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क्या सचमुच सनातन को समाप्त किया जा सकता है ? : डॉ. श्वेता दीप्ति

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डॉ श्वेता दीप्ति, हिमालिनी अंक नवंबर । धर्म का अर्थ होता है सही काम करना या अपने कर्तव्य पथ पर चलना । धर्म को नियम भी कहा जा सकता है । हर धर्म के अपने कुछ विशेष नियम और रीति–रिवाज होते हैं । जिससे उस धर्म को एक अलग पहचान मिलती है । दुनिया में कई धर्म पाए जाते हैं जैसे– सनातन धर्म, इस्लाम धर्म, सिख और ईसाई धर्म आदि । किन्तु आजकल सनातन पर बहस जारी है । भारतीय राजनीति में तो कई ऐसे दल हैं जो सनातन को समाप्त करने की ही बात करते हैं । उसी तरह नेपाल में भी इस विषय पर चर्चा होती रहती है ।

पिछले दिनों जब शब्दकोष से ॐ शब्द को हटाने की बात आयी थी उस समय भी सनातन शब्द पर बहस जारी थी । आखिर यह सनातन है क्या ? क्या सचमुच सनातन को समाप्त किया जा सकता है ? यह तो बस ऐसी ही सोच है कि इंसान को सांसों के बगैर जिन्दा देखना या विज्ञान की शब्दों में कहूँ तो आक्सीजन के बगैर जीवित रहने की कल्पना करना ।

मानव शरीर पंचतत्व से निर्मित है, पृथ्वी तत्व, जल तत्व, अग्नि तत्व, वायु तत्व एवं आकाश तत्व । पृथ्वी तत्वमानव शरीर में अस्थि, त्वचा, मासपेशियां, नाखून, बाल का प्रतिनिधत्व करता है । जल तत्वमानव शरीर में रक्त, मल, मूत्र, मज्जा, पसीना, कफ, लार का प्रतिनिधत्व करता है । अग्नि तत्वनिंद्रा, भूख, प्यास, आलस्य, शरीर का तेज, क्रोध, पाचन, शरीर का तापमान का प्रतिनिधित्व करता है । अग्नि तत्व सूर्य के आधीन होकर कार्य करता है और सूर्य के बारे में कुछ कहना सूर्य को दीपक दिखाने के सामन है । वायु तत्वसम्पूर्ण शरीर को संचालित करने का कार्य करता है, वायु तत्व के पांच भागों में विभक्त किया गया है प्राणवायु के रूप में हम जो श्वॉस लेते है वो पहला भाग है, तथा सम्पूर्ण शरीर में घूम घूम कर खून को व्यवस्थित करने का कार्य व्यान वायु का है, उदान वायु बन भोजन को पचाने का कार्य करती है, समान वायु शरीर को शक्ति देने कार्य सम्पूर्ण करता हुआ अपान वायु दूषित वायु को शरीर से बाहर निकाल देता है । आकाश तत्व काम, क्रोध, मोह, लोक, लज्जा, खालीपन, दुख, चिन्ता का मानव शरीर में प्रतिनिधित्व करता है, आकाश तत्व मानव शरीर में मस्तिष्क को नियंत्रण करता है, आकाश तत्व का दूसरा अर्थ शून्य तत्व के रूप बताया गया है ।

और सनातन धर्म में क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा इनकी आराधना की जाती है । अब इस तथ्य से यह सोचने की बानत है कि क्या हम इन तत्वों के बगैर जीवन की कल्पना कर सकते हैं ? हम इन तत्वों में ही ईश्वर को देखते हैं । प्रकृति के कण कण में ईश्वर हैं इसलिए हम प्रकृति की पूजा करते हैं तो क्या प्रकृति को समाप्त किया जा सकता है ? सीधी सी बात है कि जो सनातन का विरोध करते हैं वो स्वयं के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न खड़ा करते हैं । अर्थात आप अपने जन्म को ही गलत साबित करने की कोशिश कर रहे होते हैं ।गीता में सनातन धर्म का वर्णन मिलता है । श्री कृष्ण कहते हैं–

अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च ।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ।

अर्थात– हे अर्ज‘न ! जो छेदा नहीं जाता । जलाया नहीं जाता । जो सूखता नहीं । जो गीला नहीं होता । जो स्थान नहीं बदलता । ऐसे रहस्यमय व सात्विक गुण तो केवल परमात्मा में ही होते हैं । जो सत्ता इन दैवीय गुणों से परिपूर्ण हो । वही सनातन कहलाने के योग्य है । इस श्लोक के माध्यम से भगवान कृष्ण कहते हैं कि जो न तो कभी नया रहा । न ही कभी पुराना होगा । न ही इसकी शुरुआत है । न ही इसका अंत है । अर्थात ईश्वर को ही सनातन कहा गया है ।

हजारों साल पुराना है सनातन धर्म

सनातन धर्म को हिन्दू धर्म या वैदिक धर्म के नाम से भी जाना जाता है । इसे दुनिया के सबसे प्राचीनतम धर्म के रूप के तौर पर सभी जानते हैं । भारत की सिंधु घाटी सभ्यता में सनातन धर्म के कई चिह्न मिलते हैं । अब अगर उस सवाल पर जाएं कि ये धर्म कितना पुराना है तो इसे लेकर भी अलग–अलग दावे हैं । ये धर्म करीब १२ हजार साल पुराना और कुछ मान्यताओं के मुताबिक ९० हजार साल पुराना भी बताया जाता है ।

सनातन का अर्थ क्या है ?
सनातन धर्म उस समय से है जब कोई संगठित धर्म अस्तित्व में नहीं था और क्योंकि जीवन जीने का कोई दूसरा तरीका नहीं था, इसलिए इसे किसी नाम की जरुरत नहीं थी । इसके बाद धीरे–धीरे संगठित धर्मों का निर्माण हुआ । सत्य को ही सनातन का नाम दिया गया । सनातन शब्द सत् और तत् से मिलकर बना हुआ है । जिनका अर्थ यह और वह होता है । सनातन धर्म को मानने वालों को ही हिंदू कहा जाता है । १९वीं सदी में और इसके बाद से सनातन धर्म का इस्तेमाल हिंदू धर्म को बाकी धर्मों से अलग एक धर्म के रूप में दर्शाने के लिए किया गया । ‘सनातन’ का शाब्दिक अर्थ है – शाश्वत या ‘सदा बना रहने वाला’, यानी जिसका न आदि है न अन्त ।
सनातन धर्म में चार युगों का वर्णन किया गया है । ये क्रमशः सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलयुग हैं । वर्तमान समय में कलयुग चल रहा है । इस युग के समापन के पश्चात सतयुग प्रारंभ होगा । ये क्रम अनवरत जारी रहेगा । ऐसे में लोगों के मन में यह सवाल पैदा होता है कि आखिर सतयुग से पूर्व क्या था और सनातन धर्म की उत्पत्ति कैसे हुई है ? इस विषय को लेकर दर्शन शास्त्र के जानकारों में मामूली मतभेद है । कई दार्शनिक वेद को साक्षी मानकर सनातन धर्म की गणना करते हैं । वहीं, कुछ जानकर शास्त्रों को आधार मनाते हैं । आधुनिक इतिहासकारों में सनातन धर्म की सटीक गणना को लेकर व्यापक मतभेद है । आधुनिक समय के इतिहासकार महज प्राचीन भारत के इतिहास का अध्ययन कर सनातन धर्म को समझने की कोशिश करते हैं ।

सनातन धर्म क्या है ?
सनातन शब्द का व्यापक उल्लेख ‘अहं ब्रह्मास्मि और तत्वमसि’ श्लोक से मिलता है । इस श्लोक का अर्थ है कि मैं ही ब्रह्म हूँ और यह संपूर्ण जगत ब्रह्म है । ब्रह्म पूर्ण है । इस सृष्टि के निर्माण के पश्चात भी ब्रह्म में न्यूनता नहीं आई है । कहने का तात्पर्य यह है कि ब्रह्म पूर्ण है । इसे ही सनातन कहते हैं । आसान शब्दों में कहें तो सत्य ही सनातन है ।
ईश्वर, आत्मा, मोक्ष ये सभी पूर्ण और ध्र‘व सत्य हैं । अतः सनातन धर्म का न आदि है और न अंत है । कहने का अभिप्राय यह है कि अनादि काल से सनातन धर्म चला आ रहा है और अनंत काल तक रहेगा । सनातन अनंत है । इस सत्य को ही सनातन कहा जाता है । सनातन के माध्यम से ईश्वर,आत्मा और मोक्ष का ज्ञान होता है । विज्ञान के लिए भी मृत्यु पहेली बनी है । सनातन धर्म में ईश्वर, मोक्ष और आत्मा को तत्व और ध्यान से जाना जा सकता है । इस धर्म के प्रारंभ वर्ष की गणना करना कठिन है, किंतु वर्तमान साक्ष्य के आधार पर सनातन धर्म अनंत काल से चला आ रहा है । इस धर्म का मूल सार पूजा,जप–तप,दान,सत्य, अहिंसा, दया, क्षमा और यम–नियम हैं । ऐसा कहा जाता है कि देवों, ऋषि–मुनियों और यहां तक कि साधारण मनुष्य ने भी इसी मार्ग पर चलकर अपना उत्थान किया है । सनातन में ॐ को प्रतीक चिह्न माना जाता है । इस धर्म में शिव–शक्ति, ब्रह्म और विष्णु को समान माना गया है । कहने का तात्पर्य यह है कि सभी संप्रदाय के लोग सनातन को मानते हैं । इस धर्म में शास्त्रों की रचना संस्कृत भाषा में की गई है ।

