भारत का मिजाज बदल रहा है : श्वेता दीप्ति
2 years ago
डॉ श्वेता दीप्ति, काठमांडू । भारत के नवीन विधानसभा चुनाव के परिणामों ने एक बात तो साबित कर दी है कि भारत की जनता जातिगत मोह से निकल रही है । जातिगत समीकरण से हार जीत का फैसला बदलने लगा है । चुनावी परिणाम से विपक्षी पार्टियों को एक सीख तो अवश्य मिलनी चाहिए कि भारत का मिजाज बदल रहा है । राष्ट्र, राष्ट्रप्रेम और धर्म से अब कोई समझौता नहीं होने वाला है । गरीबी और बेरोजगारी का हथियार भी नहीं चलने वाला क्योंकि पिछले सत्तर वर्षों का हिसाब भी जनता की नजरों में है । वैश्विक स्तर पर भारत का बढ़ता कद भारतीय जनता के लिए जिस गौरव की अनुभूति करा रहा है वह उनके लिए सर्वोपरि है । कल तक यह कहने वाला भारत कि अमेरिका, रूस, जर्मनी आदि मेरे मित्र हैं आज उसी भारत के लिए विदेशी राष्ट्र कहते नहीं थक रहे कि भारत हमारा मित्र है । यह परिवर्तन निश्चय ही भारतीय और प्रवासी भारतीय के लिए गौरव बन रहा है ।
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राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तिसगढ के परिणामों ने यह स्पष्ट बता दिया है कि अगली दौर में भी आएंगे तो मोदी ही । हाँ विपक्ष और खास कर काँग्रेस को यह सीख लेने की आवश्यकता अवश्य है कि जुमलेबाजी और सस्ते तथा वाहियात शब्दों के प्रयोग से बचें । परिवारवाद में सीमित कांग्रेस अपनी ही पार्टी के सक्षम प्रतिनिधि को सदैव नकारता रहा है । अगर उन्हें अपनी स्थिति सुधारनी है तो इस परिवार मोह से बाहर निकलना होगा । नेहरू और इंदिरा के योगदान को भारत की जनता समझ चुकी है और उसी को भजाकर सत्ता पर काबिज होने की नीति को भी जनता जानने लगी है । अब अगर कांग्रेस को अपना अस्तित्व बचाना है तो उसे नई अवधारणा और नए तथा सक्षम प्रतिनिधि के साथ आना होगा । तुष्टिकरण की राजनीति कांग्रेस करती आई है और आज भी कर रही है जिसका परिणाम उन्हें कहीं–कहीं प्राप्त भी हो रहा है, जिसे तेलंगाना के परिणाम के रूप में ले सकते हैं किन्तु सम्पूर्ण भारत में यह नीति अब काम आने वाली नहीं है । भारत की जनता अब अपने राष्ट्र धर्म और सनातन धर्म के प्रति जागरूक हो चुकी है । बुद्धिजीवियों का वर्ग निस्तेज हीन होने लगा है ।

हाँ अभी और जागरुकता की आवश्यकता है । क्योंकि हिन्दू धर्म की सबसे पुण्य भूमि दक्षिण भारत आज अपने मूल रूप को खो रहा है । इस बात को वहाँ की जनता को भी समझना होगा । नहीं तो अपनी पहचान और विरासत को खोने में देर नहीं होने वाली है । दक्षिण भारत की जमीन से जिस तरह सनातन धर्म पर प्रहार किया जा रहा है वह आने वाले कल के लिए बहुत घातक सिद्ध होने वाला है ।
भारत की राजनीति का कमोवश असर नेपाल पर भी होता आया है जो स्वाभाविक भी है । क्योंकि सांस्कृतिक तथा धार्मिक स्तर पर ये दो देश बहुत ही करीब हैं । धर्मनिरपेक्षता के नाम पर नेपाल ने अपनी पहचान खो दी है । तुष्टिकरण की राजनीति यहाँ भी जोर पकड़ने लगी है जिसका गाहे बगाहे पत्थरबाजी और जातीय संघर्ष के रूप में असर हम देखने लगे हैं । इसकी वजह से हिन्दू राष्ट्र की मांग बढ़ रही है । आज अगर जनमत लिया जाए तो नब्बे प्रतिशत जनता इसके पक्ष में होगी । पिछले समय में नेपाल में राजतंत्र वापसी का नारा जनता की असंतुष्टि का परिणाम है । लोकतंत्र से राजतंत्र में लौटना संभव नहीं है किन्तु अगर जनता को राजा पर यकीन है तो राजा को जनता के बीच जाना चाहिए और खुली राजनीति के तहत उनका प्रतिनिधित्व करना चाहिए । भारत के राजपरिवार खुली राजनीति में आए और जनता की सेवा की और आज भी सेवा कर रहे हैं ।


आजादी के बाद भारत ने इसी संतुष्टि करण को अपनाया था जिसका परिणाम वहाँ का इतिहास बताता है । जाति विशेष का महिमा मंडन और इतिहास में महान बनाकर कई पीढ़ियों को अंधेरे में रखा गया किन्तु अब वक्त बदल गया है । नेपाल कभी गुलाम नहीं रहा लेकिन अगर आज के प्रतिनिधि ने वक्त की नजाकत को नहीं समझा तो कल नेपाल का इतिहास क्या होगा इसका अंदाजा हम बखूबी लगा सकते हैं । बुद्धिजीवी कहेंगे कि राजनीति में धर्म का दखल नहीं होना चाहिए लेकिन विश्व कई राष्ट्र हैं जो अपने धर्म विशेष के नाम पर ही जाने जाते हैं ऐसे में हमें ही यह सीख क्यों ? नेपाल में सनातन पर प्रहार होने की शुरुआत हो चुकी है । इसलिए जनता अगर जीवित है तो उसे अपने जीवित होने का प्रमाण देना होगा और सत्ता को यह सीख लेनी होगी कि जनता के मर्म को समझें और आगामी नीति निर्धारण करें ।
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श्वेता दीप्ति
Dr.Shweta Dipti is Editor of Himalini Hindi magazine from Nepal . Dr. Dipti is also former Head of Department of Hindi in Tribhban University at Kirtipur campus, Kathmandu.



