Tue. May 21st, 2024
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ललकार : विन्दा साहनी

कविता: ललकार

दम्भ तेरा तब चूर होगा,
काल क्रूर जब वर्षेगा ।
मुक्त होगी तब धरणी,
जन-जन यहाँ हर्षेगा ।
शोषण का अम्बार तुम्हारा,
काम कभी न आयेगा ।
काल के पहिया के नीचे,
तब तूँ रौंदा जायेगा ।
सत्ता के आसन पर, कुन्डली मार के जमा रहा,
स्वार्थ, लोभ मोह का कवच सदा तुझे थामा रहा ।
चेत-चेत हे नर-भक्षी तूँ वक्त तुझे ललकार रहा,
छोड प्रवृति दुशासन का चेतन है फटकार रहा ।
जहाँ का राम कुटिल हो जाए,
सीता हो जाए कुलटा ।
आदर्श-पात्र जहाँ रावण हो,
तो अबध बन जाए लंका ।
जहाँ अराजक न्याय धर्म हो,
चोरी जहाँ का आम कर्म हो ।
उस राष्ट्र को कौन बचाए,
अंग-प्रत्यंग शिथिल हो जाए ।
तब तिमीर में कहीं सुदूर में,
प्रकट होगी एक किरण ।
आभाष त्रास का हटेगा,
शेष बचेगा केवल रण ।
भेरी बजेगी रण-क्षेत्र में,
बज उठेगा तब डंका ।
शनै-शनै जगेगा साहस,
मीटती जाएगी शंका ।
भय की आती चरम सीमा जब,
मानव होते अति निर्भय ।
मुक्ती खोजते सत्ता निसाचर,
गलियारी में तब सभय। ।
जिस दिन मानव निश्चित करके
काल बन तुम पर टूटेगा ।
ताज तुम्हारा लुण्ठित होगा,
तक्त तुम्हारा छूटेगा ।

विन्दा साहनी, रौतहट

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