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मूल्यों पर आधारित शिक्षा होगी, तभी आप अच्छे इंसान दे पाएँगे : डा. धनंजय जोशी

डा. धनंजय जोशी Dr Dhananjay With Himalini Mag Dogra
 
डा. धनंजय जोशी Dr Dhananjay With Himalini Mag Dogra
डा. धनंजय जोशी Dr Dhananjay With Himalini

प्रस्तुति-एस एस डोगरा, हिमालिनी अंक फरवरी, 2024।

शिक्षा के क्षेत्र में डॉ धनंजय जोशी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं । डॉ जोशी मूलरूप से उत्तरखंडी हैं परन्तु दिल्ली में जन्में–पढ़े हैं । उन्होंने एम.ए. में गोल्ड मेडल लिया तथा पी.एच.डी. केन्द्रीय शिक्षा संस्थान से किया । वे अच्छे लेखक तथा कवि हृदय हैं, काव्य संग्रह के साथ–साथ शिक्षा पाठ्यक्रम पर कई किताबे लिख चुके हैं । डॉ जोशी ने, दिल्ली विश्विद्यालय से शिक्षण आरम्भ करने के उपरांत गुरु गोबिंद सिंह इन्द्रप्रस्थ विश्वविधालय, दिल्ली के शिक्षा विभाग में बतौर संकाय प्रमुख तथा वर्षों तक शिक्षा शास्त्र के प्रोपÞmेसर पद पर कार्य किया । भारत के पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटलबिहारी वाजपेयी द्वारा सम्मानित, डॉ जोशी छात्र जीवन से ही ओजस्वी वक्ता रहे हैं । वर्तमान में वे दिल्ली सरकार द्वारा गठित दिल्ली टीचर्स यूनिवर्सिटी के उप–कुलपति के पद पर अपनी सेवाएँ प्रदान कर रहें हैं । वे भारत सरकार द्वारा संचालित दूरदर्शन एवं आकाशवाणी के अनेक कार्यकर्मों में भाग लेते रहें हैं । पिछले दिनों हिमालिनी पत्रिका के दिल्ली ब्यूरो प्रमुख प्रोफेसर एस.एस.डोगरा ने डॉ धनंजय जोशी से मुलाकात की । प्रस्तुत है बातचीत के संपादित अंश ः

० हमारे जीवन में शिक्षा एवं शिक्षक का क्या महत्व है ?

– जीवन में दोनों का अत्याधिक महत्व होता है । अच्छा शिक्षक संवेदनशील होता है हमारे अंदर विनय होना चाहिए । जिसे संस्कृत के इस श्लोक से समझा जा सकता है
“विद्या ददाति विनयम,विनयाद् याति पात्रताम् ।
पात्रत्वात् धनमाप्नोति,धनात् धर्मं ततः सुखम् ।।”
अर्थात विद्या से विनय की प्राप्ति होती है, विनय से हमे पात्रता की प्राप्ति होती है, पात्रता से हमे धन की प्राप्ति होती है, धन से धर्म की प्राप्ति होती है और धर्म से सुख की प्राप्ति होती है ।
मेरे पिता स्वयं अध्यापक रहे उन्होंने कई वर्ष साधना, शिक्षा और लेखन में गुजारे । मेरे गुरु कमल कुमार जैन जी (दिल्ली विश्वविधालय में डीन ) मेरे पी.एच.डी. के गाइड रहे । इन दोनों का मेरे जीवन पर बहुत प्रभाव रहा । मैंने अपने गुरु जी के गुजर जाने के उपरांत उनकी याद में काव्य संग्रह “मधुर स्मृति कमल” भी लिखा ।

० इन्टरनेट के जÞमाने में किताबों तथा ऑनलाइन शिक्षा पर आपके क्या विचार हैं ?
– आज हमारे विधार्थी शब्दों से, किताबों से दूर जा रहे हैं, पढने की दिशा से दूर जा रहे हैं, लाइब्रेरी खाली हैं क्योंकि हमने ऑनलाइन को बहुत ज्यादा महत्व दे दिया है । इसीलिए आज के विधार्थी गूगल से पढना चाहते हैं, टेबलेट से पढना चाहते हैं । जहाँ गूगल खÞत्म होता है वहीँ से गुरु का रोल शुरू होता है । गूगल एक सीमित जवाब देता है साथ ही हजारों इन्टरप्रीटेसन देता है लेकिन उसमें से कौन सा उत्तर सही है वह तो गुरु ही बता सकता है । कहने का तात्पर्य है ऑनलाइन, ऑपÞmलाइन का कहीं भी कंपनसेशन नहीं है । हमने किसी तरीके से कोरोनाकाल तो काट लिया, लेकिन अब सरकार भी कह रही है हाईब्रिड मोड रखो , मतलब सत्तर प्रतिशत ऑपÞmलाइन हो । ऑनलाइन स्वयं में किसी भी चीज का इलाज नहीं है ।

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० आप दिल्ली टीचर्स यूनिवर्सिटी के बारे में कुछ महत्वपूर्ण जानकारी बताएँ ?
– दिल्ली टीचर्स यूनिवर्सिटी की स्थापना ४ मार्च २०२२ को हुई जिसका उद्देश्य ही शिक्षा और शिक्षकों का उत्कर्ष विश्वविद्यालय बनाना है । इस यूनिवर्सिटी का जन्म ही २ वर्ष पहले हुआ है, नया नवांकुर लगा है धीरे–धीरे वृक्ष बनेगा । एक यूनिवर्सिटी के लिए सौ–डेढ़ सौ साल कुछ भी नहीं होते हैं । हमें कहा गया है पच्चीस एकड़ लैंड नरेला में दी जा रही है जहाँ पर हम अपना परमानेंट कैंपस बनाएँगे । ये रिसर्च एवं ट्रेनिंग की यूनिवर्सिटी हैं जहाँ शिक्षक को ट्रेंड भी किया जाएगा, प्रशिक्षण भी दिया जाएगा और शिक्षा से रिलेटेड कोर्स भी लाए जाएँगे ।

० आपकी यूनिवर्सिटी क्या खास परोसने जा रही है ?
– हमारी यूनिवर्सिटी द्वारा स्कूल लेवल के शिक्षक ट्रेंड होंगें और कॉलेज लेवल के टीचर्स भी ट्रेंड होंगे । हम नई शिक्षा नीति के अनुसार दोनों ही लेवल का कार्य कर रहे हैं । हमारा उद्देश्य प्री सर्विस भी और इन–सर्विस भी ट्रेंड करना है । उनके साथ–साथ जो शिक्षक कॉलेज में चले गए हैं उनको भी ट्रेंड भी करना है । जिसका नई शिक्षा नीति ने बहुत महत्व दिया है । देखिए, जहाँ अध्यापक, शिक्षा के कॉलेज हैं वहां शिक्षक बी.एड.करने ट्रेनिंग लेकर जाते हैं लेकिन नार्मल कॉलेज में जो टीचर पढ़ाने जाता है । मतलब बी.ए. पढ़ाने जाता है तो केवल एम.ए. करता है आजकल एम फिल भी नहीं है वह पी.एच.डी.करता है, नेट निकालता है, पढ़ा लेता है । जबकि टेक्निकल साइड से है तो एम.बी.ए. करता है बी.बी.ए. पढ़ाने लगता है जो एम.टेक है वो बी.टेक पढ़ाने लगता है । शिक्षा नीति कहती है वो पैडागोजी उसे नहीं आती है क्योंकि उसको ट्रेनिंग नहीं है, सिद्धांत नहीं पता है, उसे चाइल्ड साइकोलॉजी, क्लास रूम मैनेजमेंट नहीं पता है कि कैसे कक्षा में पढाया जाता है मोटीवेट कैसे किया जाता है । वो एक कला है वो जब तक विद्यार्थियों को नहीं पता होगी । एक अच्छा अध्यापक वही बनेगा जो दोहे में कहा गया है
“करत–करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान ।
रसरी आवत जात ते सिल पर परत निशान ।।”
जितना जो १५–२० वर्ष के अनुभव से जाता है वो उतना प्रखर शिक्षक होता है ्र ये बात १९६४–६५ में शिक्षा आयोग आया था उसमें भी यह बात तब कह दी थी कि शिक्षकों का प्रशिक्षण बहुत आवश्यक है क्योंकि जब तक खुद शिक्षक प्रशिक्षित नहीं होगा तो वो अपने विद्यार्थियों को विकसित नहीं कर सकता । एक दीप ही दूसरे दीप को जलाता है ।

