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निर्वाचन आयोग को झटका, तमलोपा के पक्ष में सर्वोच्च अदालत का आदेश



काठमाण्डौ, २०८०/१२/१५ गते । नाम परिवर्तन के मामले में तमलोपाद्वारा निर्वाचन आयोग विरुद्द दायर रीट में कल्ह सर्वोच्च अदालत ने अन्तरिम आदेश को निरन्तरता देने का आदेश जारी किया है । यह आदेश मा. न्या. प्रकाशमान सिंह राउत और मा.न्या. श्री सुनिल कुमार पोखरेल के संयुक्त इजलास से दिया गया है । इससे पहले २०८० चैत्र ४ गते मा. न्या. श्री विश्वम्भरप्रसाद श्रेष्ठ के एकल इजलास से तमलोपा के पक्ष में अल्पकालिन अन्तरिम आदेश सहित कारण देखाऊ आदेश दिया गया था । तमलोपा के तरफ से अधिवक्ता सतीश कुमार झा ने बहस किया था ।

निर्वाचन आयोग ने विगत फागुन १० गते एक पत्र लिख कर तराई-मदेश लोकतान्त्रिक पार्टी सहित १९ राजनीतिक दलों को नाम बदल कर ३० दिन के भीतर आयोग को सूचित करने की जानकारी दी थी । पत्र मे कारण स्पष्ट नहीं किया गया था । सीधे नाम को संविधान और राजनीतिक दल सम्बन्धी ऐन २०७३ के अनुकूल न होने की बात लिखी गई थी । तमलोपा ने इस निर्देशन पर आपत्ति व्यक्त करते हुए निर्वाचन आयोग को पत्र लिखा था और जबाब न मिलने पर निर्वाचन आयोग के विरुद्ध सर्वोच्च अदालत में चैत्र २ गते उत्प्रेषण परमादेश मांगते हुए रीट दायर की थी ।

तराई-मधेश लोकतान्त्रिक पार्टी के अध्यक्ष वृषेश चन्द्र लाल ने हिमालिनि को बताया, -“ पहली बात तो यह कि ऐसा निर्देशन देने का अधिकार आयोग को किसी कानून ने नहीं दिया है । निर्वाचन आयोग को राजनीतिक बातों में तटस्थ रहना चाहिए । बहुदलीय लोकतन्त्र के लिए सहज वातावरण और निष्पक्ष स्वतन्त्र निर्वाचन ही इसके सम्पूर्ण कार्य का एक मात्र केन्द्र विन्दु होना चाहिए । हमें लगा कि आयोग का यह निर्देशन किसी मनसाय वश है जिसे ठीक नहीं कहा जा सकता । इससे निष्पक्षता, तटस्थता को लेकर बहुत सारे सवाल उत्पन्न होते हैं । निकायों में गैरकानूनी अथवा कानून को तोड़मरोड़ कर आदेश और निर्देश जारी करने की प्रवृति लोकतन्त्र और विधि के शासन के लिए दिमक लगने जैसा है । एक लोकतन्त्रवादी राजनीतिक दल के हैसियत से हमने इस प्रवृति के विरुद्ध आवाज उठाई है । सम्मानित सर्वोच्च अदालत से गुहार लगाई है । विश्वास है, सर्वोच्च अदालत न्याय देगी । एक महत्वपूर्ण नजीर स्थापित होगा ।“ 

तराई-मधेश लोतान्त्रिक पार्टी निर्वाचन आयोग के २०७७/०८/९ के निर्णय से  दर्ता की गई थी और २०७८/८/१७ को इसे प्रमाण-पत्र दिया गया था । उस समय में इसे और दर्ता किए गये दूसरे अन्य १८ दलों के नाम संविधान और कानून के अनुकूल था तो अब कैसे प्रतिकूल हो गया ? इस बीच में संविधान और ऐन में ऐसा कोई संशोधन भी नहीं की गई है ।



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