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जनक के प्रांगण में पाँच दिवसीय प्राज्ञ सभा : अजय कुमार झा

अजयकुमार झा, हिमालिनी अंक फरवरी 2024। जनकपुरधाम– २०८० –१०–१८ गते गुरुवार से चल रहे जनकपुरधाम साहित्य, कला एवं अंतर्राष्ट्रीय नाटक महोत्सव में अलग–अलग विषयों पर चर्चा, नाटक मंचन, सांस्कृतिक पारंपरिक गीत, कविता पाठ, कार्यशाला एवं प्रदर्शनी, बहुभाषी नाटक, मिथिला भोजन एवं पुस्तक प्रदर्शनी, विद्यालय स्तरीय भाषण प्रतियोगिता एवं अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम, नृत्य और शुभकामना अर्पण जैसे अनेकों कार्यक्रम को बड़ी ही कुशलता के साथ समायोजन करते हुए आयोजन किया गया । इस ऐतिहासिक महोत्सव के आयोजक मिथिला विकास कोश जनकपुर धाम के अध्यक्ष जीवनाथ चौधरी जी के सशक्त व्यवस्थापन और अति जिम्मेदारी पूर्वक निर्वाह की गए सक्रिय भूमिका ने इस पाँच दिवसीय महोत्सव को सफल ही नहीं उपलब्धि मूलक भी बनाया । महोत्सव को भव्य एवं सभ्य तरीके से मनाने के लिए कार्यकारिणी समिति ने १९ नवंबर को बैठक कर निधि के अध्यक्ष चौधरी की अध्यक्षता में १०११ सदस्यीय मूल समारोह समिति का गठन किया । जिसमें जनकपुरधाम के सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि, राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि, युवा, बिजनेस पत्रकार और नागरिक समाज के नेता शामिल हैं ।

महोत्सव का उद्घाटन पूर्व प्रधानमंत्री व नेकपा यूनाइटेड समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष माधव कुमार नेपाल करते हुए अपनी शुभकामना मन्तव्य में कहा है कि मैथिली भाषा के विकास में राज्य का निवेश जरूरी है । उन्होंने कहा कि मैिथली भाषा, साहित्य और संस्कृति का अस्तित्व समय–समय पर संकट में रहा है और अन्य भाषाओं का सम्मान कर अपनी भाषा के अस्तित्व की रक्षा करना जरूरी है । उन्होंने कहा कि नेपाल में १३ अलग–अलग जातियां हैं और सभी को अपनी पहचान बनाए रखनी चाहिए । उन्होंने जनकपुरधाम को एक ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल बताते हुए इस बात पर जोर दिया कि जनकपुरधाम को पर्यटन क्षेत्र के रूप में विकसित किया जाना चाहिए और इसे हिंदुओं के लिए आकर्षण का केंद्र बनाया जाना चाहिए । उन्होंने कहा कि उनके नेतृत्व में सरकार ने पहले भी मैथिली भाषा के संरक्षण के लिए हर तरह का सहयोग दिया है और इस बात पर जोर दिया कि आने वाले दिनों में भी राज्य को मदद करनी चाहिए । उन्होंने कहा कि प्राचीन काल में भी विदेह गणराज्य में राजा जनक ने हल चलाकर श्रम का सम्मान किया था और राज्य चलाने के लिए मितव्ययिता अपनाई थी, जो आज राज्य चलाने के लिए एक सबक है ।

