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बैशाखी: सिख धर्म के नए साल, नई फ़सल की खुशी का पर्व!     

डॉ श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट
             सिख धर्म के महान पर्व बैसाखी वैशाख महीने के पहले दिन मनाई जाती है, जो ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार हर साल 13 अप्रैल को मनाई जाती है।लेकिन 36 साल में एक बार 14 अप्रैल को भी बैशाखी का पर्व मनाया जाता है। इस साल बैसाखी हिंदू कैलेंडर के अनुसार 13 अप्रैल को मनाई जा रही है। यह दिन हिंदू सौर कैलेंडर के अनुसार सिख नव वर्ष की शुरुआत का प्रतीक है और भारत में कई समुदायों के लिए इसे अत्यधिक शुभ दिन माना जाता है।इस वर्ष द्रिक पंचांग के अनुसार वैसाखी संक्रांति का क्षण 13 अप्रैल को रात्रि 9:15 बजे है।बैसाखी रबी की  फसल उत्सव है, जिसका कृषि महत्व के साथ-साथ धार्मिक महत्व भी है।  यह त्योहार भगवान इंद्र की पूजा से जुड़ा है, जिन्हें बारिश और उर्वरता का देवता माना जाता है। इस दिन, किसान अपनी भरपूर फसल के लिए भगवान इंद्र को धन्यवाद देते हैं और अपनी भविष्य की फसलों के लिए अच्छी बारिश की प्रार्थना करते हैं। बैशाखी के दिन की शुरुआत गंगा नदी या अन्य पवित्र नदियों में पवित्र डुबकी लगाने से होती है, इसके बाद गुरुद्वारों में जाकर प्रार्थना की जाती,मत्था टेका जाता है। लोग नए कपड़े  पहनते हैं और अपने प्रियजनों के साथ मिठाइयाँ और उपहारों का आदान-प्रदान करते हैं।बैसाखी के मुख्य अनुष्ठानों में से ‘भांगड़ा’ और ‘गिद्दा’ का प्रदर्शन भी है, जो पारंपरिक पंजाबी नृत्य हैं। जिसके माध्यम से फसल के मौसम की खुशी और उत्सव को दर्शाते हैं। इस अवसर पर लोग विशेष व्यंजन भी तैयार करते हैं जैसे ‘लंगर’, गुरुद्वारों में परोसा जाने वाला सामुदायिक भोजन, और ‘खीर’, ताजा गुड़ से बना मीठा चावल का हलवा बनाया जाता है।
बैसाखी सिर्फ एक त्योहार नहीं है; बल्कि यह लोगों के जीवन में खुशियों का प्रतीक  है। यह सिख धर्म मे नए साल की शुरुआत का प्रतीक है और एक नए कृषि मौसम की शुरुआत का भी प्रतिनिधित्व करता है। यह त्योहार इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सन 1699 में गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा खालसा पंथ के गठन की याद दिलाता है। इसलिए, बैसाखी को खुशी, आशा और नई शुरुआत के दिन के रूप में मनाया जाता है।बैसाखी पर्व, जो व्यक्तियों को अपनी यात्रा पर विचार करने, नकारात्मकता को त्यागने और सकारात्मकता को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करती है।
बैसाखी भरपूर फसल के लिए कृतज्ञता की भावना, समुदाय की भावना को बढ़ावा देने और लोगों के बीच खुशियों को साझा करने की भावना का प्रतीक है। यह श्रम के फल का आनंद लेने, ढोल की थाप पर नृत्य करने और शानदार पारंपरिक व्यंजनों का आनंद लेने का समय है।एक बार 10वें सिख गुरु ने पूछा कि हजारों की भीड़ में कौन धर्म के लिए मरने को तैयार है। आख़िरकार पाँच लोग स्वेच्छा से आगे आए और गुरु गोबिंद सिंह ने उन्हें बपतिस्मा दिया, जिसके बाद वे खालसा नामक समूह के पहले पाँच सदस्य बन गए। बैसाखी त्योहार पर सिख बपतिस्मा की परंपरा इस ऐतिहासिक घटना से ही उत्पन्न हुई थी।(लेखक आध्यात्मिक चिंतक एवं वरिष्ठ पत्रकार है)
   डॉ श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट    पोस्ट बॉक्स 81,रुड़की, उत्तराखंड मो0 9997809955



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