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रामायण में सामरिक संस्कृतिः अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों का इंण्डिक सिद्धांत : डा. हरिवंश झा



डा. हरिवंश झा, हिमालिनी अंक जनवरी 024। सामरिक दर्शन पर विश्व के अनेक देशों में बहुत सारा अध्ययन हुआ है । भारत में भी ऐसा कई कार्य होते आया है । परंतु, डॉ. अनूप कुमार गुप्ता ने रामायण में सामरिक संस्कृतिः अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों का इंण्डिक सिद्धांतनामक पुस्तक सरल हिन्दी भाषा में लिख कर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है । संभवतः उनसे पहले किसी भारतीय या अन्य देश के विद्वान रामायण के सामरिक संस्कृति पर ऐसा गहन शोध कार्य नहीं किया था ।
यह पुस्तक नव अध्याय में बाँटा गया है । इसका पहला अध्याय शुरू होता है सामरिक, संस्कृति और ग्रैन्ड रणनीति की अवधारणा से जिसमें सामरिक संस्कृति के स्रोत, उसका महत्व, ग्रैन्ड रणनीति, आदि जैसे विषयों का विवेचन है । दूसरे अध्याय समकालीन भारत की सामरिक संस्कृति पर विमर्श में समकालीन भारत की सामरिक संस्कृति का वृहद उल्लेख है । तीसरा अध्याय प्राचीन भारत की सामरिक संस्कृति पर विमर्श इसलिए महत्वपूर्ण है कि इसमें समकालीन सामरिक संस्कृति को समझने के लिए प्राचीन सामरिक संस्कृति का विस्तृत विवरण है । इस अध्याय में सामरिक परंपरा का तो चर्चा हुआ ही है, पर उसके साथ उसका महत्व एवं सिद्धांतिकरण जैसे पक्ष को भी उजागर किया गया है ।
चौथे अध्याय रामायणकालीन भू–सामरिक परिवेशके अध्ययन करने पर यह ज्ञात होता है कि रामायण काल मूलतः इसलिए बहु–ध्र‘वीय था कि वहाँ किसी एक राज्य का वर्चस्व नहीं था । उस समय में रावण अधीनस्थ लंका राज्य एक–ध्र‘वीय होने के लिए संघर्षरत था । वह शांतिपूर्ण सह–अस्तित्व का विरोधी था । शक्ति के बल पर लंका दूसरे राज्य पर आधिपत्य जमाना चाहता था । इसके लिए वह आक्रामक था । देवता लोग लंका राज्य के वर्चस्व का प्रतिकार कर रहे थे । वस्तुतः राम देवताओं के पक्ष के नेतृत्व कर रहे थे । इससे एक ओर रावण की सामरिक संस्कृति और दूसरी ओर राम की सामरिक संस्कृति के बीच टकराव था । राम लोकमंगल और न्याय के प्रतीक थे जब कि रावण अन्याय और अधर्म का प्रतिक था ।
पुस्तक के पाँचवे अध्याय रावण का सामरिक चिंतनमें रावण का आक्रामक नीति का वर्णन है । वह सदा ही भौतिक लाभ, संचय और उसका विस्तार चाहता था । अपनी अभीष्ट पूर्ति के लिए वह छल, इंद्रजाल, कूटनीति और संधि–विग्रह का निरंतर प्रयोग करता था ।इसी तरह से छठवाँ अध्याय रावण की रणनीति में इस बात का उल्लेख है कि किस तरह से रावण साम्राज्य विस्तार के क्रम में मनमानी ढंग से मानव मूल्यों का अवहेलना किया करता था । इसके लिए वह अभिसूचना संयंत्र को मजबूत करने के साथ–साथ साम, दाम, भेद और दंड नीति का अनुसरण किया करता था ।
सातवें अध्याय राम का सामरिक चिंतन में राम का सामरिक चिंतन का विश्लेषणात्मक अध्ययन किया गया है जो मूलतः आध्यात्मिक अद्वैतवाद पर आधारित है । राम शक्ति का संचय अवश्य करते हैं, परंतु उसका उपयोग किसी को दुख तकलीफ देने या आतंकित करने के लिए नहीं बल्कि लोक कल्याण बिरोधी प्रवृति को रोकने के लिए करते हैं ।
राम मानवता, लोक कल्याण, धर्म और राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि मानते हैं । वे युद्ध के पक्ष में नहीं रहते हैं । रावण के साथ भी इस शर्त पर कि वह सीता को लौटा दे, वे उसके साथ भी संधि करने के लिए तैयार रहते हैं । उसके साथ संभावित युद्ध को टालने के लिए वे हर संभव प्रयत्न करते हैं, पर जब वह प्रयत्न कामयाब नहीं होता है तब वे युद्ध करने से पीछे भी नहीं रहते । सामरिक विषय में निर्णय लेते समय वे सब के साथ सामूहिक विचार–विमर्श करते हैं ।
