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गजेन्द्र बाबु के बाद मधेस की राजनीति दिशाविहीन हो गई : अंशु कुमारी झा

जनता की ऐसी–तैसी, नेता का चुनाव : अंशुकुमारी

अंशु झा, हिमालिनी अंक अप्रैल 023 । नेपाल का अर्थतन्त्र फिलहाल संवेदनशील है । बहुत सारे प्राइवेट व सरकारी कार्यालयों में कर्मचारियों को कई महिनों से मासिक वेतन नहीं मिल रहा है । बैंक लोन नहीं दे रहा है । समस्या यहां तक पहुंच गई है कि पैसे के अभाव में कर्मचारियों को काम करने से मना किया जा रहा परन्तु देश में चुनाव पर चुनाव अर्थात् उपचुनाव हो रहा है । गरीब जनता जाय भाड़ में नेता तो चुने हीं जायेंगे ? संसद भवन में तीन सांसद विभिन्न कारणों से कम हो गए इसलिए बैसाख १० गते को तीन क्षेत्रों में उपचुनाव होने जा रहा है । तनहुं, बारा और चितवन जिला में बैसाख १० गते को पुनः चुनाव होने जा रहा है । गत चुनाव में तनहूं–१ से नेपाली कांग्रेस के रामचन्द्र पौडेल की जीत हुई थी जो फिलहाल राष्ट्रपति पद पर आसीन हैं । इसी तरह बारा–२ से जसपा के रामसहाय यादव जी जीते थे जो अभी उपराष्ट्रपति पद पर नियुक्त हैं । चितवन–२ से राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी के रवि लामिछाने की जीत हुई थी परन्तु सर्वोच्च अदालत द्वार उनकी नागरिकता रद्द कर देने के कारण सांसद पद समाप्त हो गया है । अतः उपचुनाव का होना अनिवार्य हो गया । उपचुनाव अर्थात् आम चुनाव के अतिरिक्त होने वाला चुनाव ।

देश भर में चुनाव तो तीन स्थानों में है परन्तु मधेश प्रदेश के बारा २ में हो रहे चुनाव पर पूरे देश का ध्यान केन्द्रीत है । क्योंकि कोई माने या न माने नेपाल का हृदय तो मधेश ही है । अब उस हृदय में छेद हो गया तो मधेश क्या कर सकता है । राणाकाल में मधेश से विभिन्न प्रकार का कर उठाया जाता था । मधेशी भूभाग का अतिक्रमण कर अपने रिश्तेदारों को तोहफा में दिया जाता था । इस प्रकार के अत्याचार के खिलाफ मधेश में भी आवाज उठाने वाले जन्में थे परन्तु उन्हें दबा दिया जाता था । अन्तिम में गजेन्द्रबाबू ने मधेश को एक सूत्र में बांधकर आगे बढाने का बीड़ा उठाया परन्तु वर्तमान के मधेशी राजनीति देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि उनकी यह कोशिश निरर्थक रही । गजेन्द्र बाबु के निधन के बाद मधेस की राजनीति दिशाविहीन हो गई । कोई भी नेता तराई मधेश को एकजुट नहीं रख पाया । यहां तक की उनके द्वारा गठित नेपाल सद्भावना पार्टी को टुकड़ों विभाजित कर के रख दिया गया । सबके सब अपना ही राग अलापने लगे । पार्टी को बस कुर्सी तक पहुंचने की सीढ़ी बना के रख दिया गया ।

