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मीटर ब्याज पीडि़तो की पीड़ा में राजनीति : लिलानाथ गौतम

लीलानाथ गौतम, हिमालिनी,अंक मार्च 2024 ।रिश्तेदार और साहुकार के साथ किए गए वित्तीय कारोकारों से पीडि़त माननेवाले १० हजार से अधिक व्यक्ति आन्दोलन के लिए २३ दिनों की पैदल यात्रा कर काठमांडू आए थे । काठमांडू केन्द्रीत ४२ दिनों के आन्दोलन के बाद वे लोग अब अपने घर वापस हो रहे हैं । काठमांडू आनेवाले ये लोग २८ जिला के निवासी हैं । वे पूर्व मेची से लेकर पश्चिम महाकाली तक के निवासी हैं । वे लोग मानते हैं कि गांव के साहूकारों ने उन लोगों के साथ आर्थिक शोषण किया है । खुद को ‘मीटर ब्याज पीडि़त’ मान कर आन्दोलन के लिए काठमांडू आनेवाले अधिकांश मधेश प्रदेश के निवासी और मधेशी समुदाय के हैं ।

मीटर ब्याज पीडि़तो के अनुसार कर्जा नहीं चुकाने के कारण साहुकारों ने घर और जमीन हड़प लिए हैं, जिससे गरीब बेघर हो गए हैं । समस्या समाधान के लिए सरकार के साथ कई बार वार्ता भी हो चुकी है । लेकिन पीडि़तों का कहना है कि सहमति कार्यन्वयन नहीं हो रहा है । रवि लामिछाने गृहमन्त्री बनने के बाद फिर एक और सहमति हुई है । इसी सहमति के साथ मीटर ब्याज पीडि़त अपने घर लौटने के लिए राजी हुए हैं । घर वापस तो हो गए हैं, लेकिन फिर भी सहमति कार्यान्वन पर आशंका है । बैंक तथा वित्तिय क्षेत्र से सरोकार रखनेवाले विज्ञ भी कहते हैं कि मीटर ब्याज पीडि़तो के साथ हुई सहमति कार्यान्वय होने की संभावना नहीं है ।

गत साल चैत्र महीने में सरकार ने मीटर ब्याज पीडि़तों की समस्या समाधान के लिए एक छानबीन आयोग निर्माण किया था । ८ महीनों के बाद आयोग ने एक प्रतिवेदन भी तैयार किया था । प्रतिवेदन कार्यान्वयन में अनदेखा होने के कारण पीडि़त आन्दोलन के लिए फिर काठमांडू आए थे । तत्कालीन गृहमन्त्री नारायणकाजी श्रेष्ठ ने पीडि़तो के साथ ५ सूत्रीय सहमति की थी और वर्तमान गृहमन्त्री लामिछाने ने फिर ४ सूत्रीय सहमति की है । मीटर ब्याज पीडि़त संघर्ष समिति के अध्यक्ष अवधेश कुशवाहा भी मानते हैं कि सहमति कार्यान्वयन होने की आशंका आज भी है । उनके अनुसार पीडि़तों को न्याय दिलाने के लिए न्यायिक अधिकार के साथ उच्चस्तरीय आयोग निर्माण होना चाहिए । लेकिन सरकार जांचबुझ आयोग ऐन २०६३ अनुसार आयोग गठन करने की तैयारी में है । इसीलिए फिर सहमति कार्यान्वयन में आशंका हो रही है ।

 

इसीतरह अवैध तमसुक खारिज, कर दिए गए बैंक चेक को अवैध करार, पीडि़तो के लिए क्षतिपूर्ति जैसी मांग भी आन्दोलनकारियों की है । आयोग के तथ्यांक अनुसार २८ हजार से अधिक सर्वसाधारण मीटर ब्याज से पीडि़त हैं । उसमें से ५ हजार ३०० की समस्या समाधान हो चुका है । लेकिन २२ हजार से अधिक शिकायतें आज भी बाकी है, जिसमें कोई भी सहमति नहीं बनी है । इस अवधि में कई पीडि़त सम्पर्क में आए हैं, उनका मुद्दा आयोग में दर्ज भी नहीं हुआ है । आयोग के तथ्यांक के अनुसार मीटर ब्याज पीडि़तो के साथ ७ अरब रुपये बराबर का कारोबार है, जो पीडि़त नहीं दे सकते हैं ।

क्या है मीटर ब्याज ?

