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क्या संभव है बंद उद्योगों का फिर से संचालन ? डॉ. श्वेता दीप्ति

 



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डॉ श्वेता दीप्ति, हिमालिनी अंक फरवरी 2024 । बेरोजगारी, गरीबी, युवा पलायन, भ्रष्टाचार, ऋण से त्रस्त देश की आम जनता एक ऐसी सुबह की तलाश में है, जब उसे उम्मीद की वह किरण दिखे जिसमें वो ससम्मान जी सकें, सांसें ले सकें । कुछ दिनों पहले प्रधानमंत्री प्रचंड ने कहा है कि देश में बंद कल कारखाने खोले जाएंगे, उन्हें फिर से संचालित किया जाएगा । इससे उम्मीद की एक किरण तो दिख ही रही है । किन्तु सवाल यह है कि क्या सचमुच यह संभव है ?

सवाल यह भी कि आखिर ये कारखाने बंद क्यों हुए ? दुनिया आगे बढ़ रही है । विश्व का हर देश उन्नति करना चाहता है । नए उद्योग स्थापित करना चाहता है किन्तु नेपाल में यह नौबत ही क्यों आई कि उद्योग धंधे को बंद करना पड़ा ? देश के प्रतिनिधि कितने गंभीर हैं इस विषय में ? अगर गौर करें तो उन्हें चिन्ता भी क्यों होगी ? आयात से राजस्व आता ही है, विभिन पक्षों से कमीशन और घूस मिलता ही है और देश के युवा जो भावी प्रतिनिधि बन सकते हैं वो देश में रहते ही नहीं हैं तो ऐसे में निर्यात वृद्धि, आयात प्रतिस्थापन, उद्योग का विकास और आन्तरिक रोजगार को भला क्यों बढ़ाना पड़ा ? इसकी तो आवश्यकता कहाँ रह जाती है ?

क्या किसी भी देश के लिए सिर्फ जमीन की कीमतों में बढ़ोतरी और ऐसे क्षेत्रों में बैंकों का बढ़ता निवेश ही आर्थिक विकास की कसौटी है ? जबकि ठोस उत्पादन और निर्यात में वृद्धि के बिना वित्तीयकरण का विस्तार बैंकों में संकट और विदेशी मुद्रा भंडार को संकट की ओर ले जाता है । आर्थिक विकास के दौरान, आमतौर पर अर्थव्यवस्था की संरचना में भारी बदलाव होता है । यदि राष्ट्रीय उत्पाद में कृषि का योगदान घटता है, तो गैर–कृषि क्षेत्र, विशेषकर उद्योग का योगदान बढ़ जाता है । इससे सेवाओं, परिवहन, रियल एस्टेट और अन्य आधारशिला निर्माण के क्षेत्रों में वृद्धि देखी जा सकती है । कृषि से विस्थापित श्रम शक्ति नए रोजगारों में आबद्ध हो जाती है । किन्तु यह दृश्य नेपाल की अर्थव्यवस्था में नहीं मिलता है ।

नेपाली रोजगार पैदा करने वाले उद्योगों की गिरावट का सबसे ज्वलंत उदाहरण जूट उद्योग है । विक्रम संवत २०३०–४० के दौरान इस उद्योग को समर्थन देने के लिए जूट विकास केंद्र की स्थापना की गई थी । तराई में ५४,००० हेक्टेयर क्षेत्र में जूट की खेती होती थी । ७०,००० टन जूट का उत्पादन होता था जो अब घटकर १०,००० हेक्टेयर रह गयी है । कई मिलें बंद हैं । जो चल रहे हैं वो भारत और बांग्लादेश से कच्चा माल लाते हैं । परिणामस्वरूप, किसानों ने अपनी आय का स्रोत खो दिया, निर्यात में गिरावट आई और हजारों नौकरियाँ खÞत्म हो गईं ।

राष्ट्रीय उत्पादन में नेपाल की फैक्टरियों का योगदान लगातार घट रहा है । स्वाभाविक रूप से आयात प्रतिस्थापन और निर्यात उद्योग घट रहे हैं । इसका सीधा असर देश के अस्थिर व्यापार घाटे पर देखने को मिला है । आर्थिक विकास का आधार पूंजी–श्रम और प्रौद्योगिकी के संयोजन के माध्यम से कुल कारक उत्पादकता में वृद्धि है । नेपाल के औद्योगिक क्षेत्र की घटती उत्पादकता चिंता का विषय है । पूंजी–श्रम और प्रौद्योगिकी में निहित कुल उत्पादकता (कुल कारक उत्पादकता) में कमी का मतलब है कि नेपाली उत्पाद अन्य देशों के उत्पादों के साथ प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता खो रहे हैं । यह वास्तविकता नेपाल की निम्न अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धात्मकता (वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता सूचकांक) में देखी जा सकती है ।

