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“वसुधैव कुटुम्बकम् : पृथ्वी पर मानवता का विकास” : डॉ श्वेता दीप्ति

डॉ श्वेता दीप्ति, सम्पादकीय हिमालिनी अंक सेप्टेंबर । भारत में जी २० का सम्मेलन बहुत ही सफलता के साथ सम्पन्न हुआ है वैश्विक स्तर पर इस सम्मेलन की चर्चा हुई है । सम्मेलन की उपलब्धि के साथ ही भारत के आतिथ्य की भी चर्चा हो रही है । कहा जाए तो भारत ने ‘अतिथि देवो भव’ की परिकल्पना को साकार किया है । इस सम्मेलन में जिस चीज ने सबसे अधिक ध्यान आकर्षित किया वह है जी २० का आधार वाक्य ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ । भारत द्वारा इस श्रुति वाक्य को महत्त्व देना बहुत अर्थ में मायने रखता है और भारत की दूरदर्शिता को भी दर्शाता है ।

वसुधैव कुटुम्बकम्’ सनातन धर्म की विचारधारा है जिसका अर्थ यह है कि पूरी दुनिया एक परिवार है वसुधा यानि धरती एक कुटुम्ब है । यह सारी सृष्टि उस विधाता की निर्मित है, जिसने हमें विविध भूखंडों पर अनेक रंगो और भाषाओं में विचरने के लिए स्वतंत्र छोड़ रखा है । धर्म और जाति, भाषा और लिपि रंग और रूप के नाम पर पार्थक्य की दीवारे मनुष्य ने उठा रखी है ।
यह समस्त शस्यश्यामला वसुंधरा एक ही है और इसपर रहनेवाले लोग एक ही परिवार के सदस्य है, इस अवधारणा का पवन युद्ध और वैमनस्य की विभीषिका को दूर करने में सहायक हो सकता है । जिस दिन पृथ्वी के सभी लोग धर्म और संप्रदायों, रंग और भाषा के विभेद भूलकर एक परिवार की तरह आचरण करने लगेंगे उसी दिन सच्ची मानवता का उदय होगा ।

साहित्यिक रूप से संस्कृत एक समृद्ध भाषा है । इसी भाषा से एक महान् विचार की उत्पत्ति हुई है– ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ । यद्यपि यह एक प्राचीन अवधारणा है, किन्तु आज यह पहले से भी अधिक प्रासंगिक है । हम सभी जानते हैं कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और समाज की सबसे प्रथम कड़ी होता है– परिवार । परिवार लोगों के एक ऐसे समूह का नाम है, जो विभिन्न रिश्ते–नातों के कारण भावनात्मक रूप से एक–दूसरे से जुड़े रहते हैं । ऐसा नहीं है कि उनमें कभी लड़ाई–झगड़ा नहीं होता या वैचारिक मतभेद नहीं होते, परन्तु इन सबके बावजूद वे एक–दूसरे के दुःख–सुख के साथी होते हैं । इसी अपनेपन की प्रबल भावना होने के कारण परिवार सभी लोगों की पहली प्राथमिकता होता है । एक परिवार के सदस्य एक–दूसरे को पीछे धकेलकर नहीं वरन् एक–दूसरे का सहारा बनते हुए आगे बढ़ते हैं । परिवार के इसी रूप को जब वैश्विक स्तर पर निर्मित किया जाए, तो बह ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ कहलाता है ।

देखा जाए तो आधुनिक समय में ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ ग्रन्थों–पुराणों में वर्णित एक अवधारणा बनकर रह गई है, वास्तव में यह कहीं अस्तित्व में नजर नहीं आती । मूलतः ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की अवधारणा की संकल्पना भारतवर्ष के प्राचीन ऋषि–मुनियों द्वारा की गई थी, जिसका उद्देश्य था– पृथ्वी पर मानवता का विकास ।

आज भी दुनिया में राष्ट्रवाद हावी है । इसमें व्यक्ति केवल अपने राष्ट्र के बारे में सोचता है, सम्पूर्ण मानवता के बारे में नहीं । जगह–जगह पर हो रही हिंसा, युद्ध और वैमनस्य इसका प्रमाण है । आज पूरा विश्व अलग–अलग समूहों में बँटा हुआ है, जो अपने–अपने अधिकारों और उद्देश्यों के प्रति सजग है परन्तु देखा जाए तो सबका उद्देश्य विकास करना ही है । अतः आज सभी को वैर–भाव भुलाकर ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की संस्कृति को अपनाने की आवश्यकता है, क्योंकि सबके साथ में ही सबका विकास निहित है ।

भारत द्वारा इस अवधारणा को आगे बढ़ाना निश्चय ही सराहनीय प्रयास है । जिस दिन पृथ्वी के सभी लोग अपने सारे विभेद भुलाकर एक परिवार की तरह आचरण करने लगेंगे, उसी दिन सच्ची मानवता का उदय होगा और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का सपना साकार होगा ।

डॉ श्वेता दीप्ति,
सम्पादक हिमालिनी



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