Tue. Jul 16th, 2024

इति श्री नेपाल राजनीति कथा : कंचना झा

कंचना झा, हिमालिनी,अंक मार्च 2024 । फागुन ३० गते २०८० एक बार फिर प्रधानमन्त्री पुष्पकमल दाहाल प्रचण्ड ने विश्वास मत प्राप्त कर लिया है । अब ये विश्वास मत प्राप्त करना बहुत बड़ी बात नहीं रह गई है । क्योंकि प्रधानमंत्री प्रचण्ड अपने १५ महीने के कार्यकाल में तीसरी बार विश्वास का मत लिया है । अब १५महीने में ऐसा क्या हो गया कि उन्हें तीन तीन बार विश्वास मत लेना पड़ा । तो यह सभी कुर्सी का खेल है । यहाँ और किसी बात से किसी को कोई सरोकार नहीं है । यहाँ देश के विकास, उसके अर्थ, राजनीति, नैतिकता,किसी से कोई मतलब नहीं है उसे केवल और केवल कुर्सी की चाहत है । और देश के प्रधामंत्री इस दौर में सबसे आगे हैं ।



प्रधानमंत्री एक देश का पहला व्यक्ति, देश का अभिभावक, जनता का सरदार, जो सबकुछ सह कर भी पहले अपनी जनता को आगे रखने वाला होता है वह होता है प्रधानमंत्री । लेकिन हमारे देश के प्रधानमंत्री को लेकर सड़क के पान और चाय की दुकान पर लोग मजाक करते नजर आते हैं कि हमारे देश के प्रधानमंत्री पर विश्वास नहीं किया जा सकता है क्योंकि उसका कोई ठिकाना नहीं है कि वह कब अपनी ही बातों से मुकर जाए । ये सोच देश की आम जनता की है । और इस बात की चर्चा किसी आम व्यक्ति ने नहीं की है यह चर्चा ३० गते फागुन सदन में हुई जब विश्वास मत को लेकर प्रतिनिधि सभा चल रही थी तभी सरकार को समर्थन देने और सरकार में समेत सहभागी हुई नेकपा (एकीकृत समाजवादी) के उपाध्यक्ष राजेन्द्र पाण्डे ने यह बात कही । उन्होंने खुलकर कुछ बातों को रखा है । आम लोग अपने प्रधानमंत्री को किस रूप में लेते है ? इसका सच्चा रूप उन्होंने सदन में रखा है । उन्होंने प्रधानमन्त्री के शैली को अनैतिक कहकर टिप्पणी की है । उन्होंने कहा कि सच्चाई यह है कि आम जनता ने आपका विश्वास करना छोड़ दिया है ।

