कैलाश महतो, नवलपरासी । दुनिया के राजनीति में राष्ट्रप्रेम, देशभक्ति, राजद्रोह और मानव अधिकार जैसे शब्दों का प्रयोग धडल्ले से होता रहा है । मगर उपरोक्त फिर शब्दों के प्रयोग न तो किसी शासन (राजनीतिक, आर्थिक, प्रशासनिक या उच्च व्यावसायिक) व्यवस्था के लिए और न किसी गरीब, दलित और निम्न वर्ग के लोगों के लिए कोई मायने रखते हैं । दरअसल इन शब्दों के जाल में पडने बाले वर्ग और समाज प्राय: मध्यम वर्ग के लोग ही होते हैं । जितना देशप्रेम, राष्ट्रभक्ति तथा मानव अधिकार की बातें मध्यम वर्ग के लोग उठाते हैं, वही आवाज शासकों के लिए बेहरीन हथियार और खिलौने बनते रहे हैं । ये शब्द झुग्गी और झोपडपट्टियों के लिए कल्पनाऔर शोषण का मीठा तलवार बने बैठा हैं ।
मानव अधिकार और देश व जनप्रेम के नंगे तस्वीरों के नमूना पहाडों के जनजातियों, मधेश के सारे गलियारों और भारत के हर रेलवे स्टेशन, रेल लिकों के बगलों, गरीब बस्तियों, बस अड्डे, रेलवे लाइनें और बस सडकों के किनारों पर बखुबी देखा जा सकता है, जहां इस सुक्खे मौसम में भी गरीबों के घर के सामने गन्दे पानियों की जमावडा और गन्दगी बाली फटेहाल बदसूरत झोपडियां और बस्तियां देखी जा सकती हैं । जिन्दगी की काली करतूतें उन बस्तियों में आज भी वैसे ही नृत्य करती नजर आती हैं, जैसे किसी अनहोने कल्पनाओं के नर्क में होते होंगे ।गोरखपुर से मुजफ्फरपुर के सप्तक्रान्ति ट्रेन के S1 के डब्बे में हो रहे भारतीय राजनीतिक बहस में BJP vs Congress और अन्य दलों के उपर गरमागरम बहस के बीच रास्ते में अचानक एक Phd के Researcher विद्वान् का प्रवेश होता है । चल रहे राजनीतिक बहस में प्रवेश लेते हुए उन्होंने भारतीय राजनीति का एक पोल खोला । पोल खोलते हुए उन्होंने बताया कि दो तीन प्रतिशत के उच्च तथा कुलीन बडे कहलाने बाले महत्वपूर्ण व्यक्ति और परिवार किसी भी चुनाव में किसी भी तरफ से या विरोध में मतदान करने मतदान केन्द्र पर नहीं जाते हैं । वे लोग घण्टों लाइन में खडे होकर मतदान करना अपने प्रतिष्ठा का विरुद्ध मानते हैं । मतदान करने बाले लोग वे ही होते हैं, जो घाम और पानी, सर्द और गर्म मौसम में अन्न पैदा करते हैं ।हकिकत तो यह है वे ही लोग अपना मत देकर संसद और सरकार बनाते हैं, जिन्हें चुनावों के परिणामों से आजतक कुछ अच्छाई की लाभ नहीं हुई है । पार्टी के नाम पर, नेता के लिए और देशप्रेम तथा राष्ट्र भक्ति के नाम पर लडने और मरने बाले सारे वे ही फकीर, कंगाल, बेरोजगार, दलित, दमित और अवसरहीन लोग होते हैं, जिनके झोपडियों के चारों ओर किचड, गन्दगी और अवारापन नाचते होते हैं ।
आश्चर्य की बात तो यह है कि जिन मतदाताओं के मतदान पर राज्य चलता है, राजनीति और सरकार टिकी होती हैं, उसके ठीक विपरीत बाले सेठ, महासेठ, पेटु, तानाशाह, धार्मिक व आध्यात्मिक पण्डे, पुरोहितों और मतदानीय रणछोड सुकुमार लोग सारे राजनीति, अर्थनीति और समाजनीति को अपने मुट्ठी में भिंचकर रक्खे होते हैं ।
गरीबजन नेताओं की जयजयकार, मेहनतकश लोग मेहनत और मध्यमवर्गीय लोग अपने लाठी के बलपर नेताओं और धनपतियों को सेवा और सुरक्षा प्रदान कराते हुए जीवन सारा चम्चागिरी और गुलामी में बिता देते हैं और परजिवी राज और धननेता मिलकर एक जत्था का निर्माण करता है, जो धर्म, धार्मिकता, पुण्य, दान, दक्षिणा, सेवा, आदि के नाम पर मठ, मन्दिर, चर्च, मस्जिद और गुरुद्वारा निर्माण कर शान्ति का पाठ पढाते हैं, दान लेते हैं, मोक्ष और स्वर्ग का टिकट बेचते हैं । मोक्ष और स्वर्ग के लालच में तकरीबन ९६% लोग राजनेताओं और धार्मिक दांवपेचों के आड में बनाये गये धार्मिक स्थलों और मठाधिशों के लच्छेदार प्रलोभनों में अपने घर के दो चार पैसे को भी उन्हीं राज्य, नेता और धार्मिक ठेकेदारों को चढा देते हैं ।
स्वभावत: राज्य और धार्मिक आतंकियों का दया और सहानुभूति व्यक्ति का मुंह बन्द कर देता है, वहीं शिक्षा व्यक्ति को सवाल करने को कला और हिम्मत सिखा देता है, जो न तो राज्य और न सरकार चाहता है कि उससे कोई खडा सवाल करे, न वे शोषित और छलित लोग समझ पाते कि उसका वास्तविक धर्म और राजनीति क्या है । इसलिए राज्य और सरकार हमेशा अपना वफादार पालकर रखता है, जो कोई उसके सामने कोई सवाल न खडा कर सके । सरकार उसे खाद्यान्न और कुछ भत्ते देते जाते हैं इस उद्देश्य से कि वह केवल सरकार का जयजयकार करे, प्रचार प्रसार करे, उसका कोई शिकायत और विरोध ना करे ।
मन्दिर, मस्जिद और तीर्थ स्थलों समेत में शोषण और विभेद पसरे हुए हैं । जिस गरीब और क्षुद्र अछुतों को गांधी ने हरिजन (भगवान का प्रियजन) कहा, वो आज भी भगवानों के विशाल दरवारों के सामने फटेहाल, कंगाली और बदनसिबी का जिन्दगी जीने को बाध्य हैं । उसी के सामने दूर दराज से अपना शान शौकत और आधुनिकता को प्रदर्शित करने आए लोगों के सामने वे गरीब और हरिजन अनायास भिखारी और दयापात्र के रुप में चिल्लाते सुनाई देते हैं । यह तस्वीर हर मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारा और चर्च में दिखाई देगा । कहना यह अतिशयोक्ति नहीं हो सकता कि मन्दिर, मस्जिद और धार्मिक पण्डों/पुजारियों ने बडी गहरी साजिश के तहत सामन्तों को बचाने और गरीबों को सताने का राजनीति का इजात किया है ।
बडी चालाकी से राजनेताओं ने दु:खहरनी मन्दिर, मोक्षधाम मन्दिर, विश्वशान्ति मन्दिर, मनोकामना मन्दिर, आदि जैसे स्थलों का निर्माण कर लोगों को उनमें फांसॐने और राज्य में रहकर उन भोलेभाले लोगों को लूटने का काला धन्धा चला रक्खे हैं और लोग भेंड के तरह चढावा, दान, मन्नत और चढावा चढाए जाते हैं । वेचारे को यह पता भी नहीं चलने दिया जाता कि सही भगवान और सही लक्ष्मी कहां किसके पास ठहर जाती हैं, उसका मोक्ष क्या है । ( नालन्दा के राजगीर में अवस्थित धार्मिक व ऐतिहासिक स्थलों में भी तीर्थयात्री के लूट के तरीकों से परेशान होकर हमने धार्मिक दर्शन छोड दी) ।
लोगों को यह तय कर लेना चाहिए कि मानव सेवा के लिए धार्मिक महलें बनाना हितकर है या जरुरतमन्दों के लिए घर और विधायक रोजगारों की इमारतें बनाना उपयुक्त है । अगर धर्म और धार्मिकता पर लोगों की सेवा तय है, तो यह स्पष्ट है कि राजनेताओं और उससे निर्मित सारे धार्मिक स्थलों और भगवान व देवी देवताएं शोषक और सामन्ती हैं । यह तय है कि विकास वहीं पर पहरा दे रखा है, जीवन वहीं पर सहज और सरल है, जहां पर हमारे देवी देवताएं पूजे नहीं जाते ।
देशद्रोह और मानव अधिकार भी शासकों का बेहतरीन हथियार हैं, जिसके प्रयोग से वे गरीबों और शुद्रों का हलाल और राजनीतिक एवं धार्मिक नेताओं को मालामाल करता है । असल में न तो देशप्रेम होना चाहिए, न मानव अधिकार की चर्चा । क्योंकि इनका चर्चा होने का अर्थ ही अन्याय और विभेदों थप सशक्त किया जाए ।
ओशो ने बडी सही बात कही है कि महाभारत के अनुसार जब भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि वे तब तब धरती अवतरित होंगे, जब जब यहां अन्याय होगा । मतलव साफ है कि धरती से अन्याय कृष्ण हटाना ही नहीं चाहते । उसी के आड में तो वे धरती पर मजे के लिए अवतार लेते रहेंगे । यह बहुत सोची समझी राजनीति है गरीबों और पीडितों पर ।
हर आदमी चाहता है कि उसे ऐसे डाक्टर और दवा मिले, जिससे उसका दु:ख और परेशानी हमेशा के लिए मिट जाए । मगर हमारे भगवान कृष्ण चाहते हैं कि धरती परबार बार कष्ट आता रहे । कष्ट देने बालों से कहीं कृ्ष्ण का कोई आपसी तालमेल तो नहीं ?
धार्मिक लोग बडे गर्व से कहते हैं कि हमारी धरती पुण्यात्माओं से भरे परे हैं । यहां हिन्दुओं के २४ महान् असत्मा, बुद्धों के २४ बुद्धहस्त आत्माएं और जैनों के भी २४ तीर्थाङ्करों ने सुशोभित किया है । परन्तु सवाल आज भी खडा है कि दश अवतार और इतने महान् आत्माओं के धरती पर हुए आगमन के बावजूद मानव पीडित, कष्टपूर्ण, विभेदपूर्ण और कलंकित है । ये सारे आत्मा और परमात्मा न जाने किन आपदाओं को हटाने आए और हजारों नये नये फंसाद पैदा हो गये !
उपरोक्त वैचारिक प्रश्नवाचक धारणायें मेरी नहीं, बल्कि ओशो, चार्वाक, जरथुस्त्र, थोरो, हेरोडेट्स, नागार्जुन, आदि के भी हैं । हम चाहते हैं कि पूरानी समस्या पूर्णत: समाप्त हों ता कि नये को समाधान के लिए नये मार्ग निर्माण किए जा सकें । शास्वता वही है, विकास उसी में नीहित है ।
विचार करने बाली बात यह भी है कि जो विद्रोह विगत में आज के नेताओं ने की, उसी प्रकार के विद्रोह करने बाले व्यक्ति और समूहों राज्य और सरकार देशद्रोही कैसे हो परिभाषित कर देता है ? राजनेताओं द्वारा प्रतिपादित मानव अधिकार से किस मानव का रक्षा होता है ? – इस पर समाज को चिन्तन और विद्रोह करना जरुरी है ।


