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नेपाल की सत्ता और प्रा. एस.डी मुनि का खुलासा : कैलाश महतो



कैलाश महतो, जनकपुरधाम । फेब्रुअरी २९ का एक खुशनुमा दिन । स्थान दरभंगा के एक सुन्दर होटल । उस अवसर पर नेपाल के राजनीति पर पहरा देने बाले दिग्गज सिद्ध हस्त कुछ लोगों की जमावडा रहा था । भीड अच्छी खासी थी । माहोल सुन्दर था ।‌ एक पारिवारिक और राजनीतिक बहसों की शहनाई बज रही थी । उसी समय मेरे कुछ खास रिश्तेदारों ने कह डाला कि नेपाल को भारत सहयोग ना दें, तो वह भूखे मर जायेगा । इस बात को सुनकर मेरे अन्दर एक तूफान मच गया । बर्दाश्त से मैं बाहर चला गया और उनसे मेरी मच गई ।

दर असल ऐसी बातें जाने अन्जाने और हंसी-मजाक और समान्य रुपों में मुझसे दर्जनों बार लोगों ने उससे पहले भी कहा था । हर बार बहसों के साथ बात खत्म हो जाती थी । मगर इस बार फिरसे उसी स्तर के भारतीय जवाफ पर मेरे तरफ से कडा विरोध के साथ सम्बन्ध तोडनेतक की बात हो गई । बाद में लोगों ने मुझे समझाने की कोशिश की । मगर मैं इस बात से बिल्कुल असहमत हूं कि नेपाल भारत के बिना भूखा मर जायेगा । यह मेरे देश की खुल्ला बेइज्जती है ।

हम नेपाली शासकों के खिलाफ हैं । देश के भितर हम मधेशी और पहाडी जनजातियों के साथ अन्याय और विभेद है । हम ब्राम्हण सत्ता और षड्यन्त्र के विरोधी हैं । मगर देश के उपर किसी बाह्य आक्रमण और व्यंग्य को बर्दाश्त नहीं कर सकते । नेपाल को अगर कोई देश या उसका सरकार सही में सहयोग करता, तो देश के अधिकांश युवा विदेश में क्यों और कैसे बिक जाता ? मेरा मानना है कि कोई किसी को सहयोग नहीं करता । अगर कोई हजार पांच सौ करोड का सहयोग करता भी है, तो दश बीस हजार करोड का लाभ लेकर जाता है । यह हमारे शासकों का निकम्मापन है ।

हम केवल पडोसीपन बाले सहयोग को सहयोग मानते हैं । नेपाल के लिए किए गये या किये जाने बाले क्षणिक सहयोग हमारे लिए राहत है तो पडोसियों द्वारा हुए सहयोग इसके लिए आवश्यकता और सुरक्षा की जुगाड है । विपद में मानवता की एक पहचान है, जो नेपाल भी अपने हैसियत के अनुसार पडोसी को करता है । मगर सहयोग के बाद उसके लिए उलहन देना सहयोग नहीं माना जा सकता । नेपाली शासक माने तो उसकी बात है ।

अभी मैं गाडी में सफर पर हूं । समय पास करने के हिसाब से मैंने “हिमालिनी टिवी च्यानल” द्वारा भेजा गया श्री सच्चिदानन्द मिश्रा जी का “नेपाल में मन्त्रण्डल बदले जाने के कारण” का विश्लेषण सुना, जिसमें उनके अनुसार नेकपा माओवादी केन्द्र – काग्रेस – ना.उ.पा. – लोसपा – जसपा का संयुक्त मन्त्री मण्डल का आकस्मिक बदले जाने में चीन की रणनीति और सरकार में रहे अर्थ मन्त्री का अटेरीपन के कारणों को उजागर किए जाने तथा उसपर रहे भारत का असन्तुष्टि बाले विश्लेषण पर मेरा ध्यानाकर्षण हुआ ।

मार्च १७, २०२४ (चैत्र ४, २०८०) के दिन‌ जनकपुर में अवस्थित North South Collectives द्वारा “मधेश विमर्श श्रृंखला” अन्तर्गत आयोजित “नेपाल – भारत सम्बन्ध और मधेश” विषय पर जे.एन.यू के सु-प्रसिद्ध प्राध्यापक तथा नेपाल – भारत और मधेश के विशिष्ट विश्लेषक व जानकार डा. एस.डी मुनि जी के प्रमुख आतिथ्यता में रखे गये एक दिवसीय बहस, अन्तरक्रिया तथा प्रश्नोत्तर कार्यक्रम में नेपाली मधेशी चिन्तक, विश्लेषक, सामाजिक तथा राजनीतिक अभियन्ता, भाषा अभियानी, नेपाल – भारत व मधेश के चिन्तक, बुद्धजिवी, प्राध्यापक, लेखक तथा विश्लेषकों की गरिमामय उपस्थिति रही थी । प्रा. एस.डी मुनि के प्रवचन पश्चात् जितने भी जिग्यासा और सवाल उठाये गये, लगभग सारे के सारे चिन्तन मधेश पर भारत का दृष्टिकोण से सम्बन्धित रहे ।

प्राध्यापक डा. मुनि ने अपने प्रवचन और उपस्थित विदों द्वारा उठाये गये सवालों के जबाव में भी नेपाली सत्ता, भारत की नीति और मधेश के इन महत्वपूर्ण तथ्यों का खुलासा करते हुए इन बातों पर मधेश को ध्यान देने और सजग रहने की सलाह दी :

क) वर्तमान मोदी सरकार से पहले भारत की किसी भी सरकार ने नेपाल में मधेशियों के उपर उचित ध्यान नहीं दिए ।

ख) मधेश के लिए जितना जिम्मेवार वर्तमान भारत सरकार को एक पडोसी के नाते होना चाहिए था, वह नहीं है । हुआ भी, तो विभेद से भरा संविधान बन जाने के बाद, जिसका प्रभाव प्राविधिक रुप में कमजोर रहा ।

ग) छ: महीने बाला नाका बन्द मधेश आन्दोलन को सहयोग के रुप में नहीं, बल्कि नेपाली बाहुन शासकों द्वारा नेपाल में धर्म निरपेक्ष राज्य कायम करने के वचनबद्धता को नेपाल आते ही उस सहमति से परे जाकर नेपाल के संविधान में धर्म निरपेक्षता के साथ ही सनातन धर्म को भी उल्लेख किए जाने के आक्रोष में रहा था ।

घ) किसी एक धर्म, संस्कृति, भाषा या पहचान के आधार पर आधुनिक‌ राज्य प्रणाली पूर्ण विकसित नहीं हो सकता । राज्य किसी धर्म विशेष का नहीं होना चाहिए ।

ङ) भारत किसी विशेष धर्म, परिवार और सत्ता का पक्षधर नहीं है । प्रा. मुनि स्वयं राजतन्त्र के पक्षधर न थे, न हैं ।

च) नेपाल में धर्म निरपेक्षता के मूल कारक नेकपा एमाले और ओली और एक तप्का के कांग्रेसी पक्ष रहे हैं । उसका मूल कारण यूरोप और क्रिश्चियन तप्कों से उनका सम्बन्ध रहा । नेकपा माओवादी इसके पक्षधर नहीं था ।

छ) संविधान निर्माण पूर्व अगर भारत नेपाली नेताओं के साथ ठीक से डिल किया होता, तो संभवत: आजका संविधान इतना विभेदपूर्ण नहीं होता । संविधान निर्माण पश्चात् भारत सरकार द्वारा जय शंकर जी को संविधान को सहज करने के संदेश सहित के आगमन को नेपाल ने बाह्य हस्तक्षेप मान लिया ।

ज) नेपाल में‌ कोई जबर्दस्त हलचल न मचनेतक भारत के लिए नेपाल खास ही महत्व का विषय नहीं‌ माना जाता है । 

झ) भारत सरकार के लिए महत्वपूर्ण रुचि का विषय चीन, पाकिस्तान और अमेरिका है, न कि नेपाल ।

ञ) नीति बनने के समय में भारत अपने भारतीय शक्ति ग्वालियर परिवार, करण सिंह, नेपाली सेना, कुछ बडे व्यापारी, नेपाल के पूर्व राज घराने और भारतीय उच्च परिवारों से रहे उनके सम्बन्ध, बिहार, यूपी, उत्तराखण्ड, पश्चिम बङ्गाल की सरकारें, आदि को अपने नीतियों में स्टेक होल्डर्स बनाता है । उसमें मधेश नहीं पड पाता । वह मधेशी नेताओं के असफलता के कारण है ।

ट) सन् १९८९-९० का भारतीय नाकाबन्दी को खत्म करने के लिए नेपाली सेना, व्यापारी घराने, बिहार और यूपी सरकार तथा कुछ और ताकतें सामेल थे ।

ठ) मधेशी नेता जितना टुटफुट कर सरकारी सत्ता में विश्वास करते हैं, उतना मुद्दायी सत्ता पर कायम नहीं रहते ।

ड) भारत मधेश को केवल ट्याक्टिकल (Tactical) रुप में प्रयोग करता है, स्ट्र्याटिकल (Stratical) रुप में नहीं । और जबतक‌ मधेश को stratigically नहीं समझा जाएगा, मधेश नेपाल में कमजोर रहेगा । उसके लिए मधेश को राजनीति रणनीतिक रुप से मजबूत होना होगा ।

ढ) मधेश भारत के लिए केवल‌ Natural Constituency है, Political नहीं । इसे राजनीतिक क्षेत्र के रुप में स्थापित और विकास करना होगा ।

ण) भारत को जिससे राजनीतिक और सुरक्षात्मक लाभ होगा, उसी से राजनीतिक और रणनीतिक सम्बन्ध रखेगा । वह हर राष्ट्र करता है । मधेश कर सकता है। हैसियत बनाना होगा । 

त) भारत अगर मधेशी राजनीति में तोडफोड करता है, तो मधेश नहीं टूटने का प्रण करें ।

थ) जिस रोज मधेश न भारत का, न चीन के दया पर आन्दोलित हो जायेगा, उस दिन मधेश को न तो भारत बिगाड पायेगा, न चीन हिला पायेगा । शर्त केवल यह हो कि मधेश किसी का सुरक्षा थ्रेट न बने ।

 

निश्कर्षत: प्राध्यापक डा. मुनि ने यह विश्वास दिलाया कि मधेश का राजनीतिक निकास ही नेपाल और भारत दोनों के लिए लाभप्रद होगा । 

प्रा. मुनि ने मधेश को एकजूटता के साथ आगे बढने, नये नेतृत्व को जिम्मा लेने और अपने भू-राजनीति को तटस्थ और मजबूत बनाते हुए जनता के आवश्यक मांग और मुद्दों को उठाते हुए समदूरी अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग के‌ लिए आवश्यक पहलूओं से सम्बन्ध और विश्वास पैदा करने को सलाह दिए ।

सच और सत्य आयाम और व्यवहार किसी देश या राष्ट्र के लिए पीडादायी हो सकता है, मगर हानीकारक नहीं ।  अन्धभक्ति, अन्धराष्ट्रवाद, अन्धविश्वास और अन्धनिर्भरता हर देश और परदेश के लिए खतरा सावित होगा । 

हम पडोसी के बगैर जी नहीं पायेंगे । इस बात से हमारे पडोसी को भी वाकिफ होना होगा कि वह भी अपने पडोसी के बिना ठीक से जी नहीं पायेगा । इस चिन्तन से हमेशा दूर रहना भी राष्ट्रप्रेम है कि कोई देश छोटा और गरीब होने से उसका अस्तित्व किसी और के कारण है । इस बात का आभास प्रा. मुनि ने भी कराया । हम सह-अस्तित्व में जिएं, यही राज राजनीति है ।

प्राध्यापक मुनि के अध्ययन, विश्लेषण और लोक कल्याणकारी चिन्तनों को नमन ।



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