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० शिक्षा, संस्कार, सेवा, सद्भावना, नैतिकता आदि जैसे मूल्यों का समाज में क्या महत्व है ?
– “शिक्षार्थ आएं–सेवार्थ जाएँ” शिक्षा को सेवा से जोड़ना बहुत जरुरी है । शिक्षा व्यवसाय नहीं होना चाहिए । शिक्षा विकास का एक मात्र जरिया है । बच्चों के अंदर संस्कार देना बहुत जरुरी है हमारे विद्यार्थी धन कमाने के लिए ही नहीं पैदा हुए हैं । आज कौशल आधारित शिक्षा दी जा रही है उनके अंदर वैल्यूज भी तो हों । अच्छा इंसान बनाने पर आधारित शिक्षा हो । चरित्र आधारित शिक्षा हो, मूल्य आधारित शिक्षा हो । आज हर जगह युद्ध का माहौल है युद्धों से क्या मिलने वाला है सबसे ज्यादा नुकसान किसको होता है बच्चों को, शिक्षा को, विद्यालयों को, माताओं को, समाज–देश बर्बाद हो जाते हैं । हमें शिक्षा में काम करना है ताकि व्यक्तित्व का सर्वागीण विकास हो, कहीं न कहीं बच्चों को नैतिक भी बनाएँ । माता–पिता, गुरुओं का कैसे आदर करना है जब तक हम उन्हें यह नहीं सिखाएँगे कि मैं और मेरे से पहले राष्ट्र है अपने से पहले दूसरों को नहीं देखेंगे ।
“औरों के लिए जो जीता है और औरों के लिए जो मरता है
उसका हर आंसू रामायण और उसका हर कर्म ही गीता है ।”
हमारी परंपरागत शिक्षा ने हमें समर्पण, त्याग एवं सेवा तीनों चीजों को बखूबी सिखाया है । आज भारतीय मूल के ऋषि सूनक जो ब्रिटेन के प्रधानमंत्री हैं उनकी बॉडी लैंग्वेज देखिए उनमें कितना विनय है, संस्कार है वे किस तरह अपने बड़ों से मिलते है, किस तरह अपने बड़ों का सम्मान करते हैं किस तरह उनका भारत के प्रति लगाव है । उनका इसीलिए लगाव है क्योंकि यहाँ से जो जनेरशन बाहर विदेशों में गई उन्होंने फिर भी ये काम किया कि उनको अपनी जड़ो से जोड़े रखने का काम किया, वैल्यू सिस्टम दिया । जबकि हमारी एजुकेशन में हमने एक परस्पर प्रतिद्वन्दता का माहौल खड़ा कर दिया है । आज इतनी असुरक्षा हो गई है कि आज बच्चों को माता–पिता कहते हैं कि तुम्हें कम्पीट करना है हर हाल में ये चीज लेनी है । उनको समाज में आना–जाना, समाज –सेवा करना आदि ये सब सिखाया ही नहीं जाता है । परोपकार, सहयोग, सद्भावना जैसे शब्द उनकी डिक्शनरी से लुप्त होते जा रहे हैं । ये जो फीलिंग है वो गलत है अगर इससे ऊपर नहीं उठेंगे तो हम एक अच्छा समाज नहीं बना सकते और एक अच्छा देश भी नहीं बना सकते हैं ।