प्रमुख आराध्य
सनातन धर्म में त्रिदेव–ब्रह्मा, विष्णु और महेश को प्रमुख आराध्य माना गया है । भगवान शिव के बारे में कहा जाता है कि अरण्य संस्कृति में भी उनकी पूजा की जाती थी । यह वह समय था, जब मानव सभ्यता का विकास नहीं हो पाया था । कालांतर में अरण्य संस्कृति ही आगे चलकर सनातन यानी जीने का आधार बनी । उस समय से भगवान शिव को सनातन का आधार माना गया है । विज्ञान वर्तमान समय तक आत्मा की गति को समझने में असफल रहा है । हालांकि,सनातन धर्म में ऋषि–मुनियों ने ध्यान कर ब्रह्म,ब्रह्मांड और आत्मा के रहस्य को उजागर किया । वेदों में सर्वप्रथम ‘मोक्ष’ का वर्णन मिला है । आत्मा की गति मोक्ष है । अतः सनातन धर्म में पुनर्जन्म का विधान है ।

सनातन एक अकेला धर्म है, जो सबकी भलाई की बात करता है । हमारे धर्म ग्रंथ वेद, पुराण, उपनिषद, श्रीमद्भगवद गीता, श्रीरामचरितमानस सब अलग–अलग काल खंड में लिखे गए और ये सब हमारे आधार ग्रंथ हैं । राम और कृष्ण का जन्म अलग–अलग युग में हुआ, उन्होंने अपने जीवन से आदर्श प्रस्तुत किया तो दुष्ट शक्तियों का नाश करने में देर नहीं की । यही सनातन है । यही सच है । सनातन कभी किसी धर्म की आलोचना नहीं करता, वह सबमें समाया हुआ है ।

मना जाता है कि सूर्य सिद्धांत के अनुसार सनातन धर्म अरबों वर्ष पुराना है । सनातन धर्म में ग्रह–नक्षत्र भी समाए हुए हैं । सप्तऋषि, सप्ततीर्थ अयोध्या, मथुरा, माया (हरिद्वार), काशी–कांची, अवन्तिका (उज्जैन), पुरी, द्वारिकाधीश सनातन धर्म के आधार हैं । वाल्मीकि रामायण में ६४ हजार तीर्थों की गणना की गयी है । चार युग में चार मंदिरों की चर्चा की गयी है । सतयुग में बद्रीनाथ–केदारनाथ, त्रेता में रामेश्वरम, द्वापर में द्वारिकाधीश तथा कलयुग में जगन्नाथ पुरी हैं । ऐसे में जिस धर्म का रिश्ता सतयुग से हो, उस पर सवाल उठाना दुर्भाग्यपूर्ण है ।

“सन् ज्ञानम् तनोति विस्तार यति इति सनातनः”

