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व्यक्तिगत धन और स्वार्थ, राजनीति को भ्रष्ट करते हैं – नेल्सन मंडेला

 

डॉ श्वेता दीप्ति, हिमालिनी अंक मई (सम्पादकीय) । नेपाल में भ्रष्टाचार नियंत्रण और सुशासन की स्थिति लगातार गंभीर बनी हुई है । सर्वेक्षण बताता है कि नेपाल में राजनीतिक और सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों ने सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार किया है । ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल (टीआई) द्वारा जारी पब्लिक करप्शन परसेप्शन इंडेक्स (सीपीआई)–२०२२ के रिपोर्ट में निजी हितों के लिए सार्वजनिक पदों का दुरुपयोग करके अदालतों, संसदों, सुरक्षा एजेंसियों आदि के अधिकारियों÷प्रतिनिधियों द्वारा भ्रष्टाचार दिखाया गया है । रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि संसद, कार्यपालिका और न्यायपालिका में सबसे अधिक भ्रष्टाचार है ।

रिपोर्ट के अनुसार, भ्रष्टाचार–प्रवण देशों की सूची में नेपाल को ३४ अंकों के साथ ११०वें स्थान पर रखा गया है । ऐसा लगता है कि दुनिया भर के १८० देशों में हर साल होने वाले भ्रष्टाचार के अध्ययन में नेपाल सुधार नहीं कर पाया है । नेपाल, पिछले साल ३३ अंक प्राप्त कर ११७वें देश में था, रिपोर्ट के अनुसार इस बार नेपाल ने अपनी स्थिति में थोड़ा सुधार किया है, लेकिन वर्तमान स्थिति में यह कागजी ही मान सकते हैं । सार्वजनिक पद के दुरुपयोग, राजनीतिक भ्रष्टाचार, अदालतों, संसद और सुरक्षा एजेंसियों के अधिकारियों÷प्रतिनिधियों द्वारा पद के दुरुपयोग के मामले में नेपाल को सबसे कम ३० मिले हैं । पिछले साल भी इन विषयों में ३० अंक थे । रिपोर्ट के अनुसार नेपाल चीन और भारत जैसे बड़े देशों से भी ज्यादा भ्रष्टाचार वाले देशों की लिस्ट में शामिल है ।

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नेपाल में भ्रष्टाचार को एक अवसर माना जाता है, अवसर तब प्राप्त होता है जब कानून कमजोर हो जाता है, चुनाव महंगा हो जाता है, व्यवस्था अस्थिर हो जाती है, न्यायपालिका स्वतंत्र नहीं होती, नौकरशाही हानिरहित हो जाती है । नेता, प्रशासक, व्यापारी, व्यापारी, समाज, पत्रकार, कर्मचारी सभी इसी अवसर में तल्लीन होते हैं और एक दूसरे पर दोषारोपण कर कानूनों और नीतियों का लाभ उठाने लगते हैं । भ्रष्टाचार हर जगह है । यह बाजार में दिखता नहीं है लेकिन होता है । बाजार भ्रष्टाचार का मुख्य स्रोत है । व्यापारी, व्यवसायी, स्वास्थ्य, शिक्षण संस्थान सभी में भ्रष्टाचार का बोलबाला है । यहीं से भ्रष्टाचार का विचार शुरू होता है और सिंह दरबार तक पहुंचता है ।
राजनीति महंगी होती जा रही है, बिना पैसा खर्च किए चुनाव नहीं जीते जाते । वफादारी की राजनीति गायब होती जा रही है ।

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व्यापारियों के चंदे, कर्मचारियों के सहयोग के बाद नेता को मौका दिया जाता है । राजनीति भ्रष्टाचार का अड्डा बनती जा रही है । राजनीतिक संक्रमण के दौर में, अवैध धन कमाने वालों की संख्या भी बढ़ रही है, राजनीतिक दलों ने अपने दल या गुट के कार्यकर्ताओं, नेताओं और अनुयायियों द्वारा किए गए भ्रष्टाचार से छुटकारा पाने के लिए कानून के शासन की पूरी तरह से अनदेखी की जा रही है । कानून को लागू नहीं करने वाले और भ्रष्टाचार के मुद्दे का राजनीतिकरण करने की कोशिश करने वाले राजनीतिक दलों के गलत कार्यों के कारण देश में भ्रष्टाचार की घटनाएं बढ़ रही हैं । सरकार और राजनीतिक हलके भ्रष्टाचारियों को बचाने के लिए काम कर रहे हैं । राजनीतिक दलों, विचारों और राजनीतिक सिद्धांतों से संबद्धता को देखते हुए भ्रष्टाचार को परिभाषित किया गया है । इससे भ्रष्टाचार को संस्थागत बनने में मदद मिली है । धन, पद और पहुंच से अधिकारियों को प्रभावित करने और उसका लाभ उठाने की संस्कृति के कारण भ्रष्टाचार नियंत्रण का कार्य प्रभावी रूप से आगे नहीं बढ़ पाया है । जब तक भ्रष्टाचार के राजनीतिकरण की परंपरा बनी रहेगी और भ्रष्टाचार को विशुद्ध रूप से सार्वजनिक अपराध मानने की संस्कृति विकसित नहीं होगी, जब तक राजनीति कठोर, अनुशासित नहीं होगी तब तक भ्रष्टाचार की समस्या बढ़ती ही जाएगी ।

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