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जनकवि शमशेर बहादुर सिंह, कैफ़ी आज़मी व महाश्वेता देवी को जयंती के अवसर पर याद किया गया

 

जनकपुरधाम/मिश्री लाल मधुकर । जनकवि शमशेर बहादुर सिंह, कैफ़ी आज़मी एवं प्रख्यात जनवादी लेखिका महाश्वेता देवी की जयंती के अवसर पर जन संस्कृति मंच के तत्वावधान में14जनवरी को दरभंगा मेंविचार गोष्ठी आयोजित की गई।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए विशिष्ट अतिथि मिथिला विश्वविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. उमेश कुमार उत्पल ने कहा कि शमशेर को याद करना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि उन्होंने कविता के प्रतिमान के संबंध में मौलिक स्थापनाएं दीं।

रीतिकाल के बाद आधुनिक युग में संभवतः शमशेर ही ऐसे अकेले कवि हैं जिन्होंने माना कि कविता की परिणति चित्र में होती है।

मातृशोक, जीवनसंगिनी के वियोग से उपजे खालीपन को उन्होंने कविता के द्वारा भरा। यह उद्दातीकरण उनकी कविताओं में परिलक्षित होता है।

उन्होंने आगे कहा कि महाश्वेता देवी ने दलित लेखन को हमेशा प्रोत्साहित किया। समानता की मांग उनके लेखन के केंद्र में है।

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वहीं, जसम राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य प्रो. सुरेंद्र सुमन ने कहा कि सच पूछिए तो शमशेर का जब नाम लिया जाता है तो फैज़, कैफ़ी आज़मी, महाश्वेता देवी, दशरथ मांझी का स्वाभाविक स्मरण हो आता है।

शमशेर आजीवन अपने सीने पर चोट सहते हुए काल से होड़ लेकर भी इश्क और इंकलाब के लिए, जनमुक्ति की कविताएं लिखते रहे।

अज्ञेय के यहां असाध्य वीणा है लेकिन शमशेर के यहां साध्य वीणा है। जिससे अमन का राग पूरी दुनिया में गूंज उठता है।

उस ‘अमन का राग’ में आप देखेंगे होरी के आंगन में प्रेमचंद और गोर्की गले मिलते हैं। हिन्दी और उर्दू संग–संग बहती है।

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उन्होंने आगे कहा कि इस पूंजीवादी व्यवस्था में इंकलाब लाज़मी है। बगैर इंकलाब लाए प्रेम, समानता, स्वतंत्रता जैसे मानवीय मूल्यों की रक्षा संभव नहीं है।

शिक्षाविद डॉ. संजय कुमार ने कहा कि शमशेर में एक विशिष्ट रचनात्मक आकुलता है। शमशेर हाशिए के लोगों के सुख और दुख को अभिव्यक्त करते हैं। इनकी कविताएं हिन्दी साहित्य के लंबे दौर को समेटती है। उनकी रचनाओं में प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, अकविता, नई कविता तक की अनुगुंज मिलती है।

शमशेर, महाश्वेता देवी और कैफ़ी आज़मी की रचनाएं जनपक्षधर लेखन का सर्वश्रेष्ठ है।

विचार गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए जसम राज्य उपाध्यक्ष प्रो. रामबाबू आर्य ने कहा कि शमशेर नए शिल्प, नई भाषा के साथ प्रगतिवादी विचारधारा, किसान–मजदूर को केंद्र बनाकर लिखते रहे।

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हमारे यहां एक ओर बुद्ध की विचारधारा है तो दूसरी ओर शंकराचार्य की विचारधारा। मानवतावादी और श्रेष्ठतावादी कुलीन विचारधाराओं का संघर्ष आज आधुनिक युग में भी विद्यमान है।

शमशेर, कैफ़ी आज़मी और महाश्वेता देवी बुद्ध, कबीर, रैदास, फुले, अंबेडकर की मानवतावादी, जनवादी वैचारिकी को अपने साहित्यिक लेखन से समृद्ध करते हैं।

क्रांतिकारी पुरखों को याद करते हुए उनके सपनों का समाज बनाने के लिए समाज को तैयार करना ही इनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी!

कार्यक्रम में बबिता कुमारी, अजय कलाकार, प्रो. मिथिलेश कुमार यादव, भोला जी, संतोष मंडल, रूपक कुमार, शशि शंकर, दीपक, मिथिलेश कुमार सहित अन्य साहित्यप्रेमी संस्कृतिकर्मी उपस्थित थे।

कार्यक्रम का संचालन जिला सचिव समीर ने किया।

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