कार्यक्रम में जनता समाजवादी पार्टी नेपाल के अध्यक्ष और पूर्व उपप्रधानमंत्री उपेन्द्र यादव ने कहा कि राज्य को सभी भाषाओं के विकास की जिम्मेदारी लेनी चाहिए और कहा कि नेपाल में भाषाओं के विकास में अभी भी उपेक्षा और भेदभाव है । उन्होंने चर्चा की कि मैथिली नेपाल में दूसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है और इस बात पर जोर दिया कि सरकार के तीनों स्तरों को मैथिली भाषा के विकास के लिए गंभीर होना चाहिए । उन्होंने कहा कि कई बलिदानों से मिले संविधान में भाषा के विकास में भेदभाव किया गया है और संविधान में संशोधन की जरूरत है । कार्यक्रम में मधेश प्रांत के पूर्व मुख्यमंत्री लालवावु राउत ने कहा कि पूर्व में उनके नेतृत्व में सरकार ने विभिन्न भाषाओं के विकास के लिए मधेश ज्ञान संस्थान चलाया था और मैथली भाषा के विकास के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की थी । कार्यक्रम में बोलने वाले अधिकांश वक्ताओं ने महोत्सव की सफलता की कामना की और मैथली भाषा, साहित्य एवं कला संस्कृति के संरक्षण पर जोर दिया । कार्यक्रम की अध्यक्षता मैथिली विकास निधि के अध्यक्ष जीवनाथ चौधरी, नेपाली कांग्रेस के संयुक्त मंत्री महेंद्र यादव, सीपीएन (यूएमएल) सचिव और मधेश प्रभारी योगेश भट्टराई, सीपीएन (माओवादी केंद्र) नेता और मधेश सरकार की संस्कृति मंत्री सुनीता यादव, राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी की नेता सोविता गौतम ने की । सीपीएन एस रामचन्द्र झा, वरिष्ठ साहित्यकार डा । राजेंद्र बिमल सहित नेताओं ने अभिनंदन भाषण दिया । महोत्सव के अवसर पर फाउंडेशन ने आज सुबह जनकपुरधाम नगर क्षेत्र में मिथिला के विभिन्न सांस्कृतिक पहलुओं को शामिल करते हुए एक दिव्य झांकी का प्रदर्शन किया है ।

इस कार्यक्रम मे देश विदेश के सौ से अधिक कलाकारों ने भाग लिया, इस दौरान ‘विदेश जाइत मधेश’ शीर्षक परिचर्चा में वक्ताओं ने इस बात पर गंभीर चिंता व्यक्त की कि मधेश जैसी उपजाऊ और समतल भूमि में रोजगार के अवसर पैदा नहीं हो पाने के कारण युवा लोग दिन–ब–दिन विदेश पलायन करने लगे हैं । कार्यक्रम में राजनेता बृखेश चंद्र लाल ने कहा कि भूखे लोग देश के विकास में योगदान नहीं दे सकते और यही कारण है कि आम युवा सस्ता श्रम बेचने के लिए विदेश पलायन करने को मजबूर हैं । उन्होंने देश निर्माण के दौरान युवा शक्ति के पलायन को नये संस्करण की प्राथमिकता बताया और टिप्पणी की कि पलायन करने वाले युवाओं में २८ ।६८ प्रतिशत मधेश के हैं, जो भयावह स्थिति को दर्शाता है । वहीं, डॉ. सूर्यनाथ मिश्र ने कहा कि देश में संभावनाओं वाले क्षेत्रों में राज्य द्वारा नियोजित निवेश की कमी के कारण रोजगार सृजन नहीं हो सका और आर्थिक रूप से वंचित वर्ग सबसे अधिक प्रभावित हुआ । उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि राज्य को सस्ते श्रम के लिए विदेशों में पलायन करने वाले अधिकांश गरीब लोगों को लक्षित करके समय पर रोजगार के अवसर पैदा करना शुरू करना चाहिए ।