अर्थात, जो शाश्वत, चिर–स्थाई, निरंतर ज्ञान का विस्तार करे, वही सनातन है । धारयेति धर्मः अर्थात जो धारण किया जाए, वही धर्म है । जिसका ज्ञान अनादि काल से श्रुति, स्मृतियों, वेद, पुराण, इतिहास के माध्यम से हमारे बीच उपलब्ध है, वही सनातन है ।
सनत्कुमार संहिता में अंकित श्लोक इसे और स्पष्ट करता है–‘सनातनम् राम महम् भजामि’ अर्थात् हम सभी सनातनी प्रभु श्री राम का भजन करते हैं । उत्तर रामचरितम में दर्ज है– ‘शाश्वतम् दृढ़, स्थिरम्, एष धर्मः सनातनः’ अर्थात जो शाश्वत हो, जो दृढ़ स्थिर हो, जो निरंतर हो, जो आदि अंत रहित हो, वही सनातन है । इसे ही सरल शब्दों में सत्य सनातन वैदिक धर्म कहते हैं । सनातन वह है जो विश्व कल्याण की बातें करता है ः
“सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत् ”
अर्थात, सभी प्राणी मात्र सुखी हों, सभी संतुष्ट हों, निरोगी हों, सभी सज्जन हों, किसी को किसी भी प्रकार का दुःख न रहे । यह सनातन का मूल है, आत्मा है । सत्य सनातन वैदिक धर्म की परिकल्पना वसुधैव कुटुंबकम् की है । श्रीरामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदासजी, लिखते हैं–

“अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा, सब सुंदर सब बिरुज शरीरा नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना, नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना”

अर्थात सनातन कल्पना करता है–किसी की अल्प अवस्था में मृत्यु नहीं होती, न किसी को कोई पीड़ा होती है । सभी के शरीर सुंदर और निरोग हैं । न कोई दरिद्र है, न दुःखी है और न दीन है, न कोई मूर्ख है और न शुभ लक्षणों से हीन है ।

पौराणिक मान्यताओं की ओर जाएं तो पता चलता है कि सनातन अर्थात हिन्दू धर्म में सबसे पहले ९०५७ ईसा पूर्व स्वायंभुव मनु हुए । ६६७३ ईसा पूर्व में वैवस्वत मनु हुए । श्रीराम का जन्म ५११४ ईसा पूर्व और श्रीकृष्ण का जन्म ३११२ ईसा पूर्व बताया गया है ।

सनातन धर्म के कुछ और स्थापित सच–
५५४ साल पहले सिख धर्म के संस्थापक गुरुनानक देव जी का जन्म भारत भूमि पर हुआ था । उन्होंने सनातन धर्म की रक्षा करते हुए अपना शरीर त्यागा । उनके पीछे सभी दस गुरुओं ने भी वही काम किया ।
६७१ साल पहले एक पीर बाबा का जन्म हुआ । उन्हें रामसा पीर कहा जाता था । कुछ लोग उन्हें द्वारिकाधीश का अवतार भी कहते थे । उनका नाम बाबा रामदेव था ।

१०१६ साल पहले भारत भूमि के सिंध प्रांत में हिंदुओं की रक्षा के लिए वरुण देव ने झूलेलाल के रूप में जन्म लिया । उन्हें जिंद पीर एवं लाल शाह के नाम से भी जाना–पहचाना जाता है ।
गुरु गोरक्ष नाथ का जन्म साल ८४५ में हुआ । उन्होंने अपना पूरा जीवन सनातन धर्म की रक्षा,प्रचार–प्रसार में लगा दिया । मतलब ११७८ साल पहले इस महान संत ने भारत की धरती पर अवतार लिया । आदि शंकराचार्य ने सनातन यानी हिन्दू धर्म को नए सिरे से सजाया–संवारा । १२३५ साल पहले जन्म लेने वाले इस संत ने महज ३२ साल की उम्र में दुनिया को त्याग दिया था । चार धाम या चार पीठों की स्थापना का श्रेय उन्हीं के खाते में है ।
सम्राट हर्षवर्धन, सम्राट चन्द्रगुप्त द्वितीय, सम्राट विक्रमादित्य, आचार्य चाणक्य जैसी महान लोगों ने भी सनातन धर्म की लंबी सेवा की ।

इस तरह देखा और माना जाना चाहिए कि सनातन धर्म दुनिया का सबसे पुराना धर्म है । अनेक धर्म इससे निकले हैं । इस पर कोई विवाद नहीं हो सकता । अगर कोई इसे समाप्त करने की चेष्टा करता है तो यह उसकी अपनी अज्ञानता ही कही जाएगी, क्योंकि सनातन धर्म को समाप्त करना मुमकिन नहीं है । इस समय सनातन धर्म को मानने वाले लोग दुनिया के हर हिस्से में मौजूद हैं । वे अपनी संस्कृति का न केवल प्रसार कर रहे हैं बल्कि जड़ों से जुड़े भी हुए हैं ।



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