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मगध के राजगीर में अंतरराष्ट्रीय कवि सम्मेलन

राजगीर से अजयकुमार झा । हरे-भरे घने जंगलों, प्राकृतिक दृश्यों और पांच पहाड़ियों के बीच बसा राजगीर भारत का पवित्रतम स्थल माना जाता है। राजगीर न सिर्फ एक प्रसिद्ध धार्मिक तीर्थस्थल है, बल्कि एक खुबसूरत हेल्थ रेसॉर्ट के रूप में भी लोकप्रिय है। देव नगरी राजगीर सभी धर्मो की संगमस्थली है। यहां प्राकृतिक सौंदर्य के साथ विविध संस्कृतियां अपनी अपनी फुलझड़ियों को संजोने का भी काम किया है।
आज नालंदा विश्वविद्यालय के रज कण को छूकर देश भर के हजारों साहित्यकार न सिर्फ गौरांवित  महसूस करते हैं बल्कि उनकी लेखनी बिहार और बिहारी संस्कृति, सभ्यता की ओर अग्रसर होगी। धर्म, शिक्षा और इतिहास के शाश्वत परिवेश में यह आयोजना एक मिसाल होगा। बड़े बड़े साहित्यकार शामिल हुए इस आयोजन में गुजरात विरायतन की साध्वी गण, प्रदेश हिंदी संस्थान की प्रधान संपादक डॉ अमिता दुबे, भारतीय संसद की भाषा अधिकारी डॉ नमिता राकेश, इलाहाबाद विश्वविद्यालय की पूर्व निदेशक
और न्यायाधीश रही डॉ विमला व्यास, सिक्किम की साहत्यकार राधा पांडे, मालवा इंदौर की हेमलता शर्मा, सीमा वर्णिका, कानपुर, दिलीप कुमार रमण, मुजफ्फरपुर, डॉ. नीलिमा वर्मा निशिता, डॉ अरूणा पांडेय, जबलपुर, अजय कुमार झा जनकपुर धाम नेपाल, रेखाकुमारी राय जनकपुर धाम नेपाल, डॉ विद्यासागर उपाध्याय, बलिया, हिंदी दैनिक दस्तक प्रभात के संपादक प्रभात वर्मा, कार्यक्रम अध्यक्ष जितेंद्र आर्यन, डॉ शाद बलरामपुरी बलरामपुर, डॉ सरस्वती प्रसाद पांडेय, विनय कुमार बुद्ध, आसाम सहित सैकड़ों साहित्यकार मौजूद रहे।


इस में कवि सम्मेलन, सेमिनार, शोध पत्र प्रस्तुति, लघु कथा वाचन, समीक्षा सत्र सहित बहु भाषिक काव्य पाठ तथा साहित्यिक विधा से जुड़े अन्य सत्र आयोजित किए गए। साथ ही इस आयोजन में भाग लेने वाले प्रतिभागियों के लिए सम्मान समारोह का विशेष रूप से आयोजन किया गया।
भारत की पुरातन राजधानी रही राजगीर आज अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन स्थल है। यह भूमि सनातन, बौद्ध, जैन धर्म से जुड़े महान परिवर्तनों का संगम रहा है। इस ऐतिहासिक भूमि पर हो रहे साहित्यिक आयोजन का उद्देश्य भारत को साहित्यिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में सबल बनाना है। देश भर के लगभग एक दर्जन साहित्यकारों के पुस्तको का विमोचन किया गया।
आधुनिक साहित्याकाश में मगध सहित बिहार का प्रतिभाग विस्तृत करना और लेखन में बिहारी सामग्री का समावेश कराना है। बिहार के गौरवशाली साहित्यिक विरासत को संरक्षित रखने के लिए देशभर के साहित्यकारों का यह मैत्री सम्मेलन सराहनीय है। राम रतन सिंह रत्नाकर ने कहा कि बिहार की भूमि साहित्य के लिए उर्वर धरा रही है। द्वापर कालीन साहित्य में भी मगध, अंग सहित बिहार के कई महत्वपूर्ण स्थलों का परिचय मिलता है। कालांतर में इस भूमि ने सिर्फ कई साहित्य मनीषियों को जन्म दिया बल्कि देशभर के साहित्यकारों के लिए प्रेरणा स्थल भी रही है।


