Sat. Feb 24th, 2024
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असभ्यों द्वारा निर्धारित सभ्यों का पाठ्यक्रम अजय कुमार झा

अजयकुमार झा, हिमालिनी अंक नवंबर । वर्तमान के वैश्विक राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक अवस्था का सूक्ष्म विश्लेषण किया जाय तो भीषण मानवीय क्षति और व्यापक भौतिक विनाश को रोकने में हमारी शैक्षिक प्रणाली और पाठ्यक्रम असफलता की ओर बढ़ते हुए विश्व मानवता को सामूहिक घात की ओर प्रवृत्त कर रही है । मानव मस्तिष्क में उबल रहे आक्रोश, हिंसा और मतांधता हमारी शिक्षा प्रणाली का ही प्रतिफल माना जाएगा । हिंसा की पृष्ठभूमि पर आधारित पाठ्यक्रम मानवता को कभी भी शांति से जीने नहीं देगी । हत्या, लूट, बलात्कार और भ्रष्टाचार में जब जीवन के सफलता का पाठ पढ़ाया जाएगा तो आत्मघाती प्रतिशोध, धार्मिक कट्टरता, जातीय मतांधाता और क्षेत्रीय उदंडता का पाठ पढ़ाने वाला भी बड़ी संख्या में स्वतः स्फूर्त उपस्थित हो जाएंगे । आज रूस, यूक्रेन तथा इजरायल और फिलस्तीनी नरसंहारक युद्ध उसी पाशविक पाठ्यक्रम का उपहार है ।
आज विश्व के अनेक देशों के शिक्षा शास्त्री यह महसूस करने लगे हंै कि शिक्षा, जीवन की मौलिक कुशलताओं से युक्त होनी चाहिए जैसे भ्रातृत्व, सह–अस्तित्व, सदभाव, सृजनात्मकता, स्वतन्त्रता, आनंद और सामुहिक प्रज्ञा से युक्त इत्यादि । परिवार के शैक्षिक महत्त्व के बारे मे रूसो ने लिखा है कि शिक्षा जन्म से प्रारंभ होती है तथा माता सर्वोत्तम शिक्षिका है । पेस्टालॉजी, परिवार प्रेम तथा स्नेह का केन्द्र, शिक्षा का सर्वोत्तम स्थान तथा बालक की प्रथम पाठशाला है । रेमान्ट, दो बालक एक ही स्कूल में भले ही पढ़ते हों, एक ही शिक्षणों से प्रभावित होते हों, एक ही साथ अध्ययन करते हों फिर भी सामान्य ज्ञान, रुचियों, भाषा, व्यवहार तथा नैतिकता में अपने–अपने अलग पारिवारिक वातावरण के कारण भिन्न होते हैं । परिवार का शैक्षिक महत्त्व इसलिए भी है क्योंकि परिवार ही बालकों की पहली पाठशाला होती है । जब औपचारिक रूप से स्कूल अस्तित्व में नहीं आए होंगे तब बालक परिवार में ही अन्य प्राणियों की तरह परिवार जनों द्वारा शिक्षित किए जाते रहे होंगे । परिवार बालकों के सर्वांगीण विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है । बालकों की शिक्षा में परिवार का महत्त्व बहुआयामी है । शारीरिक विकास, मानसिक विकास, सामाजिक विकास, नैतिक विकास, सांस्कृतिक विकास, संवेगात्मक विकास, मातृभाषा का विकास, अच्छी आदतों का विकास इत्यादि बालक के शैक्षिक विकास के बहुआयामी रूप हैं ।

शिक्षा के क्षेत्र में परिवार के साथ साथ समुदाय भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है । जिस प्रकार परिवार तथा विद्यालय का बालक के सर्वांगीण विकास में गहरा प्रभाव पड़ता है उसी प्रकार समुदाय की संस्कृति, सहन–सहन, भाषा, शिष्टाचार, सहयोग भावना, मानवीयता, स्वास्थ्य संबंधी आदतों, अभिवृत्ति एवं विचारधाराओं, चरित्र व नैतिकता, इत्यादि बालक पर शैक्षिक असर डालते हैं । यह प्रायः कहा जाता है कि बालक वैसा ही बनता है जैसा समुदाय के लोग उसे बनाते हैं । वस्तुतः बालक के व्यक्तित्व के निर्माण में समुदाय अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है । सहयोग, सेवा, त्याग, कर्त्तव्य भावना, सहानुभूति, सहनशीलता, समाज सेवा, नागरिक गुणों के विकास में शिक्षा बालकों को समुदाय से ही मिलती है । फिर ये आतंकवाद, काफिरवाद, दूसरों से घृणा, नारियों के प्रति पाशाविकता, हिंसा में स्वर्ग की प्राप्ति, लूटपाट की प्रेरणा, स्त्रियों को लूटना, रखैल बनाना, गुलाम बनाना, धर्म के नाम पर मनुष्यों के साथ पाशविक व्यवहार करना, संसार को शत्रु समझना जैसा शिक्षा किस पाठ्यक्रम और धार्मिक पृष्ठभूमिवाला समाज में व्याप्त है? क्या यह वैश्विक शोध, मूल्यांकन और तीव्र परिमार्जन का विषय नहीं है? क्यों चुप है पूरी दुनिया? क्या पद और पैसे रूपी लकवा ने सब के बुद्धि और प्रज्ञा को निष्क्रिय कर दिया है? कुछ तो है, जिससे समृद्ध देश भी मिट्टी रूपी भौतिक लाभ के कारण कोहिनूर रूपी चेतना को नष्ट करने पर जोर दे रहे हैं ।

सृष्टि की रचना के बाद ईश्वर ने जीवों का निर्माण किया, पेड़ पौधे फिर अतिसूक्ष्म जीवों के बाद बड़े जीव बनाये । अंत में मनुष्य का विकास किया जो बाकी जीवों से भिन्न था कारण सोचने और समझने की शक्ति, विचार की शक्ति । इन्ही विचारों की शक्ति से मानव में दया और करुणा का जन्म हुआ, यह शक्ति अद्वितीय थी उसे सही प्रकार से समझने के लिए और कल्याण के लिए ईश्वर ने वेदों की रचना की जिसके अनुसार मानवता वह सिद्धांत या विचारधारा है जिसमें मानव का हित सर्वोपरि माना जाता है । जिसमें सहानुभूति एक विशिष्ट गुण है । और इस दिव्यता को प्राप्त करने के लिए गुरुकुल की अवधारणा को विकसित किया गया । प्राचीनकाल में गुरुकुल में गुरु के सान्निध्य में रहते हुए अनेक ब्रह्मचारियों के साथ बालक रहते थें । वे एक–दूसरे के सुख–दुःख, सेवा, सुश्रुषा आदि का परस्पर ध्यान रखते हुए व्यापकता को उपलब्ध होते थे । जो पाठ गुरु पढ़ाते थे, सब उनको एक साथ मिलकर दोहराते थे, इससे सामुहिक प्रज्ञा, भ्रातृत्व, सहअस्तित्व तथा कनिष्ठों के प्रति जिम्मेदारी और अग्रजों के प्रति श्रद्धा आदि गुणों का सहज ही विकास होता था । जो कालांतर में प्राणी तथा प्रकृति को समृद्ध और सबलता प्रदान करता था । ध्यान से पढ़ा जाए; आयुर्वेद का यह प्रार्थना सांसारिक धन, सफलता, नाम या प्रसिद्धि पाने के लिए नहीं है, न ही यह मरणोपरांत स्वर्ग प्राप्ति के लिए प्रार्थना है । यह हिन्दू धर्म में विश्व शांति के लिए की जाने वाली एक सुंदर प्रार्थना है ।

ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षँ शान्तिः, पृथ्वी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः । वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः, सर्वँ शान्तिः, शान्तिरेव शान्तिः, सा मा शान्तिरेधि ।। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।।
अर्थात् ः द्यूलोक में शांति हो, अंतरिक्ष में शांति हो, पृथ्वी शांत हो, जल शांत हो, औषधियां और वनस्पति शांति देने वाली हो । सभी पदार्थ सुसंगत और शांत हो, ज्ञान में शांति हो, विश्व की प्रत्येक वस्तु शांति युक्त हो । सर्वत्र शांति हो, वह शांति मुझे भी प्राप्त हो । क्या आधुनिक शिक्षा मे लेश मात्र भी यह भाव है ? वर्तमान मे हिंसा, लूट, आतंक, छल, क्रूरता, पाशविकता का ही बोलबाला दिखता है जिसके मूल मे असभ्यों द्वारा षडयंत्र पूर्वक तयार किया गया पाठ्यक्रम और शिक्षण प्रणाली है ।

नई शिक्षा नीति के केंद्रबिंदु में शिक्षा का अर्थ जीवन की भौतिक समस्याओं को समाधान करनेवाला माना गया है । आज का शिक्षित युवा प्रमाण पत्र लेकर नौकरी खोज रहा है । उसके लिए नौकरी ही जीवन का अंतिम लक्ष्य है, परंतु समस्याओं का पहाड़ इतना बड़ा है कि ऊँचे पद पर प्रतिष्ठित होने के बावजूद भी आत्महत्या में अंतिम निदान खोज रहे हैं । यह सब संस्कारविहीन क्षुद्र पाठ्यक्रम तथा शिक्षा का ही फल है । आधुनिक काल में शिक्षा के प्रचार और प्रसार में तकनीकी सुविधा उपलब्ध होने के कारण शिक्षा सर्वसुलभ हो गया है । शिक्षकों, छात्रों एवं शिक्षालयों की संख्या में काफी वृद्धि हुई है परंतु आज के अर्थयुग में शिक्षा के अर्थ और क्षेत्रों में काफी बदलाव आ गया हैं । आज धन और भोग को ही शिक्षा के केंद्रीय और अंतिम लक्ष्य बना दिया गया है । आत्मसंतुष्टि, आत्मानंद, प्रफुल्लता, प्रमुदिता, प्रेम, मैत्रिभाव, अपनत्व, मानवीयता, सामाजिकता, उमंग और शांतिप्रियता की बात अब शिक्षा से कोसो दूर हो गया है । आन्तरिक बोध के अभाव में हो रहे बौद्धिक संवर्धन की यह पाश्चात्य प्रक्रिया मानव को एक विचारहीन, संवेदनहीन तथा दिशाहीन यांत्रिक प्राणी के रूप में ही परिवर्तित करती जा रही है । स्व–केन्द्रित विकास की अंधी मानसिकता से मानवता के सभी मूल्य और आदर्श तार–तार होते जा रहे हैं । आज न परिवार का अस्तित्व है न समाज का; ऐसे मे कल क्या देश अस्तित्व बच पाएगा ? कौन बचाएगा ? क्यों बचाएगा ? पढ़ते जाएंगे और विदेशों मे बसते जाएंगे । धीरे धीरे यह भूखंड नपुंसकों और बंजरों के स्थान मे परिणत होता जाएगा ।

शिक्षा व शिक्षण पद्धतियों को राष्ट्रानुकूल तथा सांस्कृतिक भाव–भूमि में पनपे परिवेशानुकूल वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित कर सकने उद्देश्य से शिक्षा नीति व तद्नुरूप पाठ्यक्रमों के पुनर्संयोजन के लिए कटिबद्ध प्रयास करना होगा । तभी जाकर आत्मनिर्भरता के बोध से संपोषित एक संपुष्ट और पूर्ण मानवता का विकास हो सकेगा । ईश्वरप्रदत्त प्रकृति हमारी माँ है और यह विश्व हमारा परिवार । इस पवित्र भावना से युक्त दिव्य मानव, महामानव या श्रेष्ठ मानव निर्माण वैदिक शिक्षा प्रणाली का लक्ष्य है । ऐसे दिव्य भाव युक्त व्यक्ति कभी किंकर्तव्यविमूढ़ नहीं होते, अपितु स्वयं तो अपना मार्ग प्रशस्त करते ही हैं और दूसरों का भी श्रेष्ठ मार्गदर्शन करते हैं । गुरुकुलीय शिक्षा की अवधारणा एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था का संचालन है, जहाँ सभी बिना किसी भेदभाव के अपनी योग्यतानुसार कार्यों का सपादन करते हैं और समरसता का जीवन व्यतीत करते हुए निरन्तर प्रगति पथ पर अग्रसर रहते हैं ।

शिक्षा जैसा महान् श्रमसाध्य और अत्यावश्यक कार्य एक छोटे कुल में सम्पन्न नहीं होता, इसलिए प्राचीनकाल से ही ऋषि–मुनियों ने गुरुकुलीय शिक्षा प्रणाली बनाई । इसमें बालक को एक छोटे कुल (परिवार) से निकालकर एक बड़े कुल में प्रविष्ट कराया जाता है, जिससे बालक के अन्दर एकत्व की अर्थात् एक कुल की भावना का विकास होता है । गुरुकुल में सभी वर्णों व वर्गों के बच्चे समान रूप से शिक्षा ग्रहण करते हैं । वहाँ किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं होता । यहाँ कोई राजकुमार हो या किसी सामान्य परिवार का बालक, सभी को एक समान रूप से शिक्षित किया जाता है । सभी का पोषण भिक्षा के अन्न के द्वारा होता है, जो समाज के हर तबके से आता है । अतः बालक में सम्पूर्ण समाज के प्रति कृतज्ञता का भाव सहज रूप से उत्पन्न हो जाता है और वह अपने सामाजिक कत्र्तव्यों का भी श्रेष्ठता से निर्वहन करता है । हमें प्राचीन गुरुकुलीय शिक्षा पद्धति व उनके द्वारा प्रतिस्थापित मानवीय मूल्यों के प्रति गंभीरता से पुनरावलोकन करने की बहुत आवश्यकता है । इसके लिए तत्काल आधुनिक शिक्षा केन्द्रों में ऐसे आचार्यों के नियोजन की नितान्त आवश्यकता है जो अपनी प्रज्ञा का उपयोग करते हुए शिष्यों के अन्दर बुद्धिमत्ता, भावनात्मकता, सच्चरित्रता तथा पुरुषार्थ के उदात्त गुणों के साथ–साथ आध्यात्मिकता के पवित्र बोध को अंकुरित कर उसके सर्वांगीण विकास का मार्ग प्रशस्त कर सके । सनातनी शिक्षा का मूल आधार विषयगत दक्षता के साथ–साथ मानव निर्माण (मनुर्भव) भी रहा है । विद्वान् उसे ही माना गया जो करुणा और सृजना से समृद्ध हों । इस प्रकार की सहज, सरल और सर्वसमावेशी शिक्षा के फलस्वरूप ही सनतानियों ने विश्वगुरु पद की गरिमा को पाया, परन्तु अत्यन्त खेद की बात है कि जब अंग्रेज भारतवर्ष को पराधीन कर पाने में सब प्रकार से असफल हुए तो उन्होंने अत्यन्त विश्लेषण और अनुसंधान के बाद वैदिक गुरुकुलीय शिक्षा प्रणाली को हमारी संस्कृति और सभ्यता की नींव पाया और अन्ततः उन्होंने हमारे संस्कारों के आधार वैदिक शिक्षा प्रणाली को समाप्त कर डाला । जिसके फलस्वरूप वे हम पर शताब्दियों तक शासन कर सके । आज यदि हिन्दूओं को पुनः परम वैभवशाली, परम शक्ति सम्पन्न और विश्वगुरु बनाना है, तो वैदिक शिक्षा प्रणाली अर्थात् गुरुकुलीय व्यवस्था पुनः स्थापित करनी होगी । वेदोक्त गुरुकुलीय परिवेश में रहकर छात्र का प्रकृति के साथ सीधा सम्पर्क स्थापित हो जाता है, जिससे बाल मस्तिष्क में शुद्ध संस्कारों को विकसित किया जा सकता है । गुरुकुल में प्रवेश अर्थात् उपनयन को बहुत ही सुन्दर रूप में अथर्ववेद के ‘ब्रह्मचर्य सूक्त’ में प्रस्तुत किया गया है–

आचार्य उपनयमानो ब्रह्मचारिणं कृणुते गर्भमन्तः ।
तं रात्रीस्तिस्र उदरे बिभर्ति तं जातं द्रष्टुमभिसंयन्ति देवाः ।।

अर्थात् बालक को स्वीकारते हुए आचार्य उसे इस प्रकार सुरक्षित और अपने निकट रखता है, जैसे माता अपनी संतान को अपने गर्भ में रखती है । गुरुकुल का आचार्य मात्र बालक का आचार्य ही नहीं अपितु बालक के माता–पिता दोनों का किरदार निभाता है । गुरु के अन्य शिष्य बालक के भाई–बहन होते हैं । आचार्य शिष्य को आश्वासन देता है कि ‘मैं तेरे हृदय को अपने हृदय में धारण करता हूँ और तेरे चित्त को अपने चित्त में धारण करता हूँ’ । इस प्रकार हम दोनों इतने निकट हो जाएँ, जैसे माँ और उसका गर्भस्थ शिशु । इस प्रकार एकत्व की भावना से युक्त होकर शिक्षित व्यक्ति मानव से महामानव बन जाता है । इस प्रकार बालक समाज रूपी वृहत् परिवार का एक अंग बन जाता है । यह भाईचारे का भाव ही, जो कि बालक ने गुरु आश्रम में पाया था, उसे आगे जाकर समाज में फैलाएगा और एक स्वस्थ समाज का निर्माण करेगा । गुरुकुलीय प्रणाली हमारी संस्कृति और सभ्यता की आधारशिला है । आज के विद्यालय मे इसका छाया भी दिखना असंभव है । क्योंकि शिक्षक ही लोभी, पापी, भठियारा, अहंकारी, षडयंत्रकारी, पदलोलुप, भोगी, कामी अथवा कहें सर्वदुर्ग‘णसम्पन्न हैं ।

मानवीय मस्तिष्क को चरमोत्कर्ष तक पहुँचाने अर्थात् मनुष्यमात्र की सामान्य चेतना को दिव्य चेतना, भागवत चेतना में प्रतिष्ठित करने का एकमात्र विकल्प रहित साधन गुरुकुलीय शिक्षा है । वैदिक शिक्षा की चर्चा होते ही ‘हिन्दू दर्शनों’ का जिक्र स्वाभाविक हो जात है । क्योंकि विहीन शिक्षा भीषण दुर्घटना का कारण बनता है ।’दर्शन’ शब्द का तात्पर्य है दृष्टि (ख्ष्कष्यल) । दर्शन विहीन शिक्षा तो विषय बोध मात्र रह जाती है । यह बात केवल शिक्षा के संदर्भ में ही लागू नहीं होती अपितु जीवन के सारे क्षेत्रों में यह आवश्यक है । चाहे वह राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं आध्यात्मिक क्षेत्र ही क्यों न हो । दृष्टि के अभाव में कार्य दिशाहीन हो जाते हैं, जिसका परिणाम विस्फोटक हो जाता है । शिक्षा और दर्शन में गहरा संबंध है । दर्शन के अभाव में शिक्षण–कला कभी भी पूर्ण स्पष्ट नहीं हो सकती, दोनों परस्पर अन्योन्याश्रित हैं । विभिन्न क्रियाकलापों में कुशलता प्राप्त करना यह शिक्षा है । इस शिक्षा का उपयोग एवं विनियोग कब और कहाँ किया जाए– यह ’दर्शन’ है । दर्शन÷दृष्टि के अभाव में शिक्षा विध्वंसकारी हो सकती है । जैसे शस्त्र निर्माण, कला एवं युद्ध कला यह एक प्रकार की शिक्षा है एवं आत्मरक्षा व राष्ट्ररक्षा की भावना जो हमें शिक्षा की ओर प्रेरित करती है, यह दर्शन है । आत्मरक्षा एवं राष्ट्ररक्षा की भावना से रहित युद्ध कौशल हिंसक एवं विनाशकारी परिणाम वाला होता है । यदि युद्ध आत्मरक्षा एवं राष्ट्ररक्षा की भावना से किया जाता है तो वह हिंसा नहीं वरन् अहिंसा की कोटि में आता है तथा ऐसी क्रान्ति शान्ति प्रदान करने वाली होती है ।

सर्वश्रेष्ठ, बहुमुखी, पूर्णता व उच्चतम आदर्शों से युक्त दिव्य विश्वमानव के निर्माण में अनेक व्यक्तियों की महत्ता होती है परन्तु एक सर्वांग सुन्दर जीवन के निर्माण में माँ की भूमिका अतुलनीय होती है । सामाजिक, आध्यात्मिक, धार्मिक, राजनैतिक व अन्य क्षेत्रों में जिन्हें लोगों ने अपना आदर्श माना और जो परम दिव्य चेतना से अभिभूत हैं, परम प्रज्ञा के धनी हैं, शान्तश्रद्धा व पूर्ण समर्पण जिनमें है, ऐसे महापुुरुषों के जीवन का अवलोकन करें तो सहज विदित होगा कि उनके व्यक्तित्व को गढनÞे में उनकी माताओं ने निश्चित रूप से अति विशिष्ट भूमिका निभाई है । ईश्वरीय व्यवस्था कुछ इस प्रकार है कि जन्म से लेकर जब तक बालक की अपनी उचित समझ विकसित न हो, वह सर्वाधिक अपनी माँ के संस्पर्श में रहता है और जन्म से पूर्व भी गर्भ में माँ के व्यक्तित्व व विचारों का उस पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है । माँ बालक की प्रथम गुरु होती है । मनुष्य के निर्माण रूपी इस सचेतन यज्ञ में माँ की सजगता व उसका दिव्य दृष्टिकोण बालक के लिए दिव्य पथ प्रदर्शक का कार्य करता है । यद्यपि जीवन के भिन्न–भिन्न पड़ावों पर अनेकानेक व्यक्तियों, वस्तुओं व परिस्थितियों से व्यक्ति सीखता है, परन्तु उसके जीवन में शिक्षा व संस्कारों की नींव उसकी माँ रखती है । भारतीय शिक्षा परम्परा में संस्कारों का बहुत अधिक महत्त्व है और संस्कारों की दिव्यता माँ की चेष्टाओं और विचारों पर निर्भर करती है । सर्वोचित शिक्षा व दिव्य संस्कारों के समन्वय से ही दिव्यतम व्यक्तित्व का निर्माण होता है ।

राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर प्रत्येक क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ प्रतिभा व कार्यनिष्ठा जिन महापुरुषों व सफल श्रेष्ठतम मानवीय चेतना के मनुष्यों में दिखाई देती है, वह उनकी माँ के द्वारा जीवन के प्रारम्भ में सजगतापूर्वक रखी गई संस्कारों की नींव का ही परिणाम है । बालक के पूर्ण उज्ज्वल व स्वर्णिम भविष्य की माँ ही पुरोधा होती है । बालक के जीवन में दिव्यारोहण व दिव्यरूपांतरण हो और वह स्थायी पतन से सुरक्षित रह सके, इसके लिए प्रत्येक जागरूक माँ को कत्र्तव्य का पालन करते हुए अपना सर्वस्व विचारशीलता पूर्वक समर्पित कर देना चाहिए । जिन माताओं ने कर्तव्यपरायणता पूर्वक अपनी संतानों का लालन–पालन किया, वे माताएँ और उनकी संतानें अपने दिव्य आचरण व अतिविशिष्ट कर्मों से हमेशा ज्योतिर्मय भानु की भाँति आलोकित होती हैं । इतिहास साक्षी है ऐसी सजग माताओं और उनकी दिव्य संतानों की वीरगाथाओं और दिव्य कर्मों का । यजुर्वेद के एक मंत्र में कहा गया है कि हर व्यक्ति को शुभ कर्म करने के लिए ही संकल्प लेना चाहिए । दूसरी बात, जो शुभ कर्म करने वाले हैं, उनके उत्साह को बढ़ाते रहना चाहिए । तीसरी बात, जो ज्ञानी जन हैं, उन्हें चाहिए कि समाज का निःस्वार्थ मार्गदर्शन करते रहें । महर्षि व्यास कहते हैं, दुनिया में सुखी, दुखी, पापी और पुण्यात्मा सभी हैं, कर्म करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि किसका साथ करना चाहिए और किन व्यवहारों को सीखना चाहिए, जिससे जीवन और समाज दोनों का हित होता हो ।



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