शारदीय नवरात्र… आज माँ चन्द्रघंटा की पूजा अर्चना
काठमांडू, ३० असोज –
या देवी सर्वभूतेषु माँ चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
आज शारदीय नवरात्र का तीसरा दिन है और इस दिन माँ दुर्गा की तीसरी शक्ति चंद्रघंटा की पूजा अर्चना की जाती है । नवरात्र के तीसरे दिन की पूजा का अत्यधिक महत्व है और इस दिन माँ के चंद्रघंटा विग्रह का पूजन–आराधन किया जाता है । माँ का यह स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है । इनके मस्तक में घंटे का आकार का अर्धचंद्र है, इसी कारण से इन्हें चंद्रघंटा देवी कहा जाता है । इनके शरीर का रंग स्वर्ण के समान चमकीला है । इनके दस हाथ है ं। इनके दसों हाथों में खड्ग आदि शस्त्र तथा बाण आदि अस्त्र विभूषित हैं । इनका वाहन सिंह है । इनकी मुद्रा युद्ध के लिए उद्यत रहने की होती है ।
कहते हैं माँ अपने भक्तों के कष्ट का निवारण शीघ्र ही कर देती है ं। माँ चन्द्रघंटा का स्वरूप अत्यंत सौम्यता एवं शांति से परिपूर्ण रहता है । इनकी आराधना से वीरता–निर्भयता के साथ ही सौम्यता एवं विनम्रता का विकास होकर मुख, नेत्र तथा संपूर्ण काया में कांति–गुण की वृद्धि होती है। स्वर में दिव्य, अलौकिक माधुर्य का समावेश हो जाता है। माँ चंद्रघंटा के भक्त और उपासक जहाँ भी जाते हैं लोग उन्हें देखकर शांति और सुख का अनुभव करते हैं ।
माता चंद्रघंटा की कथा
देवताओं और असुरों के बीच लंबे समय तक युद्ध चला । असुरों का स्वामी महिषासुर था और देवाताओं के इंद्र. महिषासुर ने देवाताओं पर विजय प्राप्त कर इंद्र का सिंहासन हासिल कर लिया और स्वर्गलोक पर राज करने लगा ।
इसे देखकर सभी देवतागण परेशान हो गए और इस समस्या से निकलने का उपाय जानने के लिए त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास गए ।
देवताओं ने बताया कि महिषासुर ने इंद्र, चंद्र, सूर्य, वायु और अन्य देवताओं के सभी अधिकार छीन लिए हैं और उन्हें बंधक बनाकर स्वयं स्वर्गलोक का राजा बन गया है । देवाताओं ने बताया कि महिषासुर के अत्याचार के कारण अब देवता पृथ्वी पर विचरण कर रहे हैं और स्वर्ग में उनके लिए स्थान नहीं है ।
यह सुनकर ब्रह्मा, विष्णु और भगवान शंकर को अत्यधिक क्रोध आया. क्रोध के कारण तीनों के मुख से ऊर्जा उत्पन्न हुई. देवगणों के शरीर से निकली ऊर्जा भी उस ऊर्जा से जाकर मिल गई. यह दसों दिशाओं में व्याप्त होने लगी ।
तभी वहां एक देवी का अवतरण हुआ । भगवान शंकर ने देवी को त्रिशूल और भगवान विष्णु ने चक्र प्रदान किया । इसी प्रकार अन्य देवी देवताओं ने भी माता के हाथों में अस्त्र शस्त्र सजा दिए । इंद्र ने भी अपना वज्र और ऐरावत हाथी से उतरकर एक घंटा दिया । सूर्य ने अपना तेज और तलवार दिया और सवारी के लिए शेर दिया ।
देवी अब महिषासुर से युद्ध के लिए पूरी तरह से तैयार थीं । उनका विशालकाय रूप देखकर महिषासुर यह समझ गया कि अब उसका काल आ गया है । महिषासुर ने अपनी सेना को देवी पर हमला करने को कहा. अन्य देत्य और दानवों के दल भी युद्ध में कूद पड़े ।
देवी ने एक ही झटके में ही दानवों का संहार कर दिया । इस युद्ध में महिषासुर तो मारा ही गया, साथ में अन्य बड़े दानवों और राक्षसों का संहार मां ने कर दिया । इस तरह मां ने सभी देवताओं को असुरों से अभयदान दिलाया ।