कारखानों की गिरती स्थिति व्यापक बेरोजÞगारी का मूल कारण है । देखा जाए तो अभी तक यह समस्या राजनीतिक रूप नहीं ले पाई है क्योंकि नई श्रम शक्ति देश के भीतर काम न मिलने पर देश से बाहर चली जाती है और सरकार को उससे रेमिट्यान्स प्राप्त हो ही जाता है । लेकिन इससे प्राप्त धन के उपभोग के आधार पर आर्थिक विकास को कायम रखना मुश्किल है । ऐसा नहीं है कि प्रेषण आय का उपयोग पूंजी निर्माण के लिए नहीं किया जा सकता है, लेकिन देश में ऐसा कोई लक्ष्य या प्रयास सामने नहीं आया है । इस वास्तविकता को देखते हुए हमें निम्नलिखित प्रश्नों पर विचार करने की आवश्यकता है– देश में कारखानों में उत्पादन क्यों कम हो रहा है ? सरकार ने कानूनों और नियमों में लगातार सुधार का दावा किया है और निजी क्षेत्र ने भी समय–समय पर उनका स्वागत किया है, लेकिन लगातार गिरावट की स्थिति क्यों है ? कारखानों में निवेश किए बिना आयात की ओर झुकाव क्यों ? क्या हमारे उद्योगपतियों ने नेपाल में उद्योग के विकास की उपेक्षा की है ?

ये सारे प्रश्न नेपाल की आर्थिक–राजनीतिक संरचना से संबंधित हैं । आर्थिक विकास की गति का देश के राजनीतिक मूल्यों और संरचना से गहरा संबंध है । महत्वपूर्ण यह है कि सार्वजनिक नीति निर्माता इस संरचना का उपयोग किन लक्ष्यों के लिए करते हैं । जब सरकार की नीति निर्माण और उद्यमिता को बढ़ावा साथ–साथ चलता है, तो आर्थिक विकास में तेजी आना स्वाभाविक हो जाता है ।
बजार में आए नयी श्रमशक्ति का व्यवस्थापन अगर देश के भीतर ही करने की बाध्यता होती तो निश्चय ही सत्ताधारियों के लिए आयात प्रतिस्थापन और निर्यातमूलक उद्योग का विकास अनिवार्य होता । और अगर ऐसा नहीं होता तो बेरोजगार युवाओं की आवाज उठती और वो संघर्ष के लिए सड़कों पर उतरते । लेकिन विदेशी रोजगार में बढ़ोतरी और उससे होने वाली प्रेषण आय के नए स्रोत से यह स्थिति टल गई है और भले ही देश में रोजगार में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है, लेकिन सरकार चलाना और विकास का नारा देना सत्ताधारियों के लिए आसान हो गया है ।

संप्रेषण आय से बैंकों में भंडार बढ़ता है लेकिन इस प्रकार बढ़े हुए भंडार के उपयोग में निवेश और खपत को संतुलित करने का कोई प्रयास नहीं किया गया । नेपाल की सरकार और वित्तीय प्रणाली ने नए भंडार को खुले दिल से उपभोग पर खर्च किया । स्वाभाविक रूप से, नेपाल के बैंकों ने औद्योगिक और कृषि क्षेत्रों के बजाय विदेशी वस्तुओं के आयात पर ध्यान केंद्रित किया है । नेपाल के शासक वर्ग ने इस नीति को प्रोत्साहित किया क्योंकि इस नीति से कम समय में आयात सीमा शुल्क के माध्यम से राजस्व बढ़ाया जा सकता था । स्वाभाविक रूप से, देश की अर्थव्यवस्था आयात व्यापार पर अधिक केंद्रित हो गई और व्यापार घाटा उसी अनुपात में बढ़ता गया ।
जहां तक नेपाल के उद्यमियों का सवाल है, उनमें से अधिकांश उद्योग में दीर्घकालिक लाभ के बजाय सत्ता में बैठे लोगों की जेबें भरने के लिए त्वरित लाभ के व्यवसाय से प्रभावित हैं, कुछ लोग स्वयं सत्ता तक पहुंच कर सत्ता और धन के बीच की दूरी को मिटाने का प्रयास कर रहे हैं । कुल मिलाकर अरबों के आयात से जो धन आता है वह आज के शासकों के लिए काफी है । इसलिए औद्योगिक क्षेत्र और रोजगार विस्तार के लिए आवश्यक दक्षता और प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने के लिए नीतियों का निर्माण और कार्यान्वयन व्यवहार में कभी नहीं हो सका । प्रगति और विकास के नाम पर ईमानदारी और अनुशासन के बड़े–बड़े भाषण हुए, लेकिन व्यवहार में पाखंड जड़ जमाता रहा । सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के उद्योग ध्वस्त होते चले गए । परिणामस्वरूप, युवा नेपाली खाड़ी देशों में भटकने को मजबूर हैं । नेपाल के शासकों को इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है और आज नेपाल औद्योगीकरण के बजाय विपरीत दिशा में बढ़ता जा रहा है ।

