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गौर विभत्स हत्या काण्ड और उपेन्द्र यादव पर सरकारी धम्की बेबुनियाद : कैलाश महतो

कैलाश महतो, परासी । आज से तकरीबन १७ साल पहले २०६३ चैत्र ७ गते के दिन रौतहट के गौर में एक दुर्घटनायी नरसंहार हुआ था । तस्वीरों और भिडियोओं को देखने बाले किसी का भी रोंगटे खडे हो जायेंगे । सुनने बालों की आंखें नम हो जायेंगी, वहीं प्रत्यक्षदर्शी रहे अन्य आम लोगों के दिल की धडकने बन्द हो गई होंगी । मगर खून के प्यासे दरिन्दों‌ के लिए उत्तेजना का एक सैलाब रहा होगा । दृश्य चाहे जो और जैसा भी रहे होंगे, मगर मानव अपराधों के कतार में गौर का वह दानवीय घटना भी शीर्ष स्थान प्राप्त करने में पीछे नहीं जा सकता ।
घटना थी, घट गयी । अपराध था, हो गया । मगर उसका वास्तविक अपराधी आज भी कानुन के कटघरे से बाहर होना आश्चर्य की बात है । राज्य के निकम्मेपन और गैर जिम्मेवारीपन से परे जाना दु:ख की बात है । राज्य को गौर घटना ही नहीं, इस देश के सबसे प्यारे और प्रजातांत्रिक राजा और उनके वंश नाश, युद्ध नियम के विपरीत माओवादी जन युद्ध के नाम पर निर्दोष शिक्षक, पिता, बेटे और समान्यजनों का गर्दनकाट विभत्स हत्याओं का पूर्वाग्रहरहित रुप से समूल छानबिन कर अपराधियों के नायक और अपराधी अन्धे चम्चों को कानुनी दायरे में लानी चाहिए ।
आम सुरक्षा दर्शन किओ बात करें तो बात यही आता है कि
अगर कोई किसी पर अचानक आक्रमण करता है, तो प्रति आक्रमण स्वाभाविक है । दुनिया की सारी जीवन पद्धति इसी सत्य वाद ले आधार पर चलता है । अपना सुरक्षा करने का सार्वभौम अधिकार सबके पास प्राकृतिक रुप से है और राज्य द्वारा यह अधिकार अपने जनता को भी दिया जाता है । यही नियम यूक्रेन के साथ है और यही वास्तविकता रुस के पास भी विश्वयुद्धों में रहा । विश्वयुद्धों में नेपोलियन और हिटलर ने रुस पर आक्रमण किया, तो प्रति आक्रमण और अपने सुरक्षा में सोभियत रुस ने हमले का जवाब दिया ।‌ आज का रुस युक्रेन युद्ध भी प्रति आक्रमण और सुरक्षा के कारण ही इतने जद्दो जहद और मसक्कत के साथ यहाँ युक्रेन रुस से लड रहा है ।
स्वाभाविक रुप से मधेशी जनता ने माओवादी का प्रतिकार कर अपने अस्तित्व ले रक्षा के लिए उनसे बन सकने बाली शक्ति का प्रयोग हुआ होगा । आदमी मरने से पहले जो संघर्ष करता है, वही तो मधेशियों ने क्रुर माओवादियों के साथ किया होगा । क्या जरुरत है कि मधेशी सन् १८१४ से लेकर आजतक शासक और उसके खलकों द्वारा केवल मरने का ठेक्का ले और शासक खलक मारने का मजा लेता रहे !
जहाँ तक उस विभत्स हत्या और नरसंहार में तत्कालीन मधेशी जन अधिकार फोरम का या उसके किसी नेता का संलग्नता या षड्यन्त्र का सवाल है, वह सारे के साए बेबुनियाद है । जानकारों और प्रत्यक्षदर्शियों का कहना तो यही है कि गौर में गौर घटना होने के समय न तो उपेन्द्र यादव मौजूद थे, न कोई फोरम के नेता वहाँ उस आततायी माओवादी ले साथ लडने के लिए वहाँ कोई टिक पाये थे । वह घटना अप्रत्याशित और माओवादी आतंक के खिलाफ़ था – जो मधेशियों ने यह ठानकर कि भागेंगे, तो माओवादी खदेरकर मार देंगे और भिड गये तो हो न हो, बचने का या माओवादी को खदेडने का स्थिति बन जाये । बस्, उसी उद्देश्य से प्रतिकार किया गये आत्म रक्षा के जोश और जुनून ने मरता क्या नहीं करता” के अवस्था में मधेशी आम जनता माओवादियों पर भाडी पड गये और न होने बाला अकल्पनीय नरसंहार ने अपनी जगह बना ली । अगर मधेशी कमजोर पड गये होते, तो २७ नहीं, २,७०० मधेशियों को भी वही आततायी आक्रान्ता प्रभु साह ने मरवा डाले होते और माओवादी जन-युद्ध का एक पार्ट मानकर उस हत्या को समान्य कर दिया जाता ।
जहाँ तक उपेन्द्र यादव, जिनका न तो उस घटना से कोई सम्बन्ध रहा है, न जानकारी – अगर‌ उनके या किसी भी तत्कालीन फोरम नेता पर राज्य का राजकीय धर पकड या दमन होता है, तो वह न केवल उपेन्द्र यादव और उनके तत्कालीन किसी नेता पाना जायेगा, बल्कि वह समग्र रुप में मधेश आन्दोलन, मधेशी अस्तित्व और मधेशियों पर राज्य द्वारा शदियों से हो रहे शासकीय प्रताडना माना जायेगा और उसका जवाब मधेश देने को हमेशा तैयार है और रहेगा ।
राज्य इस चिन्तन से मुक्त हो जाये कि उसने मधेश आधारित दलों को कमजोर कर दी है, मधेशी नेताओं के बीच तिक्तता और विषाक्तता पैदा कर दी है ।‌ उपेन्द्र यादव को मधेश अपना नेता माने या न माने, गौर घटना से जुडने बाला हर राज्य षड्यन्त्र मधेश के अस्तित्व के खिलाफ माना जायेगा ।
मधेश इस बात का भी रहस्य जानना चाहेगा कि अगर मधेशी जनता अपना सुरक्षा खुद नहीं करती, तो राज्य उसका सुरक्षा करने का हैसियत रखता था ? मधेशी जनता ने प्रतिकार नहीं किया होता, तो वे ही माओवादी लोग, जिनके परिवार आज न्याय के लिए निवेदनरत और संगठित हैं, मधेशी जनता के नरसंहार पर कोई आवाज उठाते ? अगर “हां” तो निर्दोष सैकड़ों बच्चे, समान्यजन और ज्ञान की प्रकाश देने बाले निहत्थे शिक्षकों के अमानवीय और गैर यौद्धिक तरीके से हुए हत्या, बालात्कार, दमन, लूटपाट जैसे घोर अमानवीय दुश्कर्मों पर आजतक वे ही न्याय मांगने बाले परिवार ने क्यों कोई आवाज नहीं दी है ?
