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कतार नरेश अमिर शेख की नेपाल भ्रमण और नेपाली पानी और जवानी की नयी बिक्रीनामा पर हस्ताक्षर : कैलाश महतो

कैलाश महतो, पराशी । अप्रिल २३, २०२४ – अचानक एक खबर मिली कि कतार का राजा अमिर शेख तमिम बिन हमाद अल थानी के दो दिवसीय नेपाल भ्रमण के कारण नेपाल‌ में सार्वजनिक विदा दी गई है । किसी राष्ट्र प्रमुख के राजकीय भ्रमण पर एक राष्ट्र को सार्वजनिक विदा देना अन्तर्राष्ट्रीय मर्यादा है । यह होना चाहिए । यह अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर होता भी रहा है । यह सम्मान का परम्परा है । मगर सवाल केवल सम्मान और मर्यादा तक सीमित नहीं है, बल्कि कहीं न कहीं नेपाल की प्रतिष्ठा बिक्री की खेल में न हम अपना मर्यादा बचा पाते हैं, न दूसरा कोई वह सम्मान महशुश कर सकता है जो वह बिना लाइ लपट से पाता हो ।

सम्मान अपने समान स्तर के व्यक्ति या राष्ट्र से मिलता है, न कि किसी गुलाम‌ या फकीर व्यक्ति या राष्ट्र से । गुलाम‌ और फकीर व्यक्ति या राष्ट्र अगर किसी अमीर व्यक्ति या राष्ट्र को सम्मान भी करे, तो सीधे से अर्थ में वह उसका चम्चागिरी या दलाली करता हुआ समझा जाता है । वही हाल कतार के राजा अमिर शेख जी के साथ नेपाल का है । राजा और गंगू तेली के बीच में सम्मान का क्या रिश्ता होगा ? जब भी राजा भोज गंगू तेली के घर पर जायें, वह गंगू तेली राजा भोज को सम्मान कर ही नहीं सकता ।‌ सम्मान करने की न तो उसकी हैसियत होगी, न चाहत भरा ह्रृदय । हां, देखा यह जरुर जाता है कि जब एक गरीब किसी धनाढ्य का सम्मान और इज्जत करता है, तो वह केवल अपने से सम्पन्नों को  खुश करने का चेष्टा ही होता है । यह बहुत कम होता है कि एक गरीब के सेवा को कोई धनाढ्य अपना प्रेमी या मित्र मान लें, जैसा कि कृष्ण और सुदामा का सुना और पढा जाता है । अपवाद में अगर कृष्ण और सुदामा वैसे दिख भी जायें, तो वह केवल व्यक्तिगत मित्रता में सम्भव हो सकता है, राष्ट्रों के मित्रता ऐसा कतई नहीं होता । इसिलिए तो यह कहावत प्रसिद्ध है, “कहां राजा भोज और कहां गंगू तेली !”

क्षेत्रफल के हिसाब में नेपाल से तकरीबन १३५,७४४ वर्ग२ किलो मीटर छोटा ११,४३७ वर्ग२ किलो मीटर बाला छोटा सा देश कतार अपने आजादी के समयतक छोटा सा मछली पकडने बाला एक किल्ला के रुप में जाना जाता था ।‌ बालुवों के रेत और विरान बंजर उस देश में मानव बस्ती की किल्लत होती थी । मगर मछुवाडों के विरान उस देश ने जब कारामात दिखाई, तो दुनिया उसके कायल‌ हो गई ।

सन् १९७१ सेप्टेम्बर ३ का दिन कतार के लिए एक अनोखा दिन रहा जब उसे स्वतंत्रता प्राप्त हुआ था । उसका राष्ट्रपिता बनने को राजी शेख यासिम बिन मोहम्मद अल थानी ने कतार का निर्माण सन् १८७८ डिसेम्बर १८ को कर दी थी । कतार के जीवन में एक और बडा सौभाग्य यह भी रहा जब वह सन् १९१३ में अट्टोमन साम्राज्य से आजाद हुआ था । गुलामी पर गुलामी और गरीबी को अन्दर से झेल रहे कतार ने अपने अटूट कर्म और फौलादी नेतृत्व के कारण आज दुनिया को न केवल रोजी रोटी उपलब्ध कराने में सक्षम हुआ है, बल्कि दुनिया के अर्थ राजनीति में भी अपने पैदान को सशक्त कर अमेरिका जैसे सर्व शक्तिशाली देश के लिए भी राजनीतिक पहल करने की दम‌ निर्माण कर ली है ।

कतार अरब प्रायद्वीप के उत्तर पूर्वी तट पर स्थित एक छोटा सा प्रायद्वीप है । इसके दक्षिण में सउदी अरब है, तीन तरफ से फारस की खाड़ी है । तेल समृद्ध राष्ट्र के रूप में कतार दुनिया का दूसरा (प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद) समृद्ध देश है ।

सन् १७८३ में कुवेत के अल खलीफ वंश ने यहां शासन करना प्रारम्भ किया था । तत्पश्चात् यह तुर्की के अधीन में चला गया । अरब प्रायद्वीप के मूल निवासी कतार के प्रवासी रहे थे जो अरब जनजातियों से निकले हैं । वे लोग १८वीं शदी में मुख्य रूप से “नेजाद और अल-हासा” के पड़ोसी क्षेत्रों से कतार आने की इतिहास है । कुछ लोग ओमानी जनजातियों से भी कतार प्रवेश करने का प्रमाण मिलते हैं ।

सन् २०१७ की शुरुआत में कतार में करीब २.६ (२६ लाख) मिलियन निवासी की रेकर्ड की गयी थी, जिनमें से अधिकांश (लगभग ९२%) राजधानी दोहा में रहते हैं । विदेशी श्रमिकों की आबादी ८८% है । उसमें भारतीयों की सबसे बड़ी संख्या ६९१,००० है । २०१७ के एक अनधिकृत रिपोर्ट के अनुसार ३५०,००० नेपाली, २८०,००० बंग्लादेशी, २६०,००० फिलिपिनी,  २००,००० मिस्रवासी, १४५,००० श्रीलंकाली और  १२५,००० पाकिस्तानी लगायत अन्य राष्ट्रीयताओं के लोग वहां काम के‌ सिलसिले‌ में‌ रहते हैं । ६ से १६ साल के सभी नागरिकों के लिए शिक्षा अनिवार्य और नि:शुल्क है । कतार की शिक्षा स्तर उच्च और समृद्ध है । साक्षरता दर लगभग ९७% से उपर है ।

अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक रिपोर्टों को मानें तो सन् २०१७ के अनुसार कतार का कुल ग्राहस्थ उत्पादन २३६.२६ बिलियन अमेरिकी डलर है, वहीं सन् २०१० के आर्थिक सर्वेक्षण के मुताविक कतारियन प्रति व्यक्ति आय अमेरिकी $८८,५५८ है ।

तेल की खोज से पहले कतार की अर्थव्यवस्था मछली पकड़ने और मोती के शिकार पर केंद्रित था । सन् १८९२ के ओटोमन साम्राज्य द्वारा तैयार एक रिपोर्ट में कहा गया था कि उस वर्ष (१८९२) मोती के शिकार से कुल आय २,४५०,००० क्रोन थी । सन् १९४० में हुए तेल के खोज ने कतार के दु:ख को झटके में मिटा दिया । इस खोज ने राज्य की अर्थ व्यवस्था को ही क्रान्तिकारी बना दिया । देश में नागरिकों के लिए कानुनी जीवन स्तर उच्च हो गया । इनकम टैक्स नहीं होने से कतार (बहरीन के साथ) दुनिया के सबसे कम ट्याक्स रेट बाले देशों में से एक है । जून २०१३ में कतार की बेरोजगारी दर ०.१% कर दी गयी । कॉर्पोरेट कानून अनुसार कतारी नागरिकों को एमीरेट्स के किसी भी उद्यम में ५१% की हिस्सेदारी कायम की गयी है ।

वही कतार, जो‌ आजसे तकरीबन ७५-८० साल पहले बालुओं रेत से परेशान और दाने दाने को तरसता था, वह आज कभी किसी का गुलाम न होने का धौंस दिखाने बाले नेपाल को भी अपना मानसिक और आर्थिक गुलाम बनाकर स्वाभिमानी नेपालियों के गर्दनों में गुलामी की जंजीर लगा दी है । नेपाल की सारी बहादुरी और वीरता को धूप से जलते अपने कतारी जलते रेतों के‌ पांव तले दबाकर रख लिया है ।