‘अनुचित’ और ‘अवैध’ आर्थिक कारोबार ही मीटर ब्याज है, जो कानून नहीं पहचानता । शहरी क्षेत्र की तुलना में ग्रामीण क्षेत्र में इसतरह का कारोबार अधिक होता है । गांव–घर के साहूकार आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति तथा परिवार को अधिक ब्याज वसूलकर कर्जा देते हैं । कर्जा नहीं चुकाने पर उनकी संपत्ति जब्त कर लेते हैं । रकम लेनदेन के लिए जो कागज बनाया जाता है, वह भी फर्जी होता है । कर्जा लेनेवालों को दिए गए रकम से अधिक रकम का कागज बनाया जाता है । जैसे की १ लाख रुपये का कर्जा दिया गया तो उनके साथ ३ लाख का कागज बनाया जाता है ।

इसतरह के कारोबार को समान्तकालीन परम्परा और कारोबार माना जाता है । लेकिन आज भी गांवघर में इसतरह का कारोबार कायम है, जो कानून के विपरित है । इसी परम्परा से पीडि़त सर्वसाधारण काठमांडू आकर सिंहदबार और बालुवाटार को अपनी पीड़ा सुना रहे थे । कुछ पीडि़त ऐसे भी हैं, जिन्होंने कर्जा के रूप में प्राप्त रकम से १० गुना ज्यादा कर्जा चुक्ता कर दिया है, तब भी साहुकार उन लोगों को कर्जा से मुक्त नहीं कर हैं ।

कौन हैं मीटर ब्याजी ?

गांव हो या शहर ! पुराने जमाने के सामन्त लोग अब नहीं हैं । लेकिन सामन्तवादी चरित्र के लोग सभी जगह हैं, वही लोग अवैध आर्थिक कारोबार का धन्दा चलाते हैं । उसी अवैध आर्थिक कारोबार को आज हम लोग ‘मीटर ब्याज’ के नाम से जानते हैं । प्रचलित कानून से बाहर रहकर आर्थिक लेनदेन करना, उसका फर्जी कागजात बनाना और कर्जा लेनेवालों की संपत्ति हड़प लेना उन लोगों का मुख्य धन्दा हैं । ऐसे धन्दा में पैसेवाले लोग ही शामिल होते हैं ।

विशेषतः गांव में स्थानीय नेता और प्रशासक अधिक ब्याज लेकर कर्जा प्रदान करते हैं । काठमांडू जैसे शहरी क्षेत्रों में भी ऐसे धन्दा चलानेवाले व्यक्ति हैं । कर्जा देनेवाले और लेनेवाले दोनों आपसी राजीखुशी में ही इस तरह के कारोबार में शामिल हो जाते हैं । जब लेनदेन में समस्या आती है, तब घटना सार्वजनिक होती है । कुछ साल पहले एक रिपोर्ट सार्वजनिक हुई थी, जहां मीटर ब्याज का धन्दा चलाने वाले व्यक्ति पुलिस प्रशासन के बहालवाला उच्च अधिकारी थे । लेकिन शहरी क्षेत्रों में इसतरह का कारोबार और पीडि़तों की पीड़ा अपवाद में ही सार्वजनिक होता है ।