दो दिनों तक कई सत्र होंगे। आयोजन के संयोजक कवि ओंकार शर्मा कश्यप के,अशोक स्मृति संस्थान के अध्यक्ष जितेंद्र राज आर्यन, उपाध्यक्ष रौशन कुमार, शैलेंद्र कुमार प्रसून ने बताया कि यह कार्यक्रम अपने लेखकीय श्रम से साहित्याकाश को दीप्त करने में लगे भारत वर्ष के कवि साहित्यकारों को 48 घंटे के लिए एक आंगन में लाने के लिए एक प्रयास है। अशोक स्मृति संस्थान, लेख्य मंजूषा, मगध साहित्य प्रेरणा मंच के द्वारा आयोजित होने वाला यह कार्यक्रम विशुद्ध साहित्यिक कार्यक्रम समाज में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। पद्मश्री आचार्य श्री चंदना दीदी ने दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक अनुष्ठान का उद्घाटन किया। राम रतन सिंह रत्नाकर की अध्यक्षता में शनिवार को शुभारंभ हुआ। राजगीर शहर के विजय निकेतन होटल में आयोजित इस साहित्यिक उत्ताव में देश के 21 राज्यों और नेपाल लगायत 121 से अधिक लेखक कवि शामिल हैं।
उद्घाटन समारोह में पद्मश्री आचार्य श्री चंदना दीदी ने कहा कि साहित्य समाज में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता हैं। राजगीर में देश भर के साहित्यकारों का यह संगम काफी महत्वपूर्ण है। नवादा के सांसद चंदन सिंह जी ने अपने मंतव्य में कहा कि, “यह आयोजन आगे भी होता रहे; इसके लिए हर संभव मदद करता रहूंगा। ” जैन धर्मालंबियो के केंद्र स्थल, ” विरायतन ” के प्रमुख पद्मश्री आचार्य श्री चंदना दीदी ने कहा कि अगला कार्यक्रम विरायतण के इस पावन परिसर में ही किया जाए। और इसका व्यवथापन खर्चा मेरे ओर से रहेगा। रहना और खाना सब कुछ।


ध्यान रहे! बिहार राज्य के नालंदा जिले में स्थित राजगीर शहर कभी मगध साम्राज्य की राजधानी हुआ करती थी जिससे बाद में मौर्य साम्राज्य का उदय हुआ। राजगीर बह्मा की पवित्र यज्ञ भूमि, संस्कृति और वैभव का केंद्र, जैन तीर्थकर महावीर और भगवान बुद्ध की साधना भूमि रहा है। ए वही भूमि है; जहां अस्तित्वको जितने बाला भगवान महावीर के चरण रज उपलब्ध है। ए वही भूमि है; जहां चार आर्य सत्य के प्रणेता हमारे दसवां अवतार भगवान बुद्ध ने घनघोर तपस्या कर ज्ञान का संचरण किया था। जिसका अवशेष यहां के खंडहरों और प्राज्ञों में देखा जा सकता है। ए वही भूमि है; जहां महा तपस्वी महामोग्लाना अपनी अभाओं से आज भी हमें आंदोलित कर रहे होते हैं। ए वही भूमि है; जहां सारिपुत्त जैसे परम विद्वान के वैचारिक तरंग आज भी महसूस किए जाते हैं। यहां की कण कण में महा कश्यप के मौन को सुना जा सकता है। यह परम सुंदरी आम्रपाली और परम करुणावन बुद्ध का संगम, समर्पण और मनोरम भूमि है। इस धरा पर जन्म लेना और निवास करना दोनो सौभायशाली होने का द्योतक है।
इसका जिक्र ऋग्वेद, अथर्ववेद, तैत्तिरीय पुराण, वायु पुराण, महाभारत, बाल्मीकि रामायण आदि में आता है। जैनग्रंथ विविध तीर्थकल्प के अनुसार राजगीर जरासंध, श्रेणिक, बिम्बसार, कनिक आदि प्रसिद्ध शासकों का निवास स्थान था।


