स्थान परिचयर्/पर्यटन
र्स्वर्गद्वारी
हिमालिनी संवाददाता:उत्तर पर्ूव हिमालय की तलहटी में बसा एक छोटा और सुन्दर सा देश है नेपाल । कला, धर्म और प्राकृतिक सम्पदाओं का धनी एक प्राचीन राष्ट्र । एक तरफ चीन की सीमाओं और दूसरी तरफ भारत जैसे विशाल साम्राज्य से सटा हुआ नेपाल भले ही भू भाग में इन दोनों देशों के समकक्ष न हो किन्तु प्राचीन सांस्कृतिक विरासत
में यह किसी भी अन्य देशों से कम नहीं है । इसी सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत से जुडÞा नाम है- र्स्वर्गद्वारी ।
गगनचुम्बी हिमशिखर की गोद में अवस्थित, प्राकृतिक सौर्ंदर्य के आँचल में जडिÞत पवित्र मणि है र्स्वर्गद्वारी । यह अपने सौर्ंदर्य में अद्वितीय है । र्स्वर्गद्वारी प्यूठान जिला के सदरमुकाम खलंगा से करीब २६ किलोमीटर पश्चिम में अवस्थित है । यह नेपाल के प्राचीन सम्पदाओं में से एक है । यहाँ परापर्ूव काल में ऋषि मुनि तपस्या किया करते थे । साधना की भूमि है र्स्वर्गद्वारी । यहाँ से जुडÞी कई मान्यताएँ हैं । माना जाता है कि यहाँ का ऐतिहासिक अग्निखंड गुफा, महादेव र्स्वर्ग जाने का रास्ता, यहाँ पाली गईं गायों और महाप्रभु के दर्शन से अत्यन्त पुण्य की प्राप्ति होती है । वैशाख पूणिर्मा, ‘उंभौली’ पर्व और बुद्ध जयन्ती के अवसर पर यहाँ मेला लगता है । समुद्री सतह से दो हजार एक सौ इक्कीस मीटर ऊँचाई पर है- र्स्वर्गद्वारी । पर्यटकीय दृष्टिकोण से यह नेपाल का एक मुख्य स्थल है । यहाँ की प्राकृतिक सुन्दरता, ऐतिहासिक मनोरम तालाब, आश्रम की यज्ञशाला, महाप्रभु ने जहाँ तपस्या की थी वह गुफा, वि. सं.१९५२ से संचालित वेद पाठशाला, गोवर्द्धन पहाडÞ यहाँ के मुख्य आकर्षा हंै, जो पर्यटकों का मन लुभाते हैं । वि. सं. १९५२ में वेद मंत्र द्वारा प्रगट किए गए अग्नि से संचालित यज्ञकुण्ड यहाँ का विशेष आकर्षा है । वि. सं. १९५० के उत्खनन में प्राप्त पूजा सामग्री मिलने के बाद आश्रम का निर्माण किया गया । माना जाता है कि उक्त पूजा सामग्री महाभारत काल में पाण्डवों द्वारा किए गए यज्ञ की हैं । यह १०९ वर्षसे निरन्तर महायज्ञ होम संचालन होनेवाला एकमात्र धार्मिक स्थल है । १९१६ श्रावण शुक्ल पुत्रदा एकादशी को श्री १०८ महाप्रभु का यहाँ अवतरण हुआ था । मिथक है कि भगवान शंकर से उन्हें शिक्षा मिली थी । यहीं प्रभु ने मानव कल्याणार्थ १९५२ में अखण्ड यज्ञ कराया था तभी से यह यज्ञकुण्ड प्रज्ज्वलित है । यहाँ का मंदिर बिल्कुल साधारण है किन्तु इसकी मान्यता बहुत है । नेपाल सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए कि इसे पर्यटकीय दृष्टिकोण से कैसे सजाया और सँवारा जाय । रहने के लिए धर्मशाला की व्यवस्था है । किन्तु पानी की किल्लत है ।
र्स्वर्गद्वारी पहुँचने के लिए बुटवल से १७० किलोमीटर पश्चिम और लमही से १७ किलोमीटर पर्ूव जाया जाता है । रोल्पा, चकचके होते प्यूठान जाया जाता है । जहाँ से भालुवांग बाजार से ७५ किलोमीटर पहाडÞी रास्ता राप्ती नदी के किनारे किनारे तय करना पडÞता है । भृंगी से आधा किलोमीटर का रास्ता कच्चा है जो चढर्Þाई का है इसे पैदल तय करना पडÞता है । घोडÞे की सवारी की व्यवस्था है, जो महंगी है । यहाँ का मौसम ठण्डा होता है इसलिए जाने से पहले इसकी तैयारी कर लेनी चाहिए । तथा आवश्यक सामान से ज्यादा सामान नहीं ले जाना चाहिए क्योंकि उस स्थिति में पैदल रास्ता तय करना कठिन हो जाता है । आवागमन के लिए बस या फिर अपनी सवारी की ही सुविधा है । सवारी साधन ज्यादा नहीं हैं किन्तु असुविधा भी नहीं होती । एक सुविधा सम्पन्न पर्यटन स्थान बनाने हेतु पर्यटन विभाग को इस ओर अवश्य ध्यान देना चाहिए ।