गौर त्रासदीपूर्ण हत्या तथा नरसंहारीय घटना के उपर निम्न लिखित राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिवेदन, खुलासे और तथ्य प्रमाणित हुए हैं :
१. संयुक्त राष्ट्रसंघीय प्रतिवेदन द्वारा फोरम और उपेन्द्र यादव को घटना में संलग्नता को खारेज ।
२. खिलराज रेग्मी का उच्च स्तरीय न्यायिक छानबिन‌ समिति द्वारा दिये गये प्रतिवेदन में उपेन्द्र यादव का नाम नहीं ।
३. राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय अध्ययन व अनुसंधान अनुसार गौर काण्ड का कारण माओवादी हठ और अहंकार ।
४. पूनरावेदन अदालत का तत्कालीन न्यायाधीश और सुरक्षा निकाय अधिकारियों का जांच बुझ आयोग ने फोरम और उसके नेता ले संलग्नता को खारेज किया है ।
५. माओवादी का मधेशी मुक्ति मोर्चा का तत्कालीन महासचिव प्रभु साह का व्यक्तिगत हठ व अहंकार मूल कारक ।
६. प्रहरी उपरीक्षक सिद्धि विक्रम शाह के अनुसार गौर घटना राजनीतिक प्रकृति का होने का निष्कर्ष ।
७. कानतिपुर समाचार के अनुसार फोरम आमसभा पर आक्रमण करने हेतु माओवादी द्वारा बारा, मकवानपुर, सप्तरी, सिरहा, बाजुरा, चितवन, रुकुम, काभ्रे, पर्सा, सिन्धुली, आदि जिलों से आधुनिक हाथ हथियार सहित वाइसीएल (YCL) लाये जाना प्रमाणित ।
८. संयुक्त राष्ट्र संघीय मानव अधिकार उच्चायुक्त (OHCHR) के April, 2007 में घटना में फोरम का असंलग्नता सहित का प्रतिवेदन सार्वजनिक ।
९. २१ मार्च के दिन फोरम द्वारा  गौर में आमसभा करने का घोषणा होना ।
१०. फोरम नेपाल द्वारा तययित आमसभा कार्यक्रम के ठिक दो दिन पहले माओवादी द्वारा उसी मैदान और उसी समय पर माओवादी का आमसभा घोषणा होने का प्रमाण प्रमाणित ।
११. माओवादी द्वारा प्रथमतः फोरम के मंच पर आक्रमण के साथ गोली तथा पत्थर चलाया जाना (OHCHR का प्रतिवेदन) ।
१२. फोरम द्वारा घटना सुनियोजित न होने का OHCHR का प्रतिवेदन ।
१३. भारत से अपराधी लाये जाने का आरोप गलत – OHCHR ।
१४. स्थानीय प्रशासन द्वारा घटना रोकने की मजबूत पहलकदमी में कमजोरी प्रमाणित ।
१५. प्रहरी और स्थानीय वाणिज्य संघ के पहल में घटना घटने से रोकने के उद्देश्य जगह और समय बदलने के अनुरोध हेतु बुलाये गये बैठक में माओवादी का अनुपस्थित होना प्रमाणित ।
१६. फोरम द्वारा सरकार से घटना छानबीन के लिए आधिकारिक जांचबुझ टीम बनाने के अनुरोध को सरकार द्वारा अनसुनी किये जाने का खुलासा ।
१७. कार्यक्रम के दिन कार्यक्रम स्थल पर सुरक्षाकर्मियों की मुस्तैदी न्यून व कमजोर होने का पर्दाफास ।
१८. फोरम द्वारा किसी भी प्रकार का हत्या प्रपंच किये जाने की बात प्रमाणित न होना, और
१९. माओवादी द्वारा जनता में अनावश्यक उत्तेजना भडकाने का रवैया सार्वजनिक ।
ये सब प्रमाणित करता है कि गौर हत्या काण्ड का मूल श्रोत तत्कालीन नेकपा (माओवादी) और प्रभु साह हैं ।
बेहतर यह होगा कि त्तासदीपूर्ण उस नरसंहार को जान जान कर निर्माण और न्यौता देने बाले उस माहौल सृजक व्यक्ति, संगठन, समूह और नेता को कानुनी कठघरे में लाकर पीड़ित व्यक्ति और परिवारजनों को न्याय और सरकारी राहत तथा क्षतिपूर्ति देने का व्यवस्था किया जाना चाहिए ।
कैलाश महतो, नवलपरासी |



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