० आपके मुताबिक, विश्वविद्यालय की क्या परिभाषा है ?
– विश्वविधालयों का काम है दृष्टिकोण । विश्वविधालय कोई रट्टू तोता नहीं बनाते और अगर वे वैसे करेंगे तो विद्यार्थी कुँए के मेंढक बन जाएँगे । विश्वविद्यालय तो नदी होते हैं इसका पानी जो है वह तो बहता रहता है । हमें बच्चों की जो मूल भावनाएं हैं विकसित करने की जरुरत है वे तो गीली मिट्टी के समान होते हैं उन्हें आकार देने की जरुरत होती है वो रास्ता खुद बना लेते हैं “दे शुड फ्लाई ऑन देयर ऑन विंग्स” उनको, उनके पंखों से उड़ने दो ।
“इन नन्हे–मुन्ने हाथों को चाँद सितारे छूने दो –चार किताबें पढ़कर ये भी हम जैसे हो जाएँगे ।”
हमारी जनरेशन की अपेक्षा आज की जनरेशन हमसे बहुत आगे है ्र हमारी जनरेशन को हार्ड–वर्किंग कहा जाता था ये जनरेशन स्मार्ट वर्किंग है । हर चीज को स्मार्टली करती है इनके फंडाज क्लीयर हैं ये इमोशनल भी नहीं है ये बहुत प्रैक्टिकल है ये इफ और बट्स नहीं देखती ये बहुत व्यावहारिक है लेकिन हमें इन्हें अति व्यावहारिक भी नहीं बनाना है । हमने आई.क्यू. पर बहुत काम किया लेकिन ई.क्यू. और एस.क्यू. पर तो हमने काम ही नहीं किया । जब तक हम इमोशनल (संवेदनशील) और स्पिरिचुअल (आध्यात्मिक) नहीं बनाएँगे । हमें केवल इंटेलीजेंट ही नहीं बनाना हमें आई.क्यू. के साथ ई.क्यू. और एस.क्यू. भी विकसित करना होगा । हमें यदि अच्छे समाज का निर्माण करना है तो यह बहुत आवशयक है ।

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० आपको अपनी यूनिवर्सिटी को सुचारू रूप से चलाने में कें एवं राज्य सरकार का कितना सहयोग मिलता है ?
– डोगरा साहब, देखिए यूनिवर्सिटी इज एन ऑटोनोमस प्लेस, ये स्वायत विभाग होते हैं इसमें धन के लिए सरकार के पास जाना पड़ता है सैलरी ग्रांट और ग्रांट के लिए । लेकिन वो किसी सरकार या शासन के कंट्रोल में नहीं होते हैं । अगर वो किसी भी कंट्रोल में रहेंगी तो आप एक स्वतंत्र भारत का नक्शा नहीं पास करा सकते हैं, वहां से एक उन्नत भारत का रास्ता नहीं निकलता । मैं भाग्यशाली हूँ मुझे दोनों ही तरफ से सहयोग मिलता है । नालंदा–तक्षशिला जैसी यूनिवर्सिटी हुई जहाँ से आचार्य चाणक्य जैसे विद्वान् पैदा हुए फाह्यान जैसे दार्शनिक पढने आते थे क्योंकि उनके कार्यों में न्यूनतम हस्तक्षेप था तभी वो ऐसी यूनिवर्सिटी बना पाए । हमें भी ऐसे स्टूडेंट्स का निर्माण करना है जो पूरी तरह से परिपक्व, उदार एवं स्वायत हों । समाज सेवा भावना से युक्त–सवेंदनशील मानव हों । जब तक आप शिक्षा को संवेदनशीलता से नहीं जोड़ते तब तक आप प्रोडक्ट्स दे रहे हैं आप सिर्फ रोबोट दे रहे हैं आप एक अच्छा इंसान नहीं दे रहे हैं । मूल्यों पर आधारित शिक्षा होगी, तभी आप अच्छे इंसान दे पाएँगे ।

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