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कांग्रेस एक बार फिर  विवाद  में

 

काठमांडू, पुष ८– वैसे तो राजनीति किसी की अपनी नहीं है । यहाँ हर दिन किसी न किसी मुद्दें को लेकर मतभेद होते रहते हैं फिर चाहे पार्टी कोई भी हो । अभी की बात अगर करें तो कांग्रेस में विवाद हो रहा है उपसभापति पूर्ण बहादुर खड़का और नेता शेखर कोइराला के बीच । कांग्रेस में उपसभापति पूर्ण बहादुर खड़का और नेता शेखर कोइराला के बीच इस बात को लेकर विवाद चल रहा है कि पार्टी रैंकिंग में दूसरा स्थान कौन लेगा ? कांग्रेस केंद्रीय कार्य समिति के पद के क्रम में अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा के बाद उपाध्यक्ष खड़का हैं ।
१४ वें महाधिवेशन में देउवा के साथ प्रतिस्पर्धा करने वाले कोइराला ने ४० प्रतिशत मत प्राप्त किया । इसके साथ ही ‘वरिष्ठ’ नेता के क्रम में उनका नाम ही आना चाहिए ये मांग संस्थापन इतर पक्ष से उठाया जा रहा है । यदि उन्हें पार्टी में ‘वरिष्ठ’ नेता की हैसियत मिलती है तभी सभापति के बाद वें दूसरे स्थान को प्राप्त कर सकेंगे । अभी पार्टी पदाधिकारियों और पूर्व पदाधिकारियों के बाद उनका नंबर है । जिसके अनुसार कोइराला का स्थान मर्यादा क्रम में २५ वें नम्बर पर है ।
कोइराला को वरिष्ठ नेता सहित का दूसरा स्थान दिया जाए या नहीं यह विवाद आन्तरिक तह में बढ़ती जा रही है । यह विवाद अभी जो प्रदेश सम्मेलन हुआ है उसमें भी दिखाई दिया है ।
संस्थापन इतर पक्ष ने नेतृत्व करने वाले प्रदेश में उपसभापति खड्का को और इतरपक्ष ने नेतृत्व करने वाले प्रदेश में वरिष्ठ नेता की हैसियत देकर कोइराला को सभापति के बाद विशिष्ठ अतिथि में बुलाया गया लेकिन सभापति देउवा के बाद दूसरी वरीयता नहीं पाने की अवस्था में खड्का और कोइराला दोनों ने ही कार्यक्रम का बहिष्कार किया है ।
शनिवार बागमती प्रदेश सम्मेलन उद्घाटन में उपसभापति खड्का और नेता कोइराला दोनों अनुपस्थित थे । प्रदेश कार्यसमिति के सदस्य जगदीशनरसिंह केसी के अनुसार बागमती प्रदेश कार्यसमिति के सभापति इन्द्र बानियाँ ने उपसभापति खड्का को सभापति के बाद विशिष्ट अतिथि के रूप में आमंत्रित किया था लेकिन खड्का सुर्खेत के कार्यक्रम में व्यस्त होने के कारण शाम के समापन कार्यक्रम में ही सहभागी हुए । रही बात कोइराला की तो वें विराटनगर पहुँचे थे ।
जनकपुर में गुरुवार को आयोजित सम्मेलन में भी देउवा के बाद विशिष्ठ अतिथि के स्थान में नहीं रखने के कारण कोइराला सहभागी नहीं हुए । उस दिन वें मधेश प्रदेश के सम्मेलन को छोड़कर इनरुवा पहुँचे थे ।
मधेश सम्मेलन में कोइराला को वरिष्ठ नेता कहकर नहीं वरन केन्द्रीय सदस्य की हैसियत में आमन्त्रण दिया गया । देउवा के बाद वरीयता में कोइराला को रखा गया इसलिए उपसभापति खड्का लुम्बिनी और गण्डकी प्रदेश सम्मेलन में नहीं गए । पार्टी के अन्य जिला में हुए सम्मेलनों में भी जिसमें कोइराला पहुँचते हैं उस कार्यक्रम में खड्का और जिस कार्यक्रम में खड्का पहुँचते हैं उस कार्यक्रम में कोइराला नहीं जाते हैं ।

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अगर पार्टी के विान की बात की जाए तो पार्टी के विधान में ‘वरिष्ठ’ नेता की व्यवस्था नहीं है । ०६४ में तत्कालीन सभापति गिरिजाप्रसाद कोइराला ने कांग्रेस (प्रजातान्त्रिक) के साथ एकीकरण करते समय उसके सभापति देउवा को वरिष्ठ नेता का स्थान दिया था । १२ वें महाधिवेशन से सभापति बने सुशील कोइराला ने अपने प्रतिस्पर्धी देउवा को विधानमा नहीं होने पर भी वरिष्ठ नेता के ही हैसियत से दिया था । १३ वें महाधिवेशन से देउवा सभापति में निर्वाचित होने के बाद रामचन्द्र पौडेल को उसी तरह वरिष्ठ नेता की हैसियत दी थी ।
१४वेंं महाधिवेशन में ४० प्रतिशत मत लाकर देउवा के प्रतिस्पर्धी बने कोइराला को पिछली परम्परा अनुसार ही वरिष्ठ नेता की हैसियत दी जानी चाहिए । ये आवाज संस्थापन इतरपक्षीय नेताओं द्वारा उठाया जा रहा है । वही खड्का सहित के संस्थापन पक्ष के अधिकांश नेताओं का कहना है कि महाधिवेशन में प्राप्त भोट के आधार को ध्यान में रखकर नहीं वरन पार्टी में दिए जाने वाले संघर्ष, योगदान और क्रियाशीलता के आधार में ‘वरिष्ठता’ निर्धारण होना चाहिए । यानी दोनों ओर के नेता अपनी अपनी बातों पर अड़े हैं ।
इसी तरह पूर्वउपसभापति प्रकाशमान सिंह का भी कहना कि पार्टी के भीतर संघर्ष और योगदान के आधार में ही वरिष्ठता निर्धारण होनी चाहिए, और कोइराला को वरिष्ठ नेता स्वीकार्य नहीं होने का संकेत दिया । एक तरह से कहें तो विवाद बढ़ता ही जा रहा है । विधान में व्यवस्था नहीं है अगर इसी तरह विवाद बढ़ता गया तो सदस्यों का कहना है कि अब विधान में यह व्यवस्था रखनी चाहिए । इस विवाद को बहुत ज्यादा लम्बा नहीं करना चाहिए । कांग्रेस पार्टी की अपनी एक मर्यादा है और अब समय आ गया है कि मर्यादा का ध्यान रखा जाए । पार्टी भीतर तक अगर विवाद है तो ठीक लेकिन यह विवाद अगर बाहर आ जाए तो इसके बारे में जल्द से जल्द फैसला हो जाना चाहिए ।

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