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नेपाली महिला अपने अधिकार से सन्तुष्ट हैं : ? अंशुकुमारी झा

अंशु कुमारी झा, हिमालिनी,अंक मार्च 2024 ।हरेक वर्ष की तरह इसबार भी विश्व ने ११४ वाँ अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया । ८ मार्च को प्रत्येक वर्ष अन्तरराष्ट्रीय नारी दिवस मनाया जाता है । नारी का जीवन ऐतिहासिक असमानता और विभिन्न चुनौतियों से घिरा हुआ है । यह दिवस भी महिलाओं को बहुत आन्दोलन और संघर्ष पश्चात मिला है । विशेष रूप से श्रमिक महिलाओं के आन्दोलन से अन्तरराष्ट्रीय नारी दिवस शुरु हुआ है । बाद में इस दिवस को संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी मान्यता दिया । इससे स्पष्ट होता है कि महिला जहाँ की भी हो, सदियों से पीडि़त है । जब विश्व के विभिन्न शिक्षित देशों की महिलाएं दमित है तो नेपाली महिला किस खेत की मूली है ।

सन् १९०८ में न्युयाकर्क सिटी में १५ हजार महिलाओं ने एक साथ अपने जायज अधिकार के लिए प्रदर्शन किया । उनकी माँग यह थी कि पुरुषों की अपेक्षा हमारी ड्युटी का समय कम किया जाय । आकर्षक तनख्वाह मिले और हमें भी मतदान का अधिकार प्राप्त हो । उसके एक वर्ष पश्चात ही द सोसलिस्ट पार्टी ऑफ अमेरिका ने प्रथम राष्ट्रीय नारी दिवस की घोषणा की । उक्त दिन को अन्तर्राष्ट्रीय बनाने का विचार कम्युनिस्ट अभियानकर्मी क्लारा जेटकिन के मन में आया और उन्होंने इस विचार को एक प्रस्ताव के रूप में आगे बढाया । सन् १९१० में कोपेनहेगन में एक ‘कन्फरेन्स अफ वर्किङ ओमन’ नाम का सम्मेलन हुआ जिसमें उन्होंने महिला दिवस मनाने का प्रस्ताव रखा । उक्त सम्मेलन में १७ देशों से १०० से अधिक महिला सहभागी हुई थी । उनलोगों ने क्लारा के प्रस्ताव को सर्वसम्मत रूप में सहमति दी थी ।

समाज में लैंगिक तथा सामाजिक विभेदों के कारण महिलाओं का सर्वांगिण विकास नहीं हो पा रहा है । महिलाओं के हक अधिकार के लिए आवाज उठाना, उसके लिए आवश्यक नीति निर्माण करना तथा उसे कार्यान्वयन करने की सख्त जरुरत है । पुरुष के तरह ही महिला को भी समान रोजगार का अवसर प्राप्त होना चाहिए ताकि महिला अपने आपको निरीह नहीं समझे । महिला अगर क्षमतावान है तो उसकी क्षमता की भी कद्र होनी चाहिए । ऐसा करने से देश के अर्थतन्त्र और समाज में महिला अमूल्य योगदान पहुँचा सकती है । महिला दिवस जैसे महत्वपूर्ण दिवस की शुरुआत सन् १९११ मार्च १९ से हुई थी । उस वक्त डेनमार्क, जर्मनी, अस्ट्रिया और स्विट्जरल्यान्ड में लाखों महिला और पुरुष, महिला आन्दोलन से मिली प्रगति का सम्मान करने एकजुट हुए थे । इस ऐतिहासिक क्षण को सिर्फ एक उत्सव के रूप नहीं लेना चाहिए वरण् इसे तो एक उपलब्धि के रुप में लेना चाहिए । जब महिलाओं को एक चारदीवारी में सीमित करके एक वस्तु की तरह रखा जाता था परन्तु उक्त आन्दोलनों से महिला के हक अधिकार की बात तो उठी । सदियों से महिला पुरुषों के बराबरी में नहीं बैठ सकती थी पर नारी दिवस की प्रेरणा से महिलाओं में अपने अधिकार के लिए आवाज उठाने की ताकत आई जो एक बहुत बडी उपलब्धि हुई । यह महिला दिवस कोई साधारण दिवस नहीं है, यह दिवस महिला संघर्ष के ज्ञात तथा अज्ञात नायकों प्रति श्रद्धाञ्जली भी है । उन्हीं के बलिदान से हम महिलाएं अपने अधिकार की बात करते हैं । स्वतन्त्रता के लिए मार्ग प्रशस्त करते हैं ।

महिलाओं को भी राजनीतिक अधिकार मिले, आर्थिक समानता मिले तथा उसके साथ हो रहे भेदभाव का अन्त हो इसके लिए सन् १९७७ में संयुक्त राष्ट्र संघ ने अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस को मान्यता दिया । महिला दिवस महिला को ऊपर उठाने के लिए ही नहीं, उससे एक सुन्दर, सभ्य और नैतिकवान समाज की कल्पना को भी स्थान मिला है । यह सच है कि जिस परिवार की महिला सुशिक्षित है उस परिवार का भविष्य सुन्दर होता है । हर परिवार सभ्य हो तो समाज सुव्यवस्थित होता है । महिला समानता से अधिक महिलाओं का सहअस्तित्व महत्वपूर्ण होता है । महिलाओं के विकास से सिर्फ महिलाओं का नहीं सम्पूर्ण मानव जाति का कल्याण सम्भव है । सच में, अब महिला भी आगे बढ़ रही है, उनमें उल्लेखनीय प्रगति के बाबजूद भी हमारे देश की महिला पूर्ण नागरिकता और समान अधिकार का उपभोग नहीं कर पा रही है । जिसका मुख्य कारण शिक्षा का अभाव हो सकता है । एक आँकड़े के मुताबिक नेपाल के महिलाओं की साक्षरता दर बहुत ही कम है ।

अमेरिका में महिला साक्षरता दर ९९ प्रतिशत है, चीन में महिला की साक्षरता दर ९९.८५ है, रुस में महिला साक्षरता दर ९९.७४, बेलायत में महिला साक्षरता दर ९९ प्रतिशत, जर्मनी में भी महिला साक्षरता दर ९९, भारत में महिला सक्षरता दर ९१.९५ और नेपाल में महिला साक्षरता दर ६९.४ प्रतिशत है ।

प्रति एक लाख जन्म में मातृ मृत्युदर ३२.३ र राजनीतिक सहभागिता २९ प्रतिशत (सांसद) है । चीन में महिला की साक्षरतादर ९९.८५ प्रतिशत, प्रति एक लाख जन्म में १६.१ और राजनीतिक सहभागिता २४.९४ प्रतिशत है । इससे अन्दाजा लगाया जा सकता है कि विश्व स्तर पर नेपाली महिला अभी तक पीछे क्यों है ? राजनीतिक सहभागिता ३३ प्रतिशत करने से क्या होगा जब शिक्षा का ही अभाव हो । महिला को जब अपने हक अधिकार के बारे में ही पता नहीं होगा तो उसे कुर्सी पर बैठा देने से भी वो कुछ नहीं कर पायेगी, बस एक कठपुतली की तरह उसका प्रयोग किया जायेगा । इस तथ्यांक के अनुसार नेपाल सरकार को सर्वप्रथम महिला शिक्षा पर ध्यान देना चाहिए । एक तरफ विज्ञान, स्वास्थ्य जागरुकता तथा सामाजिक सुधार का काम हो रहा है दूसरे तरफ हम बहस करते हैं लैङ्गिक असमानता की । महिला सशक्तिकरण के लिए एक महत्त्वपूर्ण स्तम्भ है शिक्षा, जिसे अभी भी अनदेखा किया जा रहा है । केवल शहर शिक्षित हो जाने से पूरा राष्ट्र शिक्षित नहीं होता । अभी द्वन्द्वग्रस्त क्षेत्रों में बालबालिकाएं शिक्षा से वन्चित हैं और महिलाएं हिंसा का शिकार हो रही है । संयुक्त राष्ट्र संघ के लैङ्गिक असमानता सूचकांक अनुसार महिला अधिकार के सम्बन्ध में नेपाल की अवस्था बहुत ही दयनीय है ।

हम कहने के लिए अभी नया जमाना में जी रहे हैं, बहुत ही सुख सुविधा और ऐशोआराम के साथ परन्तु हमारा समाज रुढिवादी सोच से अभी भी ग्रसित ही है । पितृ सतात्तमक सोच का अन्त कभी नहीं हो सकता है । आए दिन हमारे समाज में दूध पीती बच्चियों के साथ बलात्कार होता रहता है । दहेज के कारण बेटियाँ मारी जा रही है । बेटा पाने के लालच में बेटी को गर्भ में ही समाप्त किया जा रहा है तो कैसे कहेंगे हम नए जमाने में जी रहे हैं ? नेपाल में नारी दिवस विक्रम संवत् २०१६ से प्रधानमन्त्री वि.पि कोइराला के समय से मनाने की शुरुआत हुई । इससे महिलाओं के हित में उपलब्धि भी हुई परन्तु चुनौती भी कम नहीं है । उपलब्धि और चुनौती को हम अगर पीछे मुड़कर देखते हैं तो अपेक्षा अनुसार परिवर्तन नहीं दिखाई देता है ।

अंशु झा,
बल्खु, काठमांडू नेपाल |



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