इसी तरह, २७ साल तक कतर में काम करके लौटे मोहर्रम नद्दाफ ने बताया कि नेपाल के राजनीतिक नेतृत्व में देश बनाने के लिए विचारों और योजनाओं की कमी के कारण युवाओं को विदेश जाने के लिए मजबूर होना पड़ा है । उन्होंने कहा कि यह और भी दुखद है कि राज्य इस तथ्य के बावजूद निवेश नहीं कर पा रहा है कि विदेश जाने वाले युवा प्रशिक्षण और कौशल की कमी के कारण खतरनाक परिस्थितियों में काम कर रहे हैं । कार्यक्रम के वक्ता डॉ. सोहन साह, कौशल्या कुसवाहा, संजोग देव, देवेन्द्र भट्टराई, परमेश मंडल ने कहा कि यद्यपि देश की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा प्रेषण पर चल रहा है, लेकिन एक योजना बनाना आवश्यक है ताकि जिन परिवारों के पास विदेश में रोजगार के लिए गए जातकों को इससे लाभ हो सकता है ।’मिथिला पेंटिंग में समसामयिक’ शीर्षक परिचर्चा में वरिष्ठ चित्रकार एससी सुमन, उमाशंकर साह, श्यामसुंदर यादव, पद्मश्री दुलारी देवी, श्रीमती कल्पजा सिंह, विजयदत्त मणि ने व्यावसायिक विकास के लिए सरकार को तीनों स्तरों पर निवेश की जरूरत बतायी । भाषा सीमाओं और अनुवाद पर सत्र में भारत से भाषाविद् अशोक, डॉ. निक्की प्रियदर्शिनी, भास्करानंद भास्कर, प्रदीप विहारी, ललित झा, शिवशंकर श्रीनिवास ने भाग लिया । मैथिली संस्कृतिः लालित्य एवं जन सरोकार सत्र में डॉ. महेंद्रनारायण राम, परमेश्वर कापरी, अजित आजाद, रूपा झा, प्रवीण नारायण चौधरी ने मैथिली कला संस्कृति के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की ।

मैथिली के वरिष्ठ साहित्यकार रोशन जनकपुरी ने कहा कि भाषा, कला और संस्कृति के लिए मॉडल भवन बनाया गया है । मैथिली भाषा और साहित्य का प्रारंभिक काल ७वीं शताब्दी के उत्तरार्ध और ८वीं शताब्दी के पूर्वाद्र्ध में ज्योतिरीश्वर ठाकुर द्वारा लिखित वर्ण रत्नाकर पर आधारित माना जाता है । यह प्राचीन भाषा समूह भारोपेली भाषा परिवार से संबंधित है और भाषाई रूप से बंगाली, असमिया, उडि़सा और नेपाली से निकटता से संबंधित है । भले ही इस भाषा की अपनी तिरहुता लिपि है, लेकिन वर्तमान में इसका उपयोग उतना नहीं है, लेकिन इसके स्वर्णिम इतिहास को नकारा नहीं जा सकता, ऐसा कोष के अध्यक्ष चौधरी ने कहा ।

अपनी गुणवत्ता और मृदुभाषिता के कारण सर्वसम्मति से साहित्यकार श्याम सुंदर शशि को नई कार्यसमिति का सदस्य सचिव चुना गया जिसका उत्तमोत्तम प्रमाण उन्होंने उपरोक्त कार्यक्रम सुव्यवस्थित ढंग से संचालित कर श्रोताओ के दिलों को जीतते हुए दिया । कोष के सदस्य सुनील मल्लिक, नवीन कुमार मिश्र, नित्यानंद मंडल, सुजीत कुमार झा, पूनम झा मैथिली, अनिता रानी मंडल, परमेश झा, विष्णुकांत मिश्र, रामचन्द्र दास, पंकज महतो, मनमोहन साह, प्रमोद चौधरी चयनित हैं । यह संस्था हर २ साल में जनकपुर साहित्यिक कला महोत्सव का आयोजन करता है, किताबें प्रकाशित करता है, कहानी संगोष्ठी, कवि संगोष्ठी, बातचीत आदि सहित हर साल ५१०००÷५१००० के दो लेखकों को पुरस्कार प्रदान किया जाता है । इस बार सांस्कृतिक कार्यक्रम में प्रस्तुति देने के लिए मशहूर गायकों को भी आमंत्रित किया गया था । यह महोत्सव मैथिली विकास कोष, मधेस सरकार के उद्योग, वाणिज्य और पर्यटन मंत्रालय और जनकपुरधाम उप–महानगरीय शहर के तत्वावधान में जनकपुरधाम में महेंद्र नारायण निधि मिथिला सांस्कृतिक केंद्र में आयोजित किया गया ।

