के प्रभाव में आजकल ब्राह्मण और क्षेत्री भी इसके प्रभाव में आने लगे हैं। नेपाल किस तरह से अंतराष्ट्रिय ईसाई संस्थाओ के निशाने पर है इसको निम्न उल्लेखित घटनाओ से समझा जा सकता है।, 30 नोवम्बर 2018 को काठमांडू के एक पांच सितारा होटल में ” एशिया पैसिफिक समिट ” का आयोजन किया गया था। इस आयोजन का प्रमुख सहयोगी इंटरनेशनल असोसिएशन आफ पर्लीयामेंटेरियन फॉर पीस, इंटरनेशनल कंफेडरेशन ऑफ एशिया पॉलिटिकल पार्टी, तथा यूनिवर्सल पीस फेडरेशन ( UPF) जैसी संस्थायें शामिल थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री के पी ओली इस कार्यक्रम के प्रमुख अतिथि थे। यूनिवर्शल पीस फेडरेशन का गठन ही दुनियाँ में ईसाई धर्म के विस्तार हेतु किया गया था। इस कार्यक्रम में UPF नेपाल चैप्टर का गठन भी किया गया था जिसके अध्यक्ष नेपाल परिवार दल के एकनाथ ढकाल बनाये गये थे। कहा जाता है कि एकनाथ ढकाल ने नेपाल परिवार दल के कार्यकर्ताओ को ईसाई बनने हेतु खुलेआम कहा था। यू पी एफ के इस कृत्य का विरोध राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी तथा राष्ट्रीय जन मोर्चा नेपाल जैसी पार्टियों ने किया था। इस तरह का आयोजन और घटनायें तो बस नमुना है जो यह दर्शाने के लिए पर्याप्त है कि अमेरिका और उसके सहयोगी नॉर्वे, स्वीडन, डेनमार्क, फिनलैंड, साउथ कोरिया, यू. के, तथा स्विटजरलैंड जैसे देश नेपाल को ईसाई धर्मांतरण का इपीसेंटर बना रहा है जिसका दुष्प्रभाव अगले कुछ वर्षों बाद नेपाल की आंतरिक राजनीति तथा भारत नेपाल संबंधों पर स्पष्ट दृष्टिगोचर होने लगेगा। कहते हैं अंतराष्ट्रिय कूटनीति तथा राजनीति में न कोई स्थाई दोस्त होता है और न ही कोई स्थाई दुश्मन। स्वार्थ के अनुसार दोस्ती और दुश्मनी का इतिहास बदलता रहता है। अमेरिका और उसके सहयोगी इसी रणनीति पर अमल कर रहे हैं। रणनीतिक विश्लेषकों के अनुसार अमेरिका अपने अंतराष्ट्रिय धार्मिक स्वतंत्रता रिपोर्ट के जरिये एक तीर से दो शिकार करना चाहता है। एक तरफ वह नेपाल में ईसाई धर्मांतरण के माध्यम से अपने धार्मिक तथा राजनीतिक प्रभाव में वृद्धि कर रहा है दूसरी तरफ वह भारत के आंतरिक राजनीति को भी प्रभावित करने की कोशिश में लगा हुआ है