प्रतिनिधि सभा की बैठक में उन्होंने कहा कि प्रधानमन्त्री विश्वास करने वाले व्यक्ति नहीं हैं । और ये कुछ नहीं राजनीतिक विकृति है । ” इस विकृति से अगर हम बाहर नहीं आ पाए तो आने वाले समय में हमें ही इसका नतीजा भुगतना पड़ेगा । उन्होंने प्रधानमंत्री को इंगित करते हुए कहा कि क्या आपको पता है कि आम जनता आपको किस रूप में देखते हैं या आपके बारे में क्या बातें करते हैं ? जब प्रधानमंत्री इस बात का जबाब नहीं दे पाए और चुपचाप उनका चेहरा देखने लगे तो पाण्डे ने कहा कि प्रधानमंत्री जी आपके बारे में सड़क पर लोग बोल रहे हैं कि कितना जल्दी यह व्यक्ति रंग बदलता है । आपको लोग रंग बदलने वाला व्यक्ति कहते हैं । लोग इस तरह से आपकी पहचान कर रहे हैं । जब पाण्डे अपनी बात को रख रहे थे उस समय प्रधानमंत्री के चेहरे पर निराशा थी । अनैतिकता के आधार पर बने गठबन्धन का भविष्य नहीं है । यह सकारात्मक संकेत नहीं करता है ।
लेकिन इन बातों का किसी पर किसी भी तरह का कोई फर्क नहीं पड़ा । ये राजनीति है ही ऐसा क्षेत्र जहाँ किसी का कोई वश नहीं चलता है । कल तक जिसे गाली दे रहे थे आज उसी के साथ गठबंधन कर सरकार चला रहे हैं ।
मंसिर ४ गते २०७९ को जब चुनाव हुआ तो किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिली । सभी जानते थे कि गठबंधन की ही सरकार बनेगी । तीनो बड़ी पार्टियों का एक दूसरे से गठबंधन के लिए मारा मारी होने लगा । कभी एमाले और कांग्रेस मजबूत बनते दिखें तो कभी माओवादी और एमाले नजदीक बनते नजर आए । प्रधानमंत्री के पद को लेकर छीना झपटी में आखिरकार प्रचण्ड ही जीते, कांग्रेस मुँह देखती रह गई और ओली का समर्थन ले प्रचण्ड प्रधानमंत्री बन गए । याद ही होगा वह शपथ ग्रहण जब शेर बहादुर देउवा को बताया गया कि प्रधानमंत्री प्रचण्ड शपथ ग्रहण कर रहे हैं आप खड़े हो जाए । यानी देउवा चारों खाने चित्त थे । उन्हें कुछ होश ही नहीं रहा । लेकिन ओली होशियार हैं उन्होंने कहा चलो कुछ दिन तुम प्रधानमंत्री बनो कुछ ही दिन के बाद हमें भी अवसर देना । २५ पुस २०७९ में पहली बार प्रधानमंत्री ने विश्वास का मत लिया । उस समय प्रचण्ड को प्रतिनिधिसभा में रहे राष्ट्रीय जनमोर्चा और नेपाल मजदुर किसान पार्टी के इतर के सभी दल और स्वतन्त्र सांसद ने विश्वास का मत दिया था । बड़ी अच्छे तरीके से सबकुछ चल ही रहा था कि राष्ट्रपति पद को लेकर बबाल शुरु हो गया ।
राष्ट्रपति पद को लेकर एक नया खेल शुरु हुआ जिसका अंत नये गठबंधन के शुरुआत से हुआ । जिस एमाले के साथ जीने मरने की कसमें खाई गई थी । लम्बी लम्बी डींगे हांकी गई थी । कभी भी नहीं टूटने वाला गठबंधन बना था वह केवल एक पद के लिए टूट गया । कांग्रेस जो पछता रही थी उसे एक मौका मिला अपने आप को सुधारने का बस इस अवसर का फायदा उठाया और सरकार में शामिल हो गया । शामिल ही नहीं हुआ अपनी पार्टी से राष्ट्रपति का चुनाव भी करवा लिया । सभी एक दूसरे का मुँह देखते रह गए । और २०७९ फागुन में ही एमाले के साथ सहकार्य तोड़कर कांग्रेस के साथ गठबन्धन बनाया । प्रचण्ड ने चैत ६ २०७९ को एकबार फिर विश्वास मत लिया था । उस समय भी उन्हें १७२ मत मिला था । अभी पूरे रूप से एक साल हुआ भी नहीं था कि एक नया नाटक शुरु हो गया ।

राजनीति में एकबार फिर जोड़ तोड़ की राजनीति शुरु हो गई । जब राष्ट्रीय सभा अध्यक्ष का चुनाव होने का समय आया । सभी दलों ने अपने अपने उम्मीदवारों के बारे में सोचना शुरु कर दिया । उम्मीदवार देते समय यह भी देखते कि कौन कितने पानी में हैं ? उसकी सहभागिता क्या है ? जिस पद के लिए आप उसका नाम दे रहे हैं वह इस पद के लिए काबिल है या नहीं ये भी जानने की कोई कोशिश नहीं की जाती है । देखते हैं तो केवल और केवल अपने भाई भतीजे, संगे संबंधी । काबिलियत यहाँ नहीं देखी जाती है यहाँ रिश्तेदारी देखी जाती है । सभी अपने स्वार्थपूर्ति को पूरा करने में लगे हैं । राष्ट्रहित तो कोई देखता ही नहीं है । बस एकबार फिर गठबंधन को रखा गया हाशिए पर और शुरु हो गया राजनीति का नया खेल । कौन बनेगा राष्ट्रीय अध्यक्ष ?

यह भी पढें   चितवन भू–स्खलनः तीन यात्रुओं ने बस की खिड्की से खूदकर अपनी जान बचाई

इस पद की तलाश कहें या मारामारी में हर दल ने अपनी अपनी औकात दिखाई । कांग्रेस और प्रचण्ड जो कल तक हाथ में हाथ डालकर चल रहे थे आज एक दूसरे को शक की निगाहों से देखने लगे । यानी कुछ भी नहीं कहा जा सकता कब किसका पलड़ा भारी हो जाए । फिर दूसरी पार्टी इसी ताक में बैठी रहती है कि कब कुछ ऐसा हो कि पहला लाइन से बाहर हो कि मेरा नंबर लग जाए । इसलिए तो कहा गया है न कि राजनीति में कब क्या हो जाए नहीं कहा जा सकता है । फिर कब अपनी ही पार्टी का नेता अपनी ही बात से पलट जाए इसका भी कोई ठोर ठिकाना नहीं है । ऐसा ही तो हुआ न । शाम में एक बात और दूसरे दिन दूसरी बात । अभी देश की राजनीति में कुछ ऐसी ही बातों को देखा जा रहा है । राष्ट्रीय सभाअध्यक्ष को लेकर एक गठबंधन टूट गया तो दूसरा जुड़ गया । उसके बाद भी नेताओं को शांति नहीं है । हमारे प्रधानमंत्री की तो बात ही अलग है । वो अपनी बातों से तुरंत पलट जाते हैं । शायद इसलिए जनता ने उन्हें पलटू राम कहना शुरु कर दिया है । कल तक प्रधानमंत्री प्रचण्ड राष्ट्रीय सभाअध्यक्ष के नाम पर पार्टी जिसका नाम सर्वसम्मत से पास करेगी उनका नाम ही मनोनयान किया जाएगा कह रहे थे । लेकिन बाद में वह अपनी बातों से पलट गए और रिश्ते में रहे अपने भाई का नाम मनोनयन के लिए आगे कर दिया । उनकी इस बात से पार्टी में कुछ लोग नाराज भी है । उनका कहना कि प्रधानमन्त्री निवास बालुवाटार में हुई माओवादी केन्द्र पदाधिकारी बैठक में प्रधानमन्त्री पुष्पकलम दाहाल ‘प्रचण्ड’ ने अपने रिश्ते के भाइ नारायण दाहाल को राष्ट्रीयसभा अध्यक्ष पद का उम्मीदवार बनाने का निर्णय लिया । माओवादी का केवल इतना कहना कि हम कुछ नहीं जानते राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद तो हमें ही लेना है । जबकि कांग्रेस ने भी अपना अड़ान ले लिया था । एमाले यानी ओली बा इसी तकरार की प्रतीक्षा में थे । निशाना बिल्कुल ठीक बैठा ।

२१ फागुन में कांग्रेस से किए गए सहकार्य को तोड़कर एमाले, राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी और जनता समाजवादी पार्टी का गठबन्धन बनाकर प्रचण्ड को एकीकृत समाजवादी, नागरिक उन्मुक्ति पार्टी और कुछ स्वतन्त्र सांसद ने भी मत दिया है । लेकिन नेपाली कांग्रेस, राष्ट्रीय प्रजातन्त्र पार्टी, जनमत पार्टी और लोकतान्त्रिक समाजवादी पार्टी आदि ने विपक्ष में मतदान किया है ।
लेकिन पद को लेकर देश में हर बार इस तरह की स्थिति को लाना कितना उचित है ? इस एक पद ने गठबंधन तोड़ दिया और कांग्रेस हुई बाहर एमाले का हुआ प्रवेश । प्रचंड ने अपनी कुर्सी बचाई । भाई को राष्ट्रीय सभा का अध्यक्ष बनाया । एकबार फिर यानी तीसरी बार प्रधानमंत्री ने विश्वास मत लिया । खासियत यह कि तीनों ही बार पद को लेकर ही गठबंधन बना और टूटा । और इसकी भी कोई गारंटी नहीं है कि यह आखिरी बार हुआ है । यह सत्ता के फेर बदल की बात है जो आगे भी जारी ही रहेगी । इति श्री नेपाल राजनीति कथा ।

यह भी पढें   कांग्रेस द्वारा केन्द्रीय कार्य संपादन समिति बैठक आह्वान
कंचना झा
कार्यकारी संपादक
हिमालिनी ऑनलाइन
www.himalini.com



About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Loading...
%d bloggers like this: