Sun. May 19th, 2024

लिलानाथ गौतम, हिमालिनी अंक नवंबर 2023 । देश आर्थिक रूप में संकट उन्मुख है । इसके पीछे विविध कारण है । लेकिन संघीय शासन व्यवस्था के विरुद्ध इस तरह प्रचार–प्रसार हो रहा है कि देश आर्थिक रूप में कमजोर होने के पीछे संघीयता ही एक मात्र कारण है । सामाजिक संजाल तथा कुछ सार्वजनिक मंच में की गई बहस को देखते हैं तो लगता है कि संघीयता से कोई भी सन्तुष्ट नहीं है । जिसके चलते संघीयता विरुद्ध माहौल भी बन रहा है । कुछ व्यक्ति और समूह आन्दोलन करने की भी घोषणा कर चुके हैं ।

इसीलिए प्रधानमन्त्री पुष्पकमल दाहाल प्रचण्ड ने एक सर्वदलीय बैठक बुलाकर कहा कि परिवर्तित राजनीतिक व्यवस्था के विरुद्ध षडयन्त्र और दुष्प्रचार हो रहा है । उसी बैठक में संघीय संसद् में प्रतिनिधित्व करनेवाले गणतन्त्रवादी राजनीतिक शक्तियों ने गणतन्त्र और संघीयता के प्रति एक बार फिर प्रतिबद्धता व्यक्त की है । जाजरकोट भूकम्प से सिर्जित परिस्थितियों की पृष्ठभूमि में आयोजित बैठक में प्रधानमन्त्री प्रचण्ड ने कहा कि देश में जो संकट उत्पन्न हो रहा है, उसको सामना करने के लिए अब गणतन्त्रवादी राजनीतिक शक्तियों का एक होना जरूरी है । साथ में उन्होंने सर्वदलीय सरकार निर्माण की आवश्यकता पर भी जोर दिया । उल्लेखित परिदृश्य से स्पष्ट होता है कि संघीयता और गणतन्त्र के विरुद्ध देश में जो माहोल सिर्जित हो रहा है, उसके प्रति परिवर्तनकारी शक्तियों में से प्रमुख नेकपा माओवादी केन्द्र के नेतृत्व करनेवाले वर्तमान प्रधानमन्त्री प्रचण्ड भी भयभीत होने लगे हैं ।

ऐसी ही पृष्ठभूमि में मधेश प्रदेश सरकार से संघीय सरकार के समक्ष एक और चेतावनी आई है, जो संघीयता कार्यान्वयन को लेकर है । मधेश प्रदेश के मुख्यमन्त्री सरोज यादव के नेतृत्व में एक टोली काठमांडू आयी और प्रधानमन्त्री प्रचण्ड से मिलकर कहा है कि अगर प्रदेश सरकार को पूर्ण अधिकार नहीं दिया जाता है तो आन्दोलन शुरु की जाएगी । प्रधानमन्त्री के साथ ६ सुत्रीय मांग पेश करते हुए टोली ने कहा है कि ३० दिनों के भीतर उक्त मांग सम्बोधन नहीं होता है तो प्रदेश सरकार आन्दोलन में उतरनेवाली है ।

मधेश प्रदेश सरकार की ओर से प्रस्तुत ६ सूत्रीय मांगों में से विशेषतः पुलिस कर्मचारी और निजामती कर्मचारी संबंधी विषय प्रमुख है । नेपाल की संविधान २०७२ के अनुसार पुलिस प्रशासन और निजामती कर्मचारी प्रदेश सरकार के मातहत होना चाहिए । लेकिन कर्मचारी समायोजन के लिए जो काम होना चाहिए, वह अभी तक नहीं हुआ है । इसी के प्रति मधेश सरकार की आपत्ति है । स्मरणीय है, यह मांग सिर्फ मधेश प्रदेश की नहीं है, अन्य ६ प्रदेशों का भी है । लेकिन मधेश प्रदेश इस मांग को लेकर नेतृत्वदायी भूमिका निर्वाह कर रहा है ।

नयी व्यवस्था के अन्तर्गत सम्पन्न प्रथम आम चुनाव के बाद निर्मित सरकार ने वि.सं. २०७४ में ही पुलिस और निजामती कर्मचारी को प्रदेश में समायोजन के लिए प्रतिबद्धता व्यक्त की थी । लेकिन प्रतिबद्धता के अनुसार काम ना होने के कारण वि.सं. २०७५ साल में मधेश प्रदेश सरकार ने ‘प्रदेश पुलिस ऐन २०७५’ निर्माण किया । मधेश प्रदेश सरकार के इस तरह के दबाव के कारण संघीय संसद् ने वि.सं. २०७६ माघ में पुलिस समायोजन ऐन २०७६ पारित किया था । उस समय कहा गया कि ३० दिनों के भीतर पुलिस कर्मचारी समायोजन के लिए आवश्यक विवरण तैयार किया जाएगा । लेकिन आज तक उक्त काम नहीं हो पाया है ।

