भिजनवाला नेतृत्व की खोज : अजयकुमार झा
देश इस समय सफलता और विफलता के बीच खड़ा है। यदि 84 के आगामी चुनाव में मिशनरी नहीं बल्कि दूरदर्शी जीतें तो विजन 99 तक के पंद्रह वर्षों में देश को पुनरुद्धार मिल सकता है। मलेशिया, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, इथियोपिया जैसे देशों को जब एक दूरदर्शी नेता मिला तो उन्होंने 15 से 30 वर्षों में देश को एक समृद्ध और शक्तिशाली देश बना दिया। अत: अब नेपालियों को किसी मिशनरी को नहीं, बालेन जैसे दूरदर्शी को राजनीति की वागडोर सौंप देना चाहिए। भूमि से प्राप्त खनिज पदार्थों का जब हम प्रयोग करते हैं तो उससे पहले हम उसका भरपूर प्रशोधन करतें हैं। परंतु जब देश चलना हो; देश का भविष्य निर्माण करना हो तो हम गुंडा, माफिया, ठेकेदार और अपराधियों के हाथों में सौंप देते हैं। अनेक प्रलोभन और मजबूरीयों के कारण ऐसा होता होगा; परंतु तात्कालिक लाभ, दारू मांस का भोज और जातीय सम्मोहन हमारी दुर्दशा का मओओल कारण है।
नेपाल के हर राजनीतिक आंदोलनों और बदलाव पर नजर डालें तो युवाओं की भूमिका सबसे अग्रणी दिखाई पड़ेगी। आंदोलन को संचालित करना, व्यवस्थापन तथा नियंत्रण का जिम्मा लेने के साथ ही वृद्ध नेताओं के सुरक्षा का जिम्मेवारी जैसे जटिल कार्यों को युवा लोग अपनी कंधो पर ढोते रहें हैं। विश्व के सभी राजनीतिक परिवर्तन और क्रांति को सफलता के अंजाम तक पहुंचाने में वे लोग एक योद्धा की भांति अपनी जवानी और जीवन दोनो को दांव पर लगाते रहे हैं। जबकि वही बूढ़े नेता लोग जिनकी बैशाखी युवा लोग होते हैं; हरेक आंदोलन के सफलता के बाद चुनाव में सफलता लाने के लिए फिर से युवा शक्तियों का इस्तेमाल करना सुरु कर देते हैं। और अपनी अपनी कुटुंबो, नाता , रिश्तेदारों, पैसेवालों, व्यापारियों तथा उद्योग पतियों को हाथों राजनीतिक मूल्य, आदर्श, अवसर और सत्ता को बेचना शुरू कर देते हैं। नेपाल में आज से 17 वर्ष पहले तक जो माओवादी खूनी जनयुद्ध चल रहा था; वह इसका ज्वलंत उदाहरण है। अपना जीवन उत्सर्ग करने वाले लड़ाकू आज खाड़ी देशों में परिवार को बचाने के लिए जी तोड़ परिश्रम करने को बाध्य हैं। तो वही दूसरी ओर बूढ़े नेतालोग अपनी कुर्सी को अपने हाथों में सुरक्षित रखने के लिए अपने बच्चों को भी राजनीतिक स्थायित्व प्रदान करने के लिए सारे कुकर्म करने को तैयार रहते हैं। मानवता के नाम पर संसार का सबसे निकृष्ट और पतित संस्कार यही है। जो अपनी सत्ता सुख के लिए अपनों के ही जीवन और भविष्य से खिलवाड़ करे। वह भी निर्लज्जता के हद पार करके।

नीतिगत मामलों में हमारी उलझन भी स्थिरता और समृद्धि का माध्यम बन रही है। आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक, सांस्कृतिक आदि विभिन्न क्षेत्रों एवं क्षेत्रों में अपनायी गयी नीतियाँ विरोधाभासी एवं त्रुटिपूर्ण हैं। चाहे वह तथाकथित वामपंथी विचारधारा की आड़ में लागू की जाने वाली उदारवादी पूंजीवादी अर्थव्यवस्था हो, या फिर घरेलू रोजगार बढ़ाने के बजाय विदेशी रोजगार को बढ़ावा देने का काम हो, या फिर जल्दबाजी में की गई शिक्षा नीति हो। राष्ट्रीय आवश्यकताओं का आकलन किए बिना स्थापित की गई ये सभी गलत नीतियों के कुछ उदाहरण हैं। आर्थिक उदारीकरण के नाम पर लाभकारी उद्योगों को औने-पौने दाम पर बेच दिया गया, लेकिन निवेश और नये उद्योग खोलने का माहौल नहीं बन सका।
राष्ट्र निर्माण के लिए वैकल्पिक अवधारणा और रोडमैप की खोज करते समय स्वाभाविक रूप से उपरोक्त त्रुटियों और कमजोरियों का स्थायी समाधान भी खोजा जाना चाहिए। इस पृष्ठभूमि में, आरपीपी नेपाल ने राष्ट्र निर्माण के लिए एक उपयुक्त वैकल्पिक विचार और रोडमैप के रूप में ‘समर्थन’ के दर्शन को जनता के सामने प्रस्तुत किया है। ‘निरंतरता’ के साथ परिवर्तन का दर्शन है।
सोशल मीडिया और सड़कों पर व्यक्त विचारों/प्रतिक्रियाओं को देखते हुए, सारा गुस्सा मौजूदा व्यवस्था के बजाय इस व्यवस्था का नेतृत्व करने वाली एक पीढ़ी के खिलाफ निर्देशित लगता है। उस सारे गुस्से का सार यह है कि ‘इस पीढ़ी ने दलालों, नौकरशाही, रिश्वतखोरी के साथ मिलकर एक नया अभिजात वर्ग विकसित किया, देश को आर्थिक रूप से गरीब बना दिया, लोकतांत्रिक शासन के सिद्धांतों का उल्लंघन किया और खुद को भ्रष्टाचार और अराजकता में डुबो दिया।’ यह सारा गुस्सा उसी पीढ़ी के खिलाफ है जिसने नेपाल में लोकतंत्र के लिए कीलें खाईं, बच्चों और परिवारों को खोया, धन और खुशियां खोईं। आख़िर ऐसी ‘आदर्श’ पीढ़ी के ख़िलाफ़ गुस्सा क्यों बढ़ गया?
अच्छे नेतृत्व में देश का आर्थिक, सामाजिक एवं भौतिक विकास कैसे टिकाऊ हो? भावी पीढ़ियों के लिए विकास मॉडल क्या होगा? कहाँ, क्या बनाना है? कौन सा उद्योग स्थापित करें? नौकरियाँ कैसे पैदा करें? गरीबी कैसे ख़त्म करें? पिछड़े वर्गों को राष्ट्रीय मुख्यधारा में कैसे लाया जाए? समाज में भेदभाव कैसे ख़त्म करें और शांति, व्यवस्था और सुशासन कैसे कायम रखें? एक स्पष्ट दृष्टि का होना जरूरी है जो आपकी मिट्टी का अध्ययन कर सही मार्गदर्शन दे सके। इसके लिए लीडर वही होता है जो व्यापक शोध और विशेषज्ञों से सलाह लेकर रोड मैप तैयार करने में सक्षम हो। नेतृत्व के लिए निस्वार्थ भाव से स्वयं को और अपना पूरा जीवन देश और जनता के लिए समर्पित करने की क्षमता की आवश्यकता होती है। केवल वही व्यक्ति दृढ़ निश्चय कर सकता है कि मैं सच्चे हृदय से देश और जनता के लिए अपना बलिदान और समर्पण कर सकता हूं और सकारात्मक विकास के लिए किसी के साथ गलत सौदा किए बिना उसी के अनुसार रणनीति अपना सकता हूं।
ध्यान रहे! राजनीति में जब मूल्यों, निष्ठा और त्याग के मूल्यों और मान्यताओं को लात मारी जाती है तब परिवार और समाज में स्वार्थ, षडयंत्र तथा अति-महत्वाकांक्षी प्रवृत्तियाँ उभरने लगती हैं। और इस तरह की प्रवृत्ति से पोषित चरित्र मानव समाज, देश और समग्र विश्व के लिए विध्वंसक सावित होता है। वे तत्काल व्यक्तिगत लाभ और सत्ता के लिए समाज और राष्ट्र को एक दीर्घकालिक, विनाशकारी, आत्मघाती गृहयुद्ध में फंसाने की कोशिश करते हैं। लोगों को लूटने और देश को बेचने की परंपरा से सुसंस्कृत हमारे कुछ नेता और दल पिछले कुछ वर्षों से इसे एक राजनीतिक संस्कृति के रूप में विकसित कर रहे हैं, जिस पर गंभीर होना आज हमारा प्रथम दायित्व बन गया है। बिना किसी पूर्वाग्रह के ऐसी शक्तियों का डटकर मुकाबला किए बिना हम सुरक्षित नहीं रह सकते हैं। यह आज का सामाजिक, राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक तथ्य है।