एक समय में, नेपाल द्वारा आवश्यक चीनी, धागा, सिगरेट, टायर और कृषि उपकरणों का उत्पादन देश में सरकारी स्वामित्व वाले उद्योगों द्वारा किया जाता था । लेकिन उन उद्योगों में राजनीतिक हस्तक्षेप और कर्मचारियों के रूप में मनमाने ढंग से श्रमिकों की भर्ती के बाद, उनमें से अधिकांश उद्योगों को नुकसान उठाना पड़ा और अंततः वो बंद हो गए । इन बंद और बीमार उद्योगों के संचालन की तरफ वर्तमान सरकार ध्यान तो दे रही है ।
उम्मीद है कि सरकार जल्द ही जनकपुर सिगरेट फैक्ट्री, बीरगंज चीनी फैक्ट्री, गोरखकाली रबर उद्योग, बुटवल यार्न फैक्ट्री, कृषि उपकरण फैक्ट्री, नेपाल मेटल इंडस्ट्रीज, नेपाल वेरिएंट मैग्नासाइट फैक्ट्री आदि कारखानों पर अवश्य ध्यान देगी ।

एक समय में देश का गोरखकाली उद्योग विश्व स्तर पर स्थान बनाने में कामयाब हो गया था । परिवहन के साधनों में वृद्धि के बाद देश में टायर उत्पादन के उद्देश्य से गोरखकाली रबर उद्योग की स्थापना की गई थी । उद्योग की आधारशिला २०४१ में तत्कालीन राजा बीरेंद्र ने गोरखा के मजुआ देउराली में रखी थी और इसका निर्माण २०४८ में पूरा हुआ था । कैबिनेट की बैठक में २०४९ से टायर का उत्पादन शुरू करने वाली इंडस्ट्री को माघ ३ गते २०७५ से पूरी तरह बंद करने का निर्णय किया गया । जबकि उस समय नेपाल के टायर बाजार के ४० प्रतिशत हिस्से पर गोरखकाली रबर उद्योग का कब्जा था । और यह विदेशों के प्रसिद्ध टायरों से प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम था । यह एक सुखद पहलु है कि सरकार ने इसे दोबारा संचालित करने का ऐलान किया है । लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि पुरानी तकनीक से इंडस्ट्री नहीं चल सकती । अलग–अलग समय पर किए गए अध्ययनों से यह निष्कर्ष निकला है कि इसे ३ अरब के निवेश से आधुनिक बनाया जा सकता है और १ अरब की लागत से इसे पुरानी स्थिति में ही संचालित किया जा सकता है ।

प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहाल प्रचंड ने गोरखा से चुनाव लड़ते समय रबर उद्योग को बहाल करने का एजेंडा घोषणापत्र में रखा था । अब उन्होंने बंद उद्योगों को चलाने पर बहस शुरू कर दी है । सरकार ने गोरखकाली रबर उद्योग के साथ–साथ हेटौडा कपड़ा उद्योग और बुटवल यार्न फैक्ट्री को फिर से संचालित करने की घोषणा की है । इसके लिए एक उच्च स्तरीय अध्ययन समिति भी गठित की जा रही है । गण्डकी राज्य सरकार भी अपनी नीतियों एवं कार्यक्रमों में रबर उद्योग के संचालन का उल्लेख करती रही है । रबर उद्योग और भृकुटी पेपर मिलें गंडकी प्रदेश में आती हैं । भृकुटी कागज कारखाना भी बंद है ।

लोकतंत्र प्राप्ति के बाद कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा अपनाई गई निजीकरण की नीति ने न केवल देश के उद्योगों को डुबो दिया, बल्कि देश में भ्रष्टाचार का संस्थागत विकास भी हुआ । कांग्रेस सरकार द्वारा जिन संस्थानों का निजीकरण किया गया उनमें से अधिकांश की हालत खस्ता है । जिन कम्पनियों का आंशिक या पूर्णतः सरकार के शेयर स्वामित्व को बेचकर निजीकरण किया गया है उनमें से अधिकांश बंद हो चुकी हैं और जो अभी भी चल रही हैं वे घाटे में चल रही हैं ।

२०४८ में निजीकरण की नीति अपनाने के बाद अब तक ३० से अधिक उद्योगों और वाणिज्यिक संस्थानों का निजीकरण किया जा चुका है । इनमें से केवल ११ संस्थान ही चालू हैं । शेष १९ संस्थानों में से ३ अस्तित्वहीन हैं, ९ बंद हैं और ७ चालू नहीं हैं । वित्त मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, निजीकरण के बाद काम कर रही ११ कंपनियों में से केवल ५ ही मुनाफे में हैं । बाकी ६ संस्थान घाटे में हैं ।
वर्तमान समय में यह यक्ष प्रश्न हमारे सामने है कि सरकार क्या सचमुच इन बंद उद्योगों को सुचारु करने के लिए महत्तवपूर्ण और सार्थक कदम उठाएगी ? क्या सरकार के पास कोई दीर्घकालीन योजना है या ये महज खोखले दावे हैं ?



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