विक्रम संवत् २०६३ साल में मधेसी जनअधिकार फोरम के नेतृत्व में मधेस–आन्दोलन हुआ जिसमें बहुत सारे मधेशियों ने शहादत प्राप्त की । तत्पश्चात २०६४ साल में संसदीय चुनाव हुआ जिसमें मधेसी जनअधिकार फोरम संसद में चौथी शक्ति के रूप में उभरे । परिणामस्वरूप नेपाली काँग्रेस, एमाले जैसी राष्ट्रीय पार्टी के नेता तथा कार्यकर्ता फोरम में प्रवेश करने लगे । राष्ट्रीय राजनीति में फोरम का दखल बढ़ गया । परन्तु उक्त पार्टी के अध्यक्ष महोदय अन्य पार्टियों से आए नेताओं को सम्भाल नहीं पाए । जिसके कारण मधेश में विभिन्न पार्टियों का निर्माण हुआ । उसी प्रकार २०६४ साल में नेपाली काँग्रेस के बरिष्ठ नेता महन्थ ठाकुर, बृषेशचन्द्र लाल इत्यादि भी तराई–मधेस लोकतान्त्रिक पार्टी गठन कर कांग्रेस से अलग हो गए । संसदीय चुनाव में कुछ सीट जीतकर सरकार में भी गए परन्तु पार्टी को एकजुट रखने में असफल ही रहे । सब तितर–बितर हो जाने के कारण मधेश की शक्ति क्षीण होती गई । २०७२ साल आश्विन ३ गते नाटकीय ढंग से संविधान की घोषणा की गई । उस समय मधेशी नेताओं ने डंका बजाते हुए कहा कि उक्त संविधान में मधेशी के हक हित की बात उल्लेख नहीं है इसलिए हम संविधान सभा का ही बहिष्कार करते हैं । संविधान घोषित दिन को काला दिन माना गया और सड़क पर भयानक आंदोलन भी हुआ जिसमें कई लोग शहीद हुए । पांच महीने तक लगातार आंदोलन चलता रहा । कथित तौर पर कहा गया कि भारत ने सीमा पर नाकाबंदी लगा दिया है । मधेश का जनजीवन कष्टकर हो गया फिर भी सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ा । इतना कुछ होते हुए भी मधेशी नेता लोग सरकार में आते जाते रहे । मधेशी के हक हित की परवाह ही किसको है ? सब अपने स्वार्थपूर्ति हेतु सांठगांठ में लगे रहते हैं ।

कुछ महीनें पहले जो संसदीय चुनाव हुआ था उसमें सप्तरी २ में जसपा के अध्यक्ष उपेन्द्र यादव को जनमत पार्टी के सीके राउत ने पराजित किया था । और फिलहाल बारा २ में भी जसपा और जनमत का ही जोरदार टक्कर प्रतीत हो रहा है । जसपा से पार्टी अध्यक्ष उपेन्द्र यादव और जनमत से शिवचन्द्र कुशवाहा चुनाव में उठे हैं । कुशवाहा कुछ दिन पहले माओवादी पार्टी में थे और अभी जनमत से चुनाव लड़ने जा रहे हंै । बहुत ही कम समय में जनमत पार्टी ने मधेश में अपनी पकड़ बना ली है । वैसे तो किसी भी प्रतिस्पद्र्धा में जीत किसी एक की ही होती है । कुछ कहा नहीं जा सकता है । जनता भी विकल्प ढूंढती है । चुनाव पश्चात ही पता चलेगा कि कौन बहादुर है और कौन चोर है । फिलहाल बारा २, चुनाव सम्बन्धित सामाजिक संजाल गालियों से भरा दिखता है जो असभ्यता का परिचायक है ।

समग्र में एक कहाबत है, घर फूटे गंवार लूटे । वास्तव में अगर हम एक आपस में लड़ते रहेंगे तो इसका फायदा कोई दूसरा उठाएगा । जो भी हो मैदान में अगर दोनों तरफ टक्कर के प्रतिस्पद्र्धी हो तो वह जंग बहुत ही रोमान्चक होता है । देश भर की जनता का ध्यान बारा २ पर ही केन्द्रीत है । चुनाव में हार जीत तो होती है । चुवाव का अपना ही व्याकरण होता है । जो भी जीते जनता के हकहित का ध्यान रखें । क्योंकि कुर्सी का उन्माद ही कुछ और होता है । वहां पहुंचते ही मधेश का एजेण्डा मधेश में ही रह जाता है । नातावाद और परिवारवाद का बोलबाला हो जाता है । राजनीति का प्रयोग देश और जनता के हित में कम तथा सात पीढि़यों के लिए धन आर्जन की तरफ अधिक होने लगता है ।

अंशु कुमारी झा



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