डबल स्टैंड वाली लगड़ी सरकार : मुरली मनोहर तिवारी
मुरली मनोहर तिवारी, बीरगंज । कल रात चोर आया, मेरी एकमात्र संपति, मेरे मोटरसाइकिल का डबल स्टैंड चुरा कर ले गया, लेकिन साइड स्टैंड जिसे “लंगड़ी” भी कहते है, वह छोड़ गया। बड़ी हैरानी हुई, चोर चाहता तो पूरी मोटरसाइकिल भी ले जा सकता था। आशंका हुई कि इस चोरी में अंतरराष्ट्रीय साजिश तो नही हुई ? आखिर डबल स्टैंड चोरी का क्या आशय हो सकता है ? लगता है चोर, मुझे अपने दो पैरों पर टिकने नही देना चाहता, इसीलिए लगड़ी स्टैंड छोड़ गया।
अपनी व्यथा लेकर मंत्री जी के पास पहुँचा। उन्होंने कहा, ‘क्या डबल स्टैंड-डबल स्टैंड बोल रहे है, यहाँ तो पूरी सरकार डबल स्टेन्डर्ड के साथ काम कर रही है। गृह मंत्री का खुद का गृह सुरक्षित नही है। स्वास्थ्य मंत्री अस्वस्थ और बेडौल है। शिक्षा मंत्री का शिक्षण प्रमाणपत्र जाली है। अर्थ मंत्री अनर्थ कार्य कर रहे है और प्रधानमंत्री पलटुचंद में कहा ही है कि वे सत्ता नही समृद्धि के लिए सरकार बना रहे है, बस किसके समृद्धि के लिए ? ये स्पष्ट नही किए और आप जले पर नमक छिड़कने आए है।’
मैंने कहा कि ‘नमक इतना सस्ता नहीं है कि नष्ट किया जाए। आपके राज में किसी को चैन की नमक-रोटी नसीब नही हुई।’
‘हमे क्यों दोष देते है, हमने तो आंदोलन चलाया, सैकड़ों शहीद कराया।’
मैंने पूछा ‘और पुनर्लेखन का क्या हुआ ?’
फिर बड़बड़ाने लगे, पुनर्लेखन-लेखन-संशोधन नियमित और निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है, चलती रहेगी।’
मैंने कहा ‘और आपका मंत्री बनना भी नियमित प्रक्रिया है ?’
इतना सुनना था कि भड़क उठे, ‘जो आता है हमे ही दोष देता है। आप भी क्या विरोधी दल के हैं ?’
मैंने कहा ‘आजकल तो आप ही विरोधी दल और सत्ता दल दोनो के है।’
वे चुप रहे, फिर बोले, ‘हम विरोधी दल हो ही नहीं सकते। हम तो राज करेगे। बीस साल से चला रहे हैं और सारे गुर जानते हैं। विरोधियों को क्या आता है, फ़ाइलें भी तो नहीं जमा सकते ठीक से। हम तो अफ़सरों को डाँट लगाते है, जैसा चाहते है करवा लेते है। हिम्मत से काम लेते है। रिश्तेदारों को नौकरियाँ दिलवाईं और अपनेवालों को ठेके दिलवाए। अफ़सरों की एक नहीं चलने दी। करके दिखाए विरोधी दल ? एक ज़माना था अफ़सर खुद रिश्वत लेते थे और खा जाते थे। हमने सवाल खड़ा किया कि हमारा क्या होगा, पार्टी का क्या होगा?’
‘हमने अफ़सरों को रिश्वत लेने से रोका और खुद लिया। अपनो को चंदा दिलवाया, हमारी बराबरी ये क्या करेंगे ?’