सामरिक विश्लेषकों की माने तो अमेरिका यह नही चाहता कि भारत में अगले वर्ष 2024 में होनेवाले आम चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व् वाली भारतीय जनता पार्टी की जीत हो और मोदी फिर से भारत का प्रधानमंत्री बने। अमेरिका को करीब से जाननेवालों के अनुसार अमेरिका भारत के रूप में एक मजबूत विश्वशक्ति का उदय नही चाहता। पोस्ट कोविड काल में जब अमेरिका समेत विश्व के तमाम शक्तिशाली देशों की अर्थव्यवस्था लड़खड़ा रही हैं तब भारत भूराजनीति के विश्व पटल पर एक मजबूत व शक्तिशाली देश के रूप में तेजी से उभर रहा है। ब्रिटेन को पीछे छोड़ते हुए आज भारत विश्व की पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है तथा विश्व बैंक के एक ताजा आकलन के मुताबिक भारत अगले दशक तक विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने मे कामयाब हो जायेगा। जनसंख्या के दृष्टिकोण से भारत, चीन को पहले ही पीछे छोड़ चुका है। तमाम चुनौतियों के बाबजूद भारत की अर्थव्यवस्था जिस तेज रफ्तार से आगे बढ़ रही हैं, उससे अमेरिका और पश्चिमी दुनियाँ के देश सशंकित हो उठे हैं। चीन के उदय से परेशान अमेरिका नही चाहता कि विश्व कूटनीतिक मंच पर एक और महाशक्ति का उदय हो जो आगे चलकर अमेरिका के लिए चुनौतियाँ खड़ी करे। अमेरिकी विदेश नीति के निर्माताओं को रूस- युक्रेन युद्ध में भारत की भूमिका से काफी निराशा हुयी है और वह यह समझ चुके है कि भारत अपने राष्ट्रीय हित को ध्यान में रख कर ही अपनी नीतियाँ तय करेगा, अमेरिका के इशारे पर वह नही नाचने वाला। अमेरिकी प्रतिबंधों को नजरंदाज करते हुए भारत आज भी रूस से तेल खरीद रहा है जिस कारण रूस- युक्रेन युद्ध के आलोक में अमेरिकी विदेश नीति को तगड़ा झटका लगा है इसलिए वह भारत के आगामी आम चुनाव में भारत की आंतरिक राजनीति को प्रभावित कर मोदी के नेतृत्व में भाजपा का रास्ता रोकना चाहता है। अमेरिका भारत में राजनीतिक रूप से कमजोर सरकार चाहता है। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिये अमेरिका और उसके साथी देशों से जुड़े हुए कई गैर सरकारी संगठन, समय समय पर भिन्न भिन्न प्रकार की रिपोर्ट जारी कर राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रिय मंचों पर भारत को बदनाम करने का सुनियोजित अभियान चला रही हैं। कभी हावर्ड विश्वविद्यालय तो कभी कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के सहारे, भारतीय संस्कृति और सभ्यता पर बौद्धिक आक्रमण होता है तो कभी हिंडनबर्ग रिपोर्ट के जरिये भारतीय अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने का प्रयास। हाल ही मे एक प्रसिद्ध अमेरिकी उद्योगपति जॉर्ज सोरोस ने लंदन में सार्वजनिक रूप से घोषणा किया है कि वह भारत के आगामी आम चुनाव को प्रभावित करने के लिए एक अरब डॉलर से अधिक खर्च करेगा ताकि मोदी का रास्ता रोका जा सके। भारत के खिलाफ संचालित इसी अभियान की ताजा कड़ी है अमेरिका द्वारा जारी यह अंतराष्ट्रिय धार्मिक स्वतंत्रता रिपोर्ट। इसके माध्यम से भारत और नेपाल में धार्मिक रूप से अल्पसंख्यकों के उत्पिरन का मुद्दा उठाया गया है ताकि भारत की विपक्षी राजनीतिक पार्टियाँ, हिंडनबर्ग रिपोर्ट की तरह फिर से इस मुद्दे पर हंगामा करे। नेपाल से भारत की धार्मिक सांस्कृतिक एबम राजनीतिक निकटता जगजाहिर है इसलिए नेपाल की धरती से भारत विरोधी इस अभियान का संचालन हो रहा है। इस अंतराष्ट्रिय धार्मिक स्वतंत्रता रिपोर्ट के जरिये पश्चमी देश नेपाल में भारत विरोधी माहौल उत्पन्न करना चाहते हैं ताकि इसका प्रभाव भारत नेपाल मैत्री संबंध पर पड़े तथा भारतीय चुनाव को प्रभावित किया जा सके।
भारत के लिए संदेश– हाल के वर्षो में ऐसा देखा जा रहा है कि नेपाल के सामाजिक तथा राजनीतिक जीवन में भारत का प्रभाव कमजोर होता जा रहा है। एक तरफ नेपाल के लोगों में अमेरिका एबम पश्चमी देशों के प्रति आकर्षण तेजी से बढ़ रहा है वही चीन की ओर भी लोगों के रूझान में वृद्धि देखी जा रही हैं। भारत के लिए यह एक बड़ी चुनौती है

ये भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बगची है

भारत को नेपाल के साथ अपने पारंपरिक राजनीतिक सामाजिक, धार्मिक एबम सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करने के लिए ठोस पहल की जरूरत है। आखिर भारत को गंभीरता से इस पर विचार करने की जरूरत है कि भारत नेपाल मैत्री संबंधों में दरारे क्यों उत्पन्न हो रही हैं? नई दिल्ली में बैठकर भारत के नेपाल नीति निर्माताओं को काठमांडू और दिल्ली से इतर जो भारत नेपाल संबंध है, उसको प्राथमिकता में रखना चाहिए। उन्हे यह सोचना चाहिए कि भारत नेपाल संबंध मतलब सिर्फ काठमांडू- दिल्ली का संबंध नही बल्कि इसमें अयोध्या – जनकपुर, पशुपतिनाथ- विश्वनाथ- मुक्तिनाथ, लुम्बिनी- बोधगया भी शामिल हैं। सिर्फ काठमांडू और दिल्ली के भरोसे भारत नेपाल बहुस्तरिये संबंधों भला नही होने वाला। आज भारत को यह सोचना होगा कि आखिर क्यों आज नेपाल भारत सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक एबम राजनीतिक संबंध उपेक्षित है? नेपाल और भारत के लोगों ने दूरियाँ क्यों बढ़ रही हैं?? पीपुल टू पीपुल रिलेशन की बात सिर्फ भाषणों तक ही सीमित नही रहे बल्कि इसे मजबूत और प्रगाढ़ बनाने का प्रयास होना चाहिए। भारत के नीति निर्माताओं को दिल्ली के साउथ ब्लॉक एबम काठमांडू में बैठकर ही नीतियों का निर्धारण नही कर लेना चाहिए बल्कि अच्छा होता यदि जमीनी सच्चाइयों तथा स्थानीय जरूरतों का सम्यक आकलन कर समयानुकूल नीति का निर्धारण हो । दिल्ली में बैठकर भ्रामक सूचनाओ पर आधारित नेपाल नीति से भारत का नुकसान हो रहा है। भारत को नेपाल में अपनी प्राथमिकताओं को फिर से रेखांकित कर उसपर शीघ्र अमल करना चाहिए ताकि अमेरिका और चीन द्वारा पेश चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना किया जा सके अन्यथा आने वाले वर्षो मे भारत नेपाल संबंध को गंभीर नुकसान होने की संभावना है।

ललित झा
राजनीतिक संपादक, हिमालिनी



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