पटना से लगभग 97 किमी और नालंदा से 19 किमी दूर राजगीर हिन्दू, जैन और बौद्ध तीनों धर्मो के धार्मिक स्थल हैं। खासकर बौद्ध धर्म से इसका बहुत प्राचीन संबंध है। बुद्ध अपने जीवन काल में कई वर्षो तक यहां ठहरे थे। यहीं उनके  उपदेशों को लिपिबद्ध किया गया था। राजगीर शांति और सौहार्द का स्तंभ है जो आज भी प्राचीनकाल के अवशेष से भरा पड़ा है। भगवान महावीर ने अपना प्रथम प्रवचन राजगीर के विपुलागिरि नामक स्थान पर प्रारंभ किया था। राजगीर पांच विश्व में प्रसिद्ध चट्टानी  पहाडि़यां ” विपुलगिरि, रत्‍‌नागिरि, उदयगिरि, स्वर्णगिरि और वैभारगिरि से घिरी है। यहां लोग गृद्धकूट पर्वत, राजा बिम्बसार द्वारा निर्मित वेणुवन, वैभव पर्वत की सीढि़यों पर मंदिरों के बीच गर्म जल के कई झरने (सप्तधाराएं) हैं जहां सप्तकर्णी गुफाओं से जल आता है। इन झरनों के पानी में कई चिकित्सकीय गुण होने के प्रमाण मिले हैं। पुरुषों और महिलाओं के नहाने के लिए 22 कुंड बनाए गए हैं। इनमें ब्रह्मकुंड का पानी सबसे गर्म (45 डिग्री से.) होता है। इसमें डुबकी लगाना मानसिक और शारीरिक समस्याओं से मुक्ति का कारण बनता है।
आज पद्मश्री आचार्य श्री चंदना दीदी के प्रेमाग्रह पर सुबह 9 बजे विरायतन भ्रमण का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उनके प्रेम और करुणा से ओतप्रोत शिक्षा, सेवा और साधना से संबंधित विषयों पर दिव्य प्रेरक वचनों को श्रवण करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। दीदी ताई मां द्वारा बताया गया कि, “नेपाल के भूकंप पीड़ितो के लिए विशेष सेवा तथा योगदान की योजना बनाई गई है।”


अत्यधिक मधुर तथा दिव्य स्वाद से पुरित बाल भोग के साथ ही पुस्तक और आश्रम में निर्मित च्यवन प्रास रूपी उपहार तथा आशीष प्राप्त कर पुनः कार्यक्रम स्थल पर लौट आए। सांसद श्री चंदन सिंह जी के सान्निध्य में साहित्यकारों के सम्मान के लिए भव्य आयोजन किया गया। अत्यधिक खुशनुमा माहौल में सम्मान कार्यक्रम के सफलता के बाद कविता पाठ सत्र दो, लघु कथा सत्र, वाहुभाषिक कविता पाठ और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आनंद में सराबोर होने का मौका मिला। कवि ओंकार शर्मा कश्यप के संयोजकत्व में पूर्ण सफलता पूर्वक संपन्न यह कार्यक्रम से मगध साहित्य के क्षेत्र में एक इतिहास को रचा गया है। कार्यक्रम के समापन सीताराम विवाह के अतिथि सत्कार को गीत ( हे पहुना एहि मिथिले में रहूं न…!) में प्रस्तुत करते हुए संपन्न किया गया।



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