राम बल का प्रयोग तभी करते हैं जब साम–नीति फेल हो जाता हैं । वे न्याय, लोक रक्षा, आत्म–रक्षा और राज्य की रक्षा के लिए ही संयम पूर्वक बल का प्रयोग करते हैं । आवश्यकता अनुसार वे बल का कहीं कम प्रयोग करते हैं, तो कहीं अधिक ।
राम के सामरिक चिंतन में आन्तरिक और बाहरी संतुलन का अनुपम मेल दिखता है ।वे अपने शत्रु के कमजोरियों को पता लगाने पर इसलिए जोड़ देते हैं कि आवश्यकता पड़ने पर उसके ऊपर आघात पहुंचाया जा सके । उसी तर से वे अपने पक्ष के कमजोरियों पर भी सतत ध्यान देते हैं ताकि शत्रु को अपने ऊपर आघात करना संभव न हो ।
आन्तरिक संतुलन मिलाने के लिए राम सुशासन पर जोड़ देते हैं । वे मानते हैं कि राज्य सत्ता का मुख्य उद्देश्य ही जनता को सुखी रखना है । उनके राज्य में दैहिक, दैविक एवं भौतिक स्वरूपी कोई दुख पीड़ा नहीं था । उनके सुशासन काल में कोई स्त्री विधवा नहीं होती थी । कहीं किसी को कोई रोग नहीं सताता था । किसी को अकाल मृत्यु नहीं होता था । चोर या लुटेरों से कहीं किसी को कोई भय नहीं था । कोई भी व्यक्ति अवांछित कृया कलाप में संलग्न नहीं था । किसी को कोई लोभ नहीं था । लोग धनवान थे । कोई झूठ नहीं बोलता था । सब लोग धर्मपरायण होने के साथ साथ प्रसन्न रहते थे ।
आठवें अध्याय राम की रणनीति में राम के सामरिक कृया–कलाप का उल्लेख है । राज्य सुरक्षा और लोक व्यवस्था पर संकट आजाने पर राम ताटका, मारीच, सुबाहु, शूर्पणखा, खर–दूषण, बाली, रावण, कुंभकर्ण, मेघनाद, राजा लवण और गंदर्व ही क्यों न हो उनके साथ बल प्रयोग करने से पीछे नहीं रहते हैं । उनका रणनीति आदर्शवाद, आध्यात्मवाद, लोकमंगल, न्याय, लोकरक्षा और राज्य सुरक्षा से प्रेरित होने के कारण यथार्थवादी और धर्म नीति के अनुकूल दिखता है ।
पुस्तक के नवम या अंतिम अध्याय रामायण में सामरिक संस्कृति की प्रासंगिकता में दो मॉडलों को प्रस्तुत किया गया है । इसमें एक है राम का मॉडल जिसमें शक्ति संचय और उसका प्रयोग लोक मंगल के लिए होता है । इसके ठीक विपरीत रावण के मॉडल में शक्ति संचय और बल का प्रयोग साम्राज्य विस्तार और दूसरों को उत्पीडि़त करने के लिए होता है ।
यह पुस्तक सामरिक विषयों पर आधारित होने पर भी प्रत्येक मनुष्य को जीवन जीने का कला सिखाता है । इस अर्थ में यह पुस्तक सर्वदेशीय और सर्वकालिक इसलिए बन जाता है कि इसमें बड़े स्पष्ट ढंग से रामायण के दो प्रमुख पात्र – राम और रावण – का सामरिक मॉडल प्रस्तुत किया गया है ।
राम–रावण का यह मॉडल करीब दश हजार वर्ष पहले त्रेता युग के रामायण कालीन समय में ही घटित नहीं हुआ था, बल्कि यह मॉडल प्रत्येक मनुष्य के अंतःकरण में सतत घटित होता रहता है । इसके कारण वहाँ सतत टकराव का स्थिति बना रहता है । यह स्थिति व्यक्तिगत जीवन, पारिवारिक जीवन, सामाजिक जीवन, राष्ट्रीय जीवन और अंतर्राष्ट्रीय जीवन में भी उतना ही चरितार्थ होते आया है । इस आधार पर विश्लेषण करने पर यह स्वतः स्पष्ट हो जाता है कि राम के मोडेल के अनुसरण करने से ही व्यक्ति के निजी जीवन, पारिवारिक जीवन, सामाजिक जीवन, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय जीवन शांतिमय और सुखमय हो जाता है । जगत में सब का कल्याण राम के मॉडल में है, न की रावण के मॉडल में । राम के मॉडल पर चलने वाले जीवों के लिए यह पुस्तक उपयोगी तो है ही, पर विशेष रूप से यह सुशासन प्रदान करने वाले राष्ट्र प्रमुख और राजदूतों के लिए तो यह अमृत तुल्य ही है ।



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