खुदा करे कि यह बात गलत हो कि कतारी राजा नेपाल से अपने सुरक्षा के लिए बेलायत और भारत के तरह ही गोर्खाली सेना का सौदा करने आये थे । जापान और अमेरिका से शिक्षित और प्रशिक्षित हुए नेपाली एक विद्वान् से मेरे साथ आज काठमाण्डौ में हुए बातों के अनुसार  गोर्खाली सेना सौदा बाली बात अगर गलत भी हो जाये, तो यह तो पक्का है कि नेपाली युवाओं को कतार के‌ लिए नेपाल से कैसे किस उपाय से खरीदने के‌ क्रम में इझाफा किया जाय, उसके लिए नेपाली राज नेताओं‌ को क्या और कितना अपना जूठा खिलाना पड सकता है बाला सौदागिरी शान‌ दिखाकर कतारी राजा द्वारा किये जाने की जन-शंका है

गुलामी की पराकाष्ठा देखने के बाद किसी भी नेपाली‌ का शर्म से नजरें झूकेगा । एक राजा का स्वागत करने देश का राष्ट्रपति का जाना काफी था । मगर गुलामी की लत लगे दलाल राज नेताओं के लिष्ट में पडने बाले देश के प्रधान्त्री और उनके उप-प्रधानमन्त्री तक भी स्वागत के लिए हाजिरी लगाते दिखे । कहना असमंसज की बात है कि प्रधानमन्त्री प्रचण्ड कतारी राजा को स्वागत सम्मान करने पहुंचे थे, या चम्चागिरी, या फिर यह उनकी चिन्ता तो नहीं रही थी कि कतार से राजा द्वारा लाए गये कुछ भिक्षा दीक्षा केवल राष्ट्रपति महोदय को ही न‌ मिल जाये, अगर वे स्वागत और सम्मान में हाजिर न हुए तो ?

युवा को बेचने बाले मानव तस्कर राज्य और उसके सरकारी प्यादे राष्ट्रपति और मानवद्रोही सरकार प्रमुख को‌ इतना भी शर्म‌ न होना कि उस नेता ने बालुवों के रेत पर स्वर्ग को उतार खडा कर दिया और उसके राष्ट्र युवा शक्ति को अपने तपते धुप के चंगुल‌ में‌ कैद कर लिया है और हरे भे देश को बंजर और कंगाल‌ बनाकर उस बालु के रेत बाले राजा से अपना जवानी बेच रहा है, तो कहीं‌ देश का पानी बेच रहा है । दिन रात‌ भारत को अपना दुश्मन मानकर उसे गाली देने बाले अव्वल राष्ट्रवादियों के नेपाली सदन‌ में उसी भारत का एक प्रधामन्त्री यह भाषण देकर जाता है कि नेपाल की पानी और जवानी नेपाल के काम‌ के नहीं, बल्कि किसी और के लिए है ।‌ फिरभी नेपाली इन‌ राजनेताओं के सर से राष्ट्रवाद नहीं हटता, जिसका इज्जत दिल्ली, मुम्बई, कलकत्ता, मलेशिया, दुबई, कतार, इजरायल, इराक, इरान और अरब के‌ देशों में‌ खुलेआम‌ निलाम‌ हो रही है ।

देखते देखते इन‌ काहिलों‌ ने नेपाली दो हाथियों को भी उस तपती कतारी धूप के लिए शिकार बना डाली । हाथियों को भी इन काहिलों ने इस तरह से अनुशासित और जाहिल गुलाम‌ बना डाला था कि बेचारे वे दो हाथी चुपचाप नेपाल‌ से विदा लेने में ही अपनी भलाई समझीं । उन‌ हाथियों ने भी शायद यही सोचकर कतार के लिए रवाना हुआ होगा कि नेपाल‌ में अपने सत्तायी पापों से जनता का ध्यान भटकाने के लिए “हिन्दु-मुस्लिम” लफडा और दंङ्गा करवाने बाले इन शातिर अपराधी नेता से बचना ही अपना धर्म‌ बचाना है ।

कल्हतक‌ नेपाली मानव श्रम‌ पर‌ राज करने बाले अरब‌ राष्ट्रों ने अब नेपाली प्रकृति और प्राकृतिक जीव जन्तुओं पर भी मालिकाना हक‌ जताने‌ का रिहर्सल शुरु कर दी है । देशद्रोही और इज्जत बेच कागजों पर हस्ताक्षर पर हस्ताक्षर करने बाले इन नेपाली दुष्ट और कायर राजनेताओं के सामने नेपाली‌ नागरिक न जाने कबतक‌ नैराश्यताभरी जिन्दगी जीता रहेगा ?



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