मिथिला और मधेस के सामाजिक, सांस्कृतिक और विकास के क्षेत्र में अविष्मरणीय तथा अमूल्य योगदान देते आ रहे एक अथक योद्धा आदरणीय जीवनाथ चौधरी जी (मैथिली विकास कोष के अध्यक्ष), जिन्हें आज अन्तर्राष्ट्रीय जगत भी नमन् करता है । भारत से आए विद्वान साहित्यकारों ने कहा कि आज तक के जीवन में हमने इतना भव्य और सुव्यवस्थित कार्यक्रम नहीं देखा । उन्होंने हमें सम्मानित कर गौरवान्वित किया और हम अपनी संस्था के ओर से उन्हें सम्मानित कर खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं । यहां साहित्य, समाजीकता, सांस्कृति और भाषा संरक्षण तथा संवर्धन के लिए जिस प्रकार योजनाबद्ध एक मुष्ट संगठित प्रयास किया गया वह अपने आप में अदभुत प्रेरणादायी है । सफलता के चरम बिंदु को अतिक्रमण कर सुफलता को प्राप्त यह आयोजन और व्यवस्थापन; आयोजक और व्यवस्थापक जीवनाथ जी के विशेष कुशलता और दिव्य नेतृत्व शक्ति की सशक्तता के प्रमाणिकता का सार्वभौम प्रतिष्ठा है । उपरोक्त संस्था के लगातार तीन तीन बार सर्वमान्य अध्यक्ष के रूप में प्रतिष्ठित होना उनकी इसी सर्वजन हिताय समावेशी संस्कार तथा उदार स्वभाव के कारण है ।

समापन कार्यक्रम में मधेस प्रांत की उद्योग, वाणिज्य एवं पर्यटन मंत्री सुनीता यादव ने कहा कि यह महोत्सव मैथिली भाषा, संस्कृति, कला एवं साहित्य के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण संदेश देने में सफल हुआ है । उन्होंने कहा कि सरकार और हितधारकों को पांच दिवसीय चर्चा, कला और नाटक प्रदर्शनी और अन्य सत्रों के दौरान व्यक्त विचारों को लागू करने पर ध्यान देना चाहिए । इसी तरह, नेपाली कांग्रेस नेता और पूर्व मंत्री रामसरोज यादव ने कहा कि राज्य को सभी भाषाओं और संस्कृतियों के संरक्षण को समान महत्व देना चाहिए । उन्होंने अपनी पहचान और संस्कृति की रक्षा के लिए सभी को एकजुट होने की जरूरत भी बताई । पूर्व मंत्री सत्रुधन प्रसाद महतो, जनकपुरधाम उपमहानगर प्रमुख मनोज कुमार साह, भारतीय साहित्यकार डॉ. महेंद्र नारायण मिश्र और आदरणीय रवींद्रनाथ चौधरी ने पर्व की महत्ता पर अपने विचार दिये । आयोजक मैथिली विकास कोष के अध्यक्ष जिवनाथ चौधरी ने कहा कि पूरे महोत्सव के दौरान २० विषयों पर चर्चा के दौरान मधेस और देश निर्माण के लिए गंभीर चर्चा हुई और उन्होंने हितधारकों से इसे व्यवहार में लाने का आग्रह किया । उन्होंने प्रतिबद्धता व्यक्त की कि पूरे देश की कला,संस्कृति,साहित्य, नाटक और विभिन्न विषयों पर एक प्रांगण में चर्चा करने का प्रयास किया गया है और उन्होंने भविष्य में इसे और अधिक आयोजित करने का वादा किया । महेंद्र नारायण निधि संस्कृति केंद्र में आयोजित महोत्सव मैथिली विकास कोष,राज्य के उद्योग,वाणिज्य और पर्यटन मंत्रालय और जनकपुरधाम उप–महानगरीय शहर की एक संयुक्त परियोजना थी । कोष के सदस्य सचिव श्यामसुंदर शशि ने बताया कि नेपाल और भारत के कलाकारों द्वारा मैथिली, नेपाली, हिंदी में साहित्य, कला, राजनीति, सामाजिक और इतिहास, पेंटिंग, किताबें, मिथिला भोजन प्रदर्शनी, नाटक से संबंधित विभिन्न विषयों पर चर्चा की गई । असमिया और बंगाली भाषाएँ । २०५५ में स्थापित यह फंड २०७३ से महोत्सव का आयोजन करता या रहा है ।