‘पर आपने अपने मूल मुद्दे को छोड़ दिया, अब आपकी नीतियाँ ग़लत है और इसलिए जनता आपके ख़िलाफ़ हो रही है।’
‘हमसे यह शिकायत कर ही नहीं सकते आप। हमने जो भी नीतियाँ बनाईं उनके ख़िलाफ़ ही काम किया है। फिर किस बात की शिकायत ? जो उस नीति को पसंद करते है, वे हमारे समर्थक है और जो उस नीति के ख़िलाफ़ है वे भी हमारे समर्थक है, क्यों कि हम उस नीति पर कभी चलते ही नहीं है।’
मैं निरुत्तर हो गया।
फिर कुछ देर बाद मैंने पूछा, ‘’आपको उम्मीद है कि आपके इस तरह के क्रियाकलाप से फिर चुनाव में विजयी होगे ?’
‘क्यों नहीं ? उम्मीद पर तो हर पार्टी कायम है। जब विरोधी दल असफल होंगे और बेकार साबित होंगे, जब दो ग़लत और असफल दलों में से ही चुनाव करना होगा, तो हममें क्या बुराई ? बस तब हम फिर ‘पावर’ में आ जाएँगे। ये विरोधी दल उसी रास्ते पर जा रहे हैं जिस पर हम चले थे और इनका निश्चित पतन होगा।’
‘जैसे आपका होगा ?’’
‘बिल्कुल…नही-नही हमारी जातीय जड़ें बहुत मजबूत है। कुछ जात वाले को और कुछ पैसे वालो को टिकट देंगे। जात का जड़ और पैसे के पावर से जीतेंगे और मंत्रिमंडल में जाएंगे।’
मैंने पूछा,‘अभी आपके पार्टी में ही दूसरे को मंत्री बनाने का दबाव है?’
‘कोई दबाव काम नही करेगा, हम उसी तरह मस्त हैं, जैसे पहले थे। हम पर कोई फ़र्क नहीं पड़ा। हमने पहले से ही सिलसिला जमा लिया है।’
मैंने पूछा, ‘आगे का क्या योजना है ?’
‘सब योजना अनुसार ही हो रहा है। मकान, ज़मीन, बंगला सब कर लिया। किराया आता है। लड़के को भैस दुहना आ जाए, तो डेरी खोलेंगे और दूध बेचेंगे, राजनीति में भी रहेंगे और बिज़नेस भी करेंगे। हम तो समाजवाद के चेले हैं।’
मैंने पूछा,’आप तो कहते है कि आप किसी वाद को नहीं जानते?’
मैं सिर्फ एक वाद जनता हूँ ‘सत्तावाद’, मैं हमेशा ‘सत्ता समर्पण और मुद्दा विसर्जन’ में आस्था रखता हूँ। मै ठाठ से भी रह सकता हूँ और झोंपड़ी में भी रह सकता हूँ। ख़ैर, झोंपड़ी का तो सवाल ही नहीं उठता। देश के भविष्य की सोचते है, तो क्या अपने भविष्य की नहीं सोचेंगे ? छोटे को ट्रक दिलवा दिया है। ट्रक का नाम रखा है जन–अधिकार। परिवहन की समस्या हल करेगा।’
‘विदेश–मंत्री थे, तब जो खुद का फ़ार्म बनाया था, अब अच्छी फसल देता है। जब तक मंत्री रहा, एक मिनट खाली नहीं बैठा, परिश्रम किया, इसी कारण आज सुखी और संतुष्ट हूँ। हम तो कर्म में विश्वास करते हैं। धंधा कभी नहीं छोड़ा, मंत्री थे तब भी किया।’
मैंने पूछा, ‘आप अगला चुनाव लड़ेंगे, आप तो बुरी तरह हार गए थे ?’
‘क्यों नहीं लड़ेंगे। हमेशा लड़ते हैं, अब भी लड़ेंगे। हम मधेश के हैं और मधेश हमारी पैतृक संपत्ति है। मधेश ने हमें मंत्री बनने को कहा तो बने। सेवा की है। मधेश हमारे पॉकेट में है, पहले प्रेम, अहिंसा से काम लेंगे, नहीं चला तो आंदोलन चलाएँगे। आखिर ये साइड स्टैंड वाली लंगड़ी सरकार में हम डबल स्टैंड वाले मंत्री है।
अब समझ आया कि मेरे मोटरसाइकिल का डबल स्टैंड कहाँ गया ।






