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उत्तिष्ठत जाग्रत नेपाल ! : अजय कुमार झा

 

अजय कुमार झा, हिमालिनी, अंक अप्रैल 2024 । “उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत ।” अर्थात् उठो, जागो, और ध्येय की प्राप्ति तक रूको मत । उक्त महावाक्य वैश्विक गुरु, स्वामी विवेकानंद का है । उन्होंने यह उद्घोष इसीलिए किया था, क्योंकि वे देश में कभी न थकनेवाले ज्ञानी योद्धाओं के समूहों को देखना चाहते थे । ऐसे योद्धा जिनके पास ज्ञानरूपी अस्त्र हों और जो कभी बरगलाए न जा सकें ।

जब हम किसी देश को एक सांस्कृतिक, भौगोलिक और राजनीतिक इकाई के रूप में प्रदर्शित करते हैं तब हमें यह समझ में आता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा कितनी महत्वपूर्ण है और इसमें ज्ञान का कितना महत्व है । यह समझना थोड़ा कठिन है, किंतु यदि पश्चिमी संस्थानों पर विचार करें तो पाएँगे कि उन्होंने सदैव ही ज्ञान को एक अस्त्र के रूप में प्रयोग किया है । प्राचीनकाल के युद्धों का अध्ययन करें तो पाएँगे कि पहले शक्तिशाली समूह, जिनके कबीले बड़े होते थे, उनका प्रभुत्व रहा । लेकिन, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका पूरी तरह से सूचना आधारित युद्ध के बल पर विश्व शक्ति बना ।

किसी भी देश के उत्थान और विकास के प्रक्रिया को गतिमान करने में संस्कृति की बड़ी भूमिका होती है । सांस्कृतिक विरासत वैश्विक पर्यटक को आकर्षित करने तथा विद्वानों के शोध कार्य का विशाल आधार आज संस्कृति कोही माना जा रहा है । यही कारण था कि आक्रांताओं ने हमेशा स्थानीय संस्कृति को धराशायी कर अपनी संस्कृति थोपने की कोशिश की । इसे ही ‘सांस्कृतिक आतंकवाद’ कहते हैं, जिसके संचालक बौद्धिक आतंकवादी लोग होते हैं । इसका उपयोग किसी राष्ट्र की तबाही के लिए एक शस्त्र के रूप में किया जाता है । संस्कृति एक बहुत ही जटिल शब्द है । हम इसे किसी विशिष्ट समाज के रीति–रिवाजों, साझा मान्यताओं, मूल्यों, मानदंडों, नियम–कानून, विचारों और सामाजिक व्यवहार के रूप में समझ सकतें हैं । साथ ही, किसी विशिष्ट समाज की विभिन्न कला रूपों के जरिए हो रही रचनात्मक अभिव्यक्तियों से भी उसकी संस्कृति की पहचान बनती है । मूर्त रूप से दिखाई दे रहे स्वरूपों के अलावा किसी भी संस्कृति में कई अमूर्त आयाम भी मौजूद रहते हैं ।

 