उपरोक्त सभी क्रियाकलापों के साथ हिन्दी भाषा के प्रति आम उदासीनता ने विशुद्ध मधेस प्रेमियों को निराश जरूर किया । स्वयं पूर्व मुख्यमंत्री राऊत जी ने भी कहा, मेरे लिए दो भाषा मे से किसी एक को चुनना था । ‘ हिन्दी और नेपाली’ और मैंने नेपाली भाषा को ही चुना । यही है मधेसी नेताओं की गुलामी मानसिकता । हिन्दी को नजरअंदाज करना संभवतः उनके पार्टी आलाकमान और खसिया सत्ता लगाम के कारण ही है । चुनाब के समय में फिर यही लोग हिन्दी में वोट मांगने जाएंगे । मधेसी आम वोटर को इतना होश है नहीं की इनकी धृष्टता को दंडित कर सकें । जातीय और खसिया पत्रकार भी कल इनके ही साथ हो जाएंगे । दूसरी बात इस कार्यकर्म को और भी प्रभावोत्तेजक और जमीनी पहुँच तक ले जाने के लिए मैथिली लगायत हिन्दी,भोजपुरी,वज्जिका,मगही और अवधी भाषा को भी विकसित करने के लिए योजनाएं और अवसर मिलना चाहिए ।

 

ध्यान रहे ! मधेस और मधेसियों के सर्वांगीण तथा दूरगामी हित के लिए हिन्दी ही एक मात्र वह भाषा है, जिसमें उपरोक्त सभी भाषाओं को अपनी आँचल मे समेटकर लक्ष्य प्राप्त करा सके । अगर हम सिर्फ जनकपुर को केंद्रित करके ही अपनी जीवन को सीमित करना चाहते हैं तब तो कोई बात नहीं । कूप मंडूक होने के लिए बधाई है । परंतु यदि हम विराट हृदय और वृहद सोच के साथ आगे बढ़ना चाहते हैं तो हमें बाईस जिला के वाद समग्र नेपाल के हित में सोचने और निर्णय लेने के लिए विमर्श होना चाहिए । विमर्श के अनेकों सत्रों मे से कम से कम एक सत्र ‘हिन्दी भाषा और मधेस’ रहता तो और भी सुहावना होता । इसी तरह सभी भाषाओं के लिए एक एक सत्र होता तब आम लोग समझ पाते की आखिर हम क्या हैं ? हमें किस ओर सामूहिक कदम बढ़ाना चाहिए ? हमारी मूलभूत सामाजिक समस्या और सर्वमान्य समाधान के लिए दीर्घकालीन उपाय और समझदारी क्या हो सकता है ? अतः आगे से समग्र मधेस के भाषिक और सांस्कृतिक विरासत को एक ही प्रेम की डोर मे पिरोने के लिए विशाल भावना के साथ कदम बढ़ाया जाए ।

 



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