आज मीटर ब्याज पीडि़तों का आन्दोलन गांव से जुड़ा हुआ है, जहां पीडि़तों की पीड़ा शहर की तरह नहीं छुपती । मीटर ब्याज पीडि़तो के नाम से जो भी व्यक्ति आन्दोलन में सहभागी हैं, उनकी बातें सुने तो पता चलता है कि उन लोगों को कर्जा देनेवाले व्यक्ति गांव के ही नेता और व्यापारी होते हैं, जो किसी न किसी पार्टी से आबद्ध होते हैं । उनकी पहुँच केन्द्र तक होती है । कर्जा लेनेवाले व्यक्ति अनपढ़ होते हैं । साथ में उनकी कोई भी राजनीतिक और प्रशासनिक पहुँच नहीं होती है । कई जगह ऐसा भी पाया गया है कि अनपढ़ व्यक्तियों की पैतृक संपत्ति हड़पने के मुख्य उद्देश्य से ही मिलिभगत में कर्जा प्रदान किया गया है । राजनीतिक और प्रशासनिक व्यक्तियों की मिलिभगत में होनेवाले ऐसी घटना में पीडि़तों को न्याय मिलना मुश्किल होता है ।

पीडि़तों की पीड़ा में राजनीति

कर्जा लेनेवाले अधिकांश व्यक्ति आर्थिक दृष्टिकोण से कमजोर हैं । पैतृक जमीन साहुकारों ने हड़प लिया है । ऐसे में से कई व्यक्ति आज के दिन कर्जा चुकाने की क्षमता भी नहीं रखते । इसतरह के गरीब और अशिक्षित व्यक्ति हमारे नेताओं के लिए ‘वोट बैंक’ होते हंै । सच यही है कि ‘मीटर ब्याज पीडि़त’ के नाम से आन्दोलन में सहभागी होनेवाले अधिकांश व्यक्ति खुद के ज्ञान और चेतना से आन्दोलन में नहीं आए हैं । उन लोगों को वोट बैंक बनाकर राजनीति करनेवाले स्वार्थी स्थानीय नेता के उकसाने पर ही वे लोग काठमांडू आए थे । उन लोगों को आश्वासन दिया गया कि अगर आन्दोलन में सहभागी होते हैं तो उन लोगों को कर्जा से मुक्त कराया जाएगा ।
इसतरह पीडि़त व्यक्तियों को इकठ्ठा करनेवाले स्थानीय नेता पार्टी केन्द्र से उन लोगों को दिखाकर बार्गेनिङ करते हैं । यूं कहें तो यहां एक प्रकार की घिनौनी राजनीति होती है । आन्दोलन के दौरान कई लोग इसी घिनौनी राजनीति का भी शिकार हो गए हैं । हां,आन्दोलन में आनेवाले सभी व्यक्ति कर्जा चुकाने की क्षमता नहीं रखते हैं, ऐसा नहीं है । बहुत सारे व्यक्ति कर्जा चुकाने की क्षमता भी रखते हैं । जिनके पास कर्जा चुकाने की क्षमता है, वह भी कर्जा ना चुकाने के उद्देश्य से आन्दोलन में आए हैं ।

विशेषतः ग्रामीण क्षेत्र में वित्तीय साक्षरता के लिए महत्वपूर्ण योगदान करनेवाले सहकारी, लघुवित्त जैसे वित्तिय संस्थाओं से कर्जा लेनेवाले अधिकांश व्यक्ति कर्जा चुकाने की क्षमता रखते हैं । लेकिन वे भी आन्दोलन में सहभागी हो गए हैं । ऐसे व्यक्तियों को भी विश्वास दिलाया गया कि आन्दोलन में सहभागी होने से कर्जा से मुक्ति मिलती है । इसतरह के धन्दा में सिर्फ स्थानीय नेता सहभागी हैं, ऐसा नहीं है । केन्द्रीय राजनीति में सहज पहुँच रखनेवाले व्यक्ति तथा व्यवसायी पीडि़तों की पीड़ा में राजनीति करते हुए समाज को गलत दिशा में ले जा रहे हैं ।

हां, बैंक तथा वित्तीय संस्थाओं के विरुद्ध दुर्गा प्रसाई ने जो आन्दोलन शुरु किया, वह इसी का एक नमूना है । प्रसाई द्वारा शुरु आन्दोलन में स्थानीय मीटर ब्याज पीडि़त से लेकर सहकारी, लघुवित्त तथा बैंक से कर्जा लेनेवाले व्यक्ति शामिल हैं । प्रसाई द्वारा शुरु आन्दोलन के कारण देश के व्यवसायिक वातावरण में भी नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है । इसी आन्दोलन के कारण आज बैंक कर्जा विस्तार नहीं कर पा रहा है । बैंक तथा वित्तीय संस्था से कर्जा लेनेवालों को कर्जा ना चुकाने के लिए आग्रह करनेवाले प्रसाई का व्यक्तिगत स्वार्थ अलग ही है । उनकी व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए अन्य पीडि़त प्रयोग में आ रहे हैं ।

प्रसाई ने कहा है– ‘आप लोग मेरे आन्दोलन में सहभागी होते हैं तो आप लोगो को मैं कर्जा से मुक्त करा दूँगा ।’ लेकिन प्रसाई जो कह रहे हैं, वह सम्भव नहीं है । बैंक तथा वित्तीय संस्था से जिन्होंने कर्जा लिया है, वह किसी न किसी तरह से तो चुक्ता करना ही होगा । वित्तीय संस्था की ओर से वितरित कर्जा नहीं उठाया जाता है तो बैंक तथा वित्तीय संस्था ही संकट में पड़ जाती है, जो देश की अर्थ व्यवस्था के लिए भी चुनौतीपूर्ण परिस्थिति हैं ।
इसीलिए जिनके पास कर्जा चुकाने की क्षमता नहीं है, उन लोगों का कर्जा सरकार की ओर किया जाता है । विश्वव्यापी प्रचलन भी यही है । लेकिन नेपाल सरकार के पास ऐसे लोगों का कर्जा चुकाने का पैसा आज के दिन नहीं है । ऐसी परिस्थिति में सरकार ने मीटर ब्याज पीडि़ताें के साथ ४ सुत्रीय जो सहमति की है, उसके कार्यान्वयन पर आशंका होना स्वाभाविक है । हां, मीटर ब्याज पीड़क के रूप में जो हैं, उन लोगों का अवैध धन्दा बन्द कराने के लिए सरकार कुछ कर सकती है । साथ में पीड़क की ओर से की गई कानूनी कागजपत्र को जब्त कर सत्यतथ्य का पहचान भी किया जा सकता है, जिससे भी पीडि़तो को कुछ हद तक न्याय प्राप्त हो सकता है । लेकिन वैधानिक आर्थिक कारोबार से पीडि़तों को कर्जा मुक्त कराने की ताकत सरकार के पास भी नहीं है ।

यही कारण है कि आज दुर्गा प्रसाई द्वारा शुरु आन्दोलन ‘टॉय टॉय फिस्स’ होने लगी है । परिणामतः ग्रामीण क्षेत्र आन्दोलन के लिए काठमांडू आनेवाले व्यक्ति भी गांव वापस होने के लिए बाध्य हो गए हैं । इसका मतलब यह नहीं है कि मीटर ब्याज के कारण आज के दिन जो घरबार विहीन हो गए हैं, उन लोगों के प्रति सरकार की कोई भी जिम्मेदारी नहीं है । उन लोगों को अवश्य न्याय मिलनी चाहिए । उससे पहले वास्तविक पीडि़तो की पहचान होनी चाहिए । साथ में मीटर ब्याज का धन्दा चलानेवालों का धन्दा भी बंद होना चाहिए ।

लिलानाथ गौतम



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