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गोस्वामी तुलसी दास की ४०० वीं वार्षिकी तुलसी तुम को शत्–शत् प्रणाम : प्रा. वीरेन्द्र प्रसाद मिश्र

प्रा. डॉ वीरेन्द्र प्रसाद मिश्र, हिमालिनी अंक सितम्बर । गोस्वामी तुलसी दास की ४०० वीं वार्षिकी तुलसी तुम को शत्–शत् प्रणाम ।इस ८३ वर्ष की उम्र क्षीण स्मृति में ऐसा कभी पढ़ा, जैसे लगता है–



“संवत् सोरह सय असी ! असी गंग के तीर ।
श्रावण शुक्ला सप्तमी ! तुलसी तजै शरीर ।”

परन्तु गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित ‘श्रीरामचरितमानस’ (मूल गुटका) सं. २०२३ संस्करण में संत के देहावसान की तिथि ‘संवत् १६८० श्रवण कृष्ण तृतीया शनिवार” लिखा गया है । जो भी हो, संवत् १६८० के श्रावण मास में उनकी मृत्यु हुई थी, यह प्रमाणित होता है । संत ने १२६ वर्ष की लम्बी आयु पायी थी; क्योंकि उनकी जन्म की तिथि संवत् १५५४ श्रावण शुक्ल सप्तमी मानी गयी है । ऐसा कहा जाता है कि अभुक्तमूल नक्षत्र में प्रयाग के पास बाँदा जिला के राजापुर ग्राम में १२ महीनों तक माता के गर्भ में रहने के बाद उनका जन्म हुआ था । पिता एक प्रतिष्ठित सरयूपारीण ब्राह्मण थे, जिनका नाम आत्माराम दुवे था तथा माता का नाम हुलसी था । जन्म के समय उनके मुख में ३२ दाँत थे । जन्म के समय बालक तुलसी रोया नहीं, परन्तु ‘राम’ शब्द का उच्चारण किया था । इस अद्भुत बालक को देखकर पिता को अमंगल की आशंका हुई और उन्होंने इस बालक का अपनी दासी चुनियाँ के द्वारा दशमी की रात में अपने ससुराल भेज दिया । दूसरे ही दिन माता हुलसी स्वर्गवासी हो गईं । चुनियाँ ने पाँच वर्षों तक बालक का लालन–पालन किया और पाँच वर्ष के बाद वह भी बालक को अनाथ छोड़कर संसार से चल बसी । बालक दर–दर भटकने लगा ।

ऐसा विश्वास किया जाता है कि भगवान शंकर की कृपा से श्री नरध्र्यानन्द जी ने इस बालक की खोज की और उसका नाम रामबोला रख दिया । वे इस बालक को अयोध्या ले गये और संवत् १५६१ माघ शुक्ल पंचमी के दिन बालक का यज्ञोपवीत संस्कार कर दिया । बिना सिखाए बालक ने गायत्री मन्त्र का उच्चारण कर दिया । इसके बाद नरहरि स्वामी ने बालक को वैष्णव पाँच संस्कार कर राम मंत्र की दीक्षा दी । वही बालक विद्या आर्जन करने लगा । कुछ दिनों के बाद गुरु और शिष्य दोनों सूकदर्शन (सोरों) पहुँचे । जहां गुरु ने बालक को रामचरित सुनाया । कुछ दिनों के बाद तुलसी काशी आकर शेषसनातन जी के पास रहकर १४ वर्षों तक वेद–वेदाङ्ग का अध्ययन किया ।

गुरु की अनुमति लेकर तुलसी अपने गांव लौटे । वहां उनके परिवार का विनाश हो गया था । अपने माता–पिता का श्राद्ध कर रामकथा वाचन करने लगे । संवत् १५८३ शुक्ल १३ के दिन उनका विवाह भारद्वाज गोत्र की कन्या से हुआ । ऐसा माना जाता है कि एक समय उनकी पत्नी अपने भाई के साथ अपने मैके गई । तुलसी अकेले नहीं रह सके और वे भी ससुराल पहुँच गये । उनकी पत्नी जो राम में भक्ति रखती थी, उन्हें धिक्कारते हुए समझाया,

आस्थि चर्म मम देह में तेरी जैसी प्रीति ।
ऐसी जौ श्रीराम में होती न तो भव–भीति ।।

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यह सुनकर तुलसी की आँखे खुल गई । वे तत्काल उहाँ से विदा होकर प्रयाग पहुँचे, जहाँ अपना गृहस्थ–वस्त्र त्याग कर साधु का भेष अपनाया । और पुनः काशी लौटकर रामकथा का वाचन करने लगे ।
कुछ लोगों का मानना है कि एक प्रेत ने तुलसी को हनुमान का पता बताया । हनुमान से मिलने पर उन्होंने राम के दर्शन की अपनी इच्छा प्रकट की । हनुमान के कहने पर तुलसी चित्रकूट गये, जहाँ एक दिन राम और लक्ष्मण ने उनको दर्शन दिया । पहली बार तुलसी धोखा खा गये, परन्तु दूसरी बार हनुमान ने एक तोते का रूप धारण कर जब यह कहा,

‘चित्रकूट के घाट पर भइ संतन की भीर ।
तुलसीदास चंदन घिसें तिलक देत रघुबीर ।

तुलसी भगवान को देखकर अपने आप को भूल गए । भगवन राम ने स्वयं तुलसीदास के मस्तक पर चन्दन लगाया और विलीन हो गये । संवत् १६२८ में हनुमान के आदेश पर तुलसीदास अयोध्या के लिए प्रस्थान किए, परन्तु रास्ते में प्रयाग का मेला के लिए वहाँ ठहर गए । प्रयाग में कुछ दिनों तक निवास करने पर वे पुनः काशी लौट आए । और प्रहल्लादघाट पर एक ब्राह्मण के घर निवास किया । वहां उनमें कवित्व का उद्भव हुआ और वे संस्कृत भाषा में पदों की रचना करने लगे । ऐसा माना जाता है कि दिन में वे रचना करते परन्तु रात्रि में विलुप्त हो जाते । यह घटना ६ दिनों तक चली । आठवें दिन संत को सपने में भगवान शंकर ने अपनी भाषा में रचना करने को कहा और अपना दर्शन भी दिया । उन्होंने अयोध्या जाकर अपनी काव्य–रचना करने को भी कहा । काशी छोड़कर संत अयोध्या आए और वहां अपनी रचना शुरु कर दी ।

रामचरितमानस

संत ने इस महाकाव्य की रचना का प्रारम्भ संवत् १६३१ चैत्र शुक्ल नवमी के दिन (राम के जन्म दिन) किया । इसके समापन में दो वर्ष सात महीना और छब्बीस दिन लगे । संवत् १६३२ मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी जो राम–सीता विवाह का दिन पड़ता था, सातों काण्ड पूरा हुआ । इस सम्बन्ध में तुलसीदास लिखते हैं,

संवत् सोरह सय एकतीसा । करउँ कथा हरि पद धरी सीसा ।।
नौमी भौम बार मधु मासा । अवधपुरी यह चरित प्रकासा । (१.३४, ४–५)
इस महाकाव्य के सन्दर्भ में एक कवि लिखते हैं–
‘कागज के पन्ने–पन्ने को तुलसी तुलसीदल जैसा बना गया ।’

तुलसीपत्र जैसी पवित्रता तो इस कारण है कि यह राम एक कथा है । परन्तु इसकी लोकप्रियता ने तो इसे और भी उद्भुत बना दिया है । इसकी विभिन्न पंक्तियों को सामान्य ग्रामीणजन भी अपनी बातचीत में सहज रूप में उद्धृत करते देख जाते हैं । उत्तरी भारत और दक्षिणी नेपाल के अलावे विश्व के विभिन्न भूखण्डों में वास करनेवाले हिन्दी भाषा–भाषी को अपनी संस्कृति के धरोहर के रूप में अपने पास इसे रखते हैं । इस तरह करोड़ो लोगों के लिए यह उनके विश्वास को अनुप्रमाणित करता है ।

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इसका मुख्य विषयवस्तु रामकथा ही है, जिसका मुख्य स्रोत वाल्मीकि रामायण है । संत ने इस महाकाव्य को पूरा भक्तिमय बनाने के लिए इस कथा को थोड़ा संक्षिप्त किया है । उत्तरकांड में रामकथा का अन्त लंका–विजय के पश्चात् सीता और लक्ष्मण सहित राम का अयोध्या लौटना और उनका राज्याभिषक का वर्णन कर संत रामराज्य की विशेषताओं का उल्लेख कर कथा को विश्राम देते हैं । तत्पश्चात् इस काण्ड में ही संत ने अपना दर्शन और विशेष रूप में भक्तिमार्ग को संवाद और अन्य कथाओं के माध्यम से स्थापित करने का प्रयास किया गया है । संत ने बाल्मीकि रामायण को युद्धकाण्ड का नाम लंकाकाण्ड रखा है तथा काण्डों के विषय वस्तुओं को भी आगे–पीछे किया है ।

रामचरितमानस की विशेषता यह है कि इसमें संत ने संशय एवं संवाद को कथा का माध्यम बनाया है, जो बहुत ही रोचक तथा ज्ञानवद्र्धक भी है । अपने दार्शनिक विचारों को संवादों के माध्यम से प्रस्तुत किया है, जिसमें संशय के द्वारा विषयवस्तुओं का निर्धारण हुआ है और संशय के निवारण के प्रसंगों में संत ने अपने दर्शन को विभिन्न पात्रों की मुख से व्यक्त करवाया है । ऐसा लगता है कि इस काव्य का चार उद्देश्य है । प्रथमतः प्राचीनकाल से स्थापित शैव–दर्शन और शिव का प्रमुख दैवत्व को संत ने राम को ब्रह्म के रूप में स्थापित कर राम की प्रमुखता को उजागर किया है । दूसरा, अब तक राम को विष्णु को एक अवतार के रूप में हिन्दू धर्मशास्त्रों ने स्थापित किया था, उस आस्था को संत ने राम को ब्रह्म के रूप में प्रस्तुत कर विस्थापित करने का प्रयास किया है । तीसरा, शिव को राम से पूजित करवा कर शैव एवं वैष्णव मत (रामानन्दी मत) में समन्वय करने का भी प्रयास उन्होंने किया है । चौथा, रेदान्त दर्शन के महान् आचार्य गण–शंकर, रामानुज एवं माध्व आदि के श्रेणी में अपने को स्थापित करने का प्रयास भी किया है, जब वे राम के निर्गुण एवं सगुण स्वरुप में समन्वय करते दिखते हैं ।

मानस दर्शन

संत मात्र ज्ञानी नहीं थे, भक्त भी थे । ज्ञानी के रूप में उन्होंने ज्ञान–मार्ग की उपादेयता को तो प्रस्तुत किया ही है, साथ ही भक्ति मार्ग को उन्होंने विशेष रूप में प्रशस्त किया है । वेदान्त दर्शन में ब्रह्म के स्वरूप में दो विचारधारएँ प्रवाहित हुई थीं । एक विचार के अनुसार ब्रह्म अविश्वरूपी है क्योंकि यह गुणरहित, अनिर्णित एवं अनिर्वचनीय है, अर्थात् यह निष्प्रपंच, निर्गुण एवं निर्विशेष है । दूसरे विचार में ब्रह्म विश्वाकार है, जो सर्वव्यापी, सर्व सुन्दर गुण सम्पन्न है, अर्थात् यह सप्रपंच, सगुण एवं सविशेष है । पहला शंकर के द्वारा प्रतिपादित अद्वैत दर्शन है और दूसरा रामानुज की विशिष्टाद्वैत है । शंकर के अनुसार ब्रह्म ईश्वर का अवैयक्ति पद है और जड़ आत्मा एवं ईश्वर–ब्रह्म के अभिव्यक्ति मात्र हैं । रामानुज के अनुसार ब्रह्म वैयक्तिक एवं सर्वव्यापी ईश्वर है तथा जड़ एवं आत्मा उसका शरीर का अवयव हैं । संत इन दोनों के बीच समन्वय करते हैं । शंकर का अनुशरण कर माया को ब्रह्म की शक्ति के रूप में स्वीकार करते हैं, जो एक जादूगर की जादू करने की शक्ति है, जिसके द्वारा वह भ्रम उन्पन्न करता है, जिससे वह स्वयं प्रभावित नहीं होता है । माया के द्वारा सृष्टि रचना से ब्रह्म प्रभावित नहीं होता है । ठीक उसके विपरित माया को ब्रह्म की शक्ति मानते हैं, जिसके द्वारा सृष्टि होती है और ईश्वर भक्त के हित के लिए गुण से सगुण हो जाते हैं । इस सन्दर्भ में संत लिखते हैं,

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दो भगत हेतु भगवान प्रभु, राम धरेउ तनु भूप ।
किए चरित पावन परम, प्राकृत नर अनुरूप ।।
(७.७२ (क)
जथा अनेक वेष धरि नृत्य करइ नट कोई ।
सोई सोई भाव देखाबइ आपुन होई न सोइ ।।
७.७२ (ख)

संत ने निर्गुणत्व तथा सगुणत्व में समन्वय करने के लिए सगुणता को ब्रह्म के स्वरूप के रूप में स्वीकार नहीं कर सगुणता को एक प्रक्रिया या स्वरूप परिवर्तन की क्रिया या पद्धति के रूप में स्वीकारा है, जिसके माध्यम से निर्गुण ब्रह्म, सगुण ब्रह्म में परिवर्तित हो जाता है । इस विचार को ब्रह्मपरिणामवाद कहा जा सकता है । संत मात्र एक दार्शनिक ही नहीं, एक भक्त भी थे, जिसके कारण अपने पाण्डित्य और कवित्व के सहारे निर्ग‘ण ब्रह्म को भक्त के लिए सगुण ब्रह्म स्थापित करने में सफल हुए हैं । यही कारण है कि आज का हिन्दू समाज राम की पूजा भक्ति के साथ करता है ।
संत रामचरितमानस के माध्यम से यह सन्देश हिन्दूओं को देना चाहते हैं कि भगवान जो एक भक्त के लिए आराध्य देव हैं, उनकी भक्ति और प्रेम प्राप्त करने के लिए योग, यज्ञ, जप, तप, व्रत और पूजा सब व्यर्थ हैं । राम का स्मरण, गायन, कीर्तन एवं संतों के मुख से उनका गुणगान सुनना ही एक मात्र साधन है । संत लिखते हैं;

एहि कालिकाल न साधन न साधन दूजा । जोग जग्य जप तप व्रत पूजा ।
रामहि सुमिरिअ गाइअ रामहि । संतत सुनिअ राम गुन ग्रामहि ।।७.१३०, (क) ५–६

इस तरह आज से ४०० वर्ष पूर्व संत ने जिस रूप में अपना दार्शनिक विचार और अपनी कवित्व की सहजता और संवेदनशीलता को इस महाकाव्य के माध्यम से प्रस्तुत किया है, शायद ऐसी विलक्षणता विरल ही किसी विश्व साहित्य में पाठक प्राप्त करते होंगे । इसके लिए हम संत के ऋणी हैं और सदा रहेंगे ।

प्रा डॉ बिरेन्द्र प्रसाद मिश्र
पूर्व निर्वाचन आयुक्त



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