ऐन पारित होने के बाद पुलिस कर्मचारी समायोजन के लिए मधेश प्रदेश सरकार के नेतृत्व में बार–बार संघीय सरकार को दबाब दिया गया । गत साल भी तत्कालीन मुख्यमन्त्री लालबाबु राउत ने तत्कालीन प्रधानमन्त्री शेरबहादुर देउवा से मिलकर कर्मचारी समायोजन के लिए आग्रह किया था । उस समय कहा गया कि चुनाव के बाद इसको कार्यान्वयन किया जाएगा । चुनाव हो गया, नयी सरकार बन गई, लेकिन आज तक पुलिस कर्मचारी समायोजन के लिए ठोस काम नहीं हो पाया । इसीलिए मधेश प्रदेश के नये मुख्यमन्त्री सरोज यादव इसी मुद्दा को लेकर पुनः काठमांडू आया और संघीय सरकार को ३० दिनों का अल्टिमेटम दिया ।
मधेश प्रदेश सरकार के अधिकारियों का कहना है कि मधेश प्रदेश में आपराधिक घटनाओं वृद्धि हो रही है, लेकिन सरकार के मातहत पुलिस प्रशासन ना होने के कारण प्रदेश सरकार को मूकदर्शक बनना पड़ रहा है । गणतन्त्र पक्षधर बुद्धिजीवियों का भी मानना है कि नेपाल में संघीयता का पूर्ण कार्यान्वयन अभी तक नहीं हो पाया है, लेकिन संघीय व्यवस्था को असफल करार करते हुए उसके विरुद्ध आन्दोलन होने लगा है, जो दुखद है । ऐसी ही पृष्ठभूमि में मधेश प्रदेश सरकार ने संघीयता की पूर्ण कार्यान्वयन का मांग रखते हुए संघीय सरकार को दबाव दिया है । सार्वजनिक अभिव्यक्ति देकर कोशी और लुम्बिनी प्रदेश के मुख्यमन्त्रियों ने भी मधेश प्रदेश को साथ दिया है ।

मधेश प्रदेश सरकार की ओर से प्रस्तुत ६ सुत्रीय मांग का सारांश

१. पुलिस प्रशासनः पुलिस कर्मचारी समायोजन के लिए संघीय संसद् से वि.सं. २०७६ साल माघ २८ गते ऐन प्रमाणित हो चुका है । ऐन बमोजिम आज तक पुलिस प्रशासन, कर्मचारी तथा संरचना प्रदेश को हस्तान्तरण नहीं हो पाया है । परिणामतः संवैधानिक अधिकार प्रयोग के लिए प्रदेश सरकार वंचित है । ऐन की भावना अनुसार अविलम्व प्रदेश पुलिस और प्रमुख जिला अधिकारी को प्रदेश सरकार मातहत रखना होगा ।

२. संघीय निजामती सेवा ऐनः संघीय निजामती सेवा ऐन नहीं बना है, जिसके चलते जनसेवा के लिए प्रदेश सरकार कर्मचारी परिचालन नहीं कर पा रही है । अतः प्रदेश में परिचालित सभी सचिवों को प्रदेश सरकार मातहत रखना होगा । साथ में स्थानीय सरकार में काम करनेवाले प्रशासकीय अधिकृत को भी प्रदेश सरकार मातहत रखना होगा । ऐसी व्यवस्था के साथ तत्काल संघीय निजामति सेवा ऐन संसद् से पारित करना होगा ।

३. सार्वजनिक जमीन का प्रयोगः सरकारी तथा सार्वजनिक जमीन का प्रयोग प्रदेश सरकार के अधिकार में नहीं है । जमीन का प्रयोग एकात्मक शासन व्यवस्था (पुराने नियम) के अनुसार ही हो रहा है । अतः भूमि व्यवस्थापन का अधिकार प्रदेश मन्त्रिपरिषद् में लाने के लिए आवश्यक कानून संशोधन और नीतिगत निर्णय होना चाहिए ।

४. गुठी की जमीनः संविधान की अनुसूची ६, क्रम संख्या २१ के अनुसार गुठी व्यवस्थापन की जिम्मेदारी प्रदेश सरकार का एकल अधिकार है । मधेश प्रदेश में धार्मिक मठ–मन्दिर, पोखरी, गुठी अनेक है, ऐसी संपत्ति की उचित व्यवस्थान ना होने के कारण अतिक्रमण में पड़ रहा है । प्रदेश की एकल अधिकार के रूप में रहे गुठी व्यवस्थापन के लिए संघीय सरकार ने आवश्यक प्रयास नहीं किया है । गुठी व्यवस्थापन संबंधी आवश्यक कानून संशोधन होना चाहिए ।

५. अर्थ संबंधी आधिकार ः अन्तर सरकारी वित्त व्यवस्थापन ऐन, २०७४ की दफा ६ उपदफा (२) के अनुसार मुल्य अभिवृद्धि कर और अन्तः शुल्क कर शीर्षक में संकलित राजश्व में संघीय सरकार की ७० प्रतिशत और प्रदेश सरकार तथा स्थानीय तह की १५–१५ प्रतिशत हिस्सा है । यह गैर न्यायिक वितरण प्रणाली को पुनरावलोकन कर संघीय सरकार को ५० प्रतिशत, प्रदेश सरकार को ३० प्रतिशत और स्थानीय सरकार को २० प्रतिशत अधिकार रहना चाहिए । इसके लिए कानुन में संशोधन किया जाए ।

६. अभियोजन सम्बन्धी व्यवस्था ः जिस विषय में प्रदेश सरकार का एकल अधिकार है, उस में दण्ड, जुर्माना तथा कैद संबंधी व्यवस्था भी है । ऐसी व्यवस्था कार्यान्वयन के लिए प्रदेश सरकार को अभियोजन संबंधी जो अधिकार प्राप्त होना चाहिए, वह प्राप्त नहीं है । अभियोजन संबंधी अधिकार प्रदेश को हस्तान्तरण करने के लिए संघीय सरकार सहजीकरण नहीं कर रही है, जिसके चलते प्रदेश में निर्मित कानून कार्यान्वन में भी जटिलता उत्पन्न हो रही है, समस्या समाधान के लिए आवश्यक पहल किया जाए ।

 

 



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