गाय के मांसखाने वाले, महंगे चमड़े के पर्स व कपडे पहनने वाले, पशु प्रेम का सन्देश दे रहे है । अपनी फैक्टरी के लिए सभी नियमों को ताक में रखने वाले पर्यावरण पर सेमीनार आयोजित कर रहे है । अपने परिवार और घर में एशो आराम की जिंदगी जीने वाले नेता घर से निकलते वक्त टूटी चप्पलें, छेद वाला स्वेटर और मफलर पहनकर निकलते हैं । दो नंबर की जिंदगी जीने वाले पत्रकार अपने उच्च आदर्श के मापदंड चैनलों पर दिखाकर अपनी महानता का परचम लहरा रहे होते है । ध्यान देंगे ! इनके बड़े–बड़े बौद्धिक सेमिनारो में सामाजिक समस्यों के, किसी भी प्रकार का हल नहीं निकलता, उल्टे एक भ्रम की स्थिति का निर्माण जरूर हो जाता किसी समय युगद्रष्टा स्वामी विवेकानंद जी ने कहा था मुझे १०० कर्मठ युवक युवतियां मिल जाये तो मै भारत की काया पलट कर दूंगा । आज अगर स्वामी विवेकानंद होते तो उनके इस वक्तव्य को हिंसात्मक गतिविधि करार कर दिया जाता ।
विश्व का एकमात्र स्वतंत्र देश कहा जानेवाला नेपाल वास्तव में स्वतंत्र था या नहीं, अब कहना कठिन होने लगा है । क्योंकि विगत पैतालीस वर्षों से आज तक की राजनीतिक परिस्थिति को मूल्यांकन तथा विश्लेषण करने के वाद यही निष्कर्ष निकलता है कि इस समाज का एक बड़ा वर्ग कभी इस देश को पूर्ण स्वतंत्रता की स्थिति में पहुंचने नहीं देगा । व्यक्ति व्यक्ति, पार्टी पार्टी बिकने को तैयार है । अतः इस देश को तीन मुख्य समस्यायों से निजात मिल जाये तो हम स्वावलंबी और पूर्ण स्वाधीन बन सकतें हैं । वह तीन मुख्य समस्याए हैः १. आंतरिक उपनिवेशवादी विभेदपूर्ण राजनीतिक प्रणाली २. आधुनिकतम कृषि व्यवस्थापन गरीबी और ३. देश बेचूआ बौद्धिक आतंकवाद ।

 

आज वैश्विक स्तर पर सरकारें अपनी क्षुद्र निजी स्वार्थ बस भौतिक और बौद्धिक आतंकवादियों को वोट बैंक पर नजर रखते हुए पालन और पोषण कर रही है । इस भस्मासुरी दुष्कर्म मे कौन सहभागी नहीं है यह कहना कठिन हो गया है । कोई सीधे तौर पर बम और बंदूक उठाए हुए है, तो कोई उसे उठाने के लिए अभिप्रेरित और बाध्य कर अपनी क्षुद्र कूटनीति का परिचय दे रहा है । कुछ तथाकथित कागजी विद्वान लोग, दूरदर्शन, यूट्यूब, लगायत के सामाजिक संजाल और पत्र पत्रिका के माध्यम से धार्मिक, सांस्कृतिक, भाषिक और क्षेत्रीयता के नाम पर देश को तोड़ने, सामाजिक संघर्ष बढ़ाने, व्यावहारिक मधुरता को शत्रुता मे बदलने तथा सामाजिक विचारधारा को खंड–खंड मे बाटकर सत्ता का सुख प्राप्त करने में तल्लीन हैं । और ऐसे राक्षस को हम बौद्धिक समाज कहते हैं । बौद्धिक जमात आज मानवता लगायत सभी प्राणियों और प्रकृति के लिए भी खतरनाक प्रमाणित हो गया है । विनाशकारी हथियारों की होड़बाजी ने तीसरे परंतु मानव सभ्यता का अंतिम महासंग्राम का स्पष्ट संकेत देने लगा है ।
आज विश्व तीसरे विश्वयुद्ध के विभीषिका को बड़ी ही आतुरता के साथ स्वागत करने के लिए खड़ा है । कब किसी ताकतवर शासक अधिकारी का दिमाग फिर जाय और परमाणु बम का प्रयोग कर विश्व को विनाश की आग में झोंक दे । धर्म आधारित आतंकवाद से अधिक खतरनाक बौद्धिक आतंकवाद हो गया है । यह देश, प्रकृति तथा मानवता सभी के खिलाफ होता है ।दक्षिण एसिया में बहुत बड़े साजिस के तहत इसे पोषित तथा पल्लवित किया जा रहा है । आतंकवाद का न कोई सीमित भूगोल है, न एक परिभाषा, इसलिएबड़ी ही सूक्ष्मता और विराट भाव से समझना होगा कि आतंकवादी कौन है ?
हम बौद्धिकता को किसी सीमा में नहीं बांध सकते । अब इतने प्रमाण तो आने लगे हैं कि दुनियाभर में आतंकवाद को कौन प्रायोजित कर रहा है ? आज बौद्धिकता दुनिया में आतंकवाद को पालने–पोसने में शामिल राष्ट्र प्रमुखों, संभ्रांत नेताओं और कॉरपोरेट के संयुक्त वैश्विक संगठन का रूप धारण करता जा रहा है । जिस बौद्धिकता को हम मानवतावाद बताना चाहते हैं, दरअसल वह कुछ और नहीं, केवल कुछ लोगों का निजी स्वार्थ तथा विश्व में अपना प्रभुत्व जमाने की हिटलरी मानसिकता मात्र है । इसलिए आज पूरी दुनिया को एकजुट होने तथा सख्त नियम–कानून सतर्कता के साथ लागू करने की जरूरत है । युवाओं पर सबसे ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है । उन्हें रचनात्मक और सामाजिक कार्यों में व्यस्त रखकर ही उनकी बौद्धिकता को सही दिशा दी जा सकती है । तभी ये संसार आतंक से मुक्त हो पाएगा और हर कहीं शांति और सुख का राज कायम हो सकेगा ।लेकिन यह तो हम आम जन चाहतें हैं । और वह भी उससे जो यह नहीं चाहता; जो पूरी मानवता को स्वाहा करने के लिए दिनरात पागलों की भाँति त्राहि–त्राहि करता रहता है । वही नेता, वही उद्योगपति, वही कर्मचारी, वही ठेकेदार और वही उद्दंड नालायक वर्ग जिसकी झूठे वादे, शोषण युक्त नौकरी के लोभ, दारू मांस के क्षणिक सुख और चंद पैसों के लालच मे अपनी आत्मारूपी मत, विचार को बेचकर उन्हें अपना मालिक मानकर सुन्दर और सुरक्षित भविष्य की आशा के साथ सत्तापर पहुँचा देते हैं । प्यारों! सावधान! युगों तक समाधान के लिए संघर्ष करना होगा ।
जब अंग्रेजों ने शासन शुरू किया, तो उन्होंने महसूस किया कि भारत की शिक्षा प्रणाली की जड़ें संस्कृति में गहरे पैठी हैं जो प्राचीन हिन्दू इतिहास की विरासत है । नालंदा जैसे गौरवशाली संस्थानों के विनाश के बावजूद, ज्ञान परंपरा का प्रसार छोटे शिक्षण संस्थानों के माध्यम से जारी रहा । उन्होंनेसोचा कि जब तक शिक्षा प्रणाली को ध्वस्त नहीं किया जाएगा, तब तक पूर्ण रूपसे न सनतानियों को गुलाम बनाया जा सकता है और नाही सनातन धर्म तथा संस्कृति को मिटाया जा सकता है । यह था बौद्धिक आतंकवाद का भारत मे प्रारंभ काल । जो आज समग्र विश्व को ग्रसते जा रहा है । बुद्धि से दरिद्र बनाना, नष्ट कर देना, गुलाम बना लेना, अपनों के ऊपर अत्याचार कर गौरव अनुभव करना । जातीय भेदभाव, उंच नीच, छुआछूत जैसी सामाजिक विकृतियों को सत्ता की आड़ मे सभ्य, सहज, सरल स्वाभाव के देवता समान लोगों पर षडयन्त्र रूपी बौद्धिक जहर का प्रयोग कर पूरी मनुष्यता के साथ भयानक धोखेबाजी किया गया है ।
यही बौद्धिक आतंकवादी संस्कार से संस्कारित पापी लोग यहाँ की शिक्षा व्यवस्था को धराशायी करने के लिए दोतरफा रणनीति अपनाए । पहली, कुटिल नीतियों के जरिए यहां के संस्थानों को ध्वस्त करना और दूसरा, अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली का महिमामंडन । भारतीय समाज में गोरों के प्रति आकर्षण की प्रवृत्ति का लाभ उठाते हुए, फिरंगियों ने समाज के प्रभावशाली वर्ग को लुभाया और उन्हें पश्चिमी शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित किया, साथ ही, उन्हें स्थानीय लोगों के लिए रोल मॉडल के रूप में पेश किया गया । इन नए, तथाकथित साक्षरों अर्थात बौद्धिक आतंकियों के समूह ने उपनिवेशवादियों के हाथों का खिलौना बनकर मौजूदा गुरुकुलीय शिक्षा प्रणाली को पिