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ज्ञान की सर्वोच्च पराकाष्ठा मनुष्य को मनुष्यता से जोड़ना है : श्वेता दीप्ति

डॉ श्वेता दीप्ति, (सम्पादकीय-हिमालिनी), अंक फरवरी, 2024 मनुस्मृति में कहा गया है– “सत्य बोलना भी एक बड़ी कला है जो जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में नित्य एवं अविराम साधना से ही संभव है जो व्यक्ति अपनी वाणी पर संयम नहीं रख सकता वह सत्यव्रत का पालन नहीं कर सकता । गांधी जी ने कहा– अनुभव ने मुझे सिखाया है कि सत्य के पुजारी के लिए मौन उसके आध्यात्मिक अनुशासन का एक अंग है जाने–अनजाने बढ़ा–चढ़ाकर कहने की सत्य को दबा देने की या कम–ज्यादा कर देने की वृत्ति मनुष्य की स्वाभाविक कमजोरी है और मौन इस पर विजय पाने के लिए जरूरी है ।

किन्तु सत्य को हम तब तक आत्मसात या अपने व्यवहार में शामिल नहीं कर सकते जब तक कि हमें ज्ञान की प्राप्ति नहीं हुई हो । और ज्ञान वही है जो हमें सत्य की ओर ले जाए और सत्य वही है जो धर्म को स्थापित करे । ज्ञान तत्व प्रकाश जैसा होता है, जिससे मनुष्य का जीवन रूपांतरित होता है । वह जीवन के अर्थपूर्ण और यथार्थ के धरातल तक पहुंचता है । वहीं दूसरी तरफ अज्ञान से मनुष्य का समस्त जीवन अंधकारमय होता है । वह अपने लक्ष्य से भटक जाता है । इसलिए हर मनुष्य के जीवन में परम लक्ष्य ज्ञान और सत्य की खोज का होना चाहिए ।

उपनिषदों में वर्णित है कि, ओम असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मामृतं गमय ।।

यह श्लोक बृहदारण्यकोपनिषद् से लिया गया है । इसका अर्थ है कि मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो । मुझे अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलो. मुझे मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो ।
तमसो मा ज्योतिर्गमय का शाब्दिक अर्थ है अंधकार से प्रकाश यानी कि रौशनी की तरफ बढ़ो । कई बार हम इस श्लोक में निहित गूढ़ अर्थ के मायने समझ पाने में असमर्थ होते हैं । पौराणिक ग्रंथों में इस बात को इस तरह से विस्तार से बताया गया है कि अंधकार यानी कि बुराई और बुरी आदतों को त्यागकर प्रकाश यानी कि सत्य के पथ पर उन्मुख होना ही वास्तविक साधना और आध्यात्म है । लेकिन सांसारिकता से भरा हुआ मनुष्य अक्सर भौतिकता और भौतिक चीजों को एकत्र करने की जोड़–तोड़ में ही जीवन गुजार देता है और इस बात के वास्तविक मर्म को समझ नहीं पाता है ।

विस्तार से देखा जाए तो इसका अर्थ है कि जिस तरह प्रातः सूर्य की किरणों से रात का अंधकार गायब हो जाता है । ठीक उसी तरह मनुष्य रात के अंधेरे को अपने साधनों साधनों से दूर करने में लगा है । देखा जाए तो यह श्लोक मनुष्य को इसी बात के लिए प्रेरित करता है कि अपने अंतस में व्याप्त अंधकार से बाहर निकलकर प्रकाश के मार्ग पर चलो ।

परंतु ज्ञान की इस साधना में मनुष्य को एक और महत्वपूर्ण तत्व आत्मसात करना होता है–वह है क्रियान्वयन । यानी सद्ज्ञान की बातों पर जीवन में अमल किए बगैर ज्ञान निर्थक है । ज्ञान साधना में क्रियान्वयन का विशेष महत्व है । सद्ज्ञान के अनुभव और उसके समग्र क्रियान्वयन की साधना ही मनुष्य को उसके सत्य स्वरूप से बोध कराती है । ज्ञान से संबंधित किसी एक बात के क्रियान्वयन को जब हम राष्ट्र धर्म की ओर मोड़ते हैं, तब ज्ञान की पूर्णता होती है । मैं, मेरा, मुझे जैसी संकुचित भावनाओं से ऊपर उठकर हम अपनी संस्कृति, राष्ट्र प्रेम और स्वधर्म का समुचित पालन कर सकते हैं ।

हम चाहें तो ज्ञान को सिर्फ समझ ही नहीं सकते, बल्कि जी भी सकते हैं । अपने निजी कार्यो की सफलता से हमें उपलब्धि तो महसूस होती है, परंतु स्वयं को सशक्त कर जब हम राष्ट्र व धर्मसाधना की प्रखर तपस्या करते हैं, तभी हम इस आध्यात्मिक ज्ञान को सही अर्थो में अपने भीतर साध सकते हैं । ज्ञान की सर्वोच्च पराकाष्ठा मनुष्य को मनुष्यता से जोड़ना है । धर्म का आधार ही लोगों में परस्पर प्रेम का संचार करना है और नैतिकता का विकास कर अपने परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति समर्पण का भाव जाग्रत करना है ।

डॉ श्वेता दीप्ति
सम्पादक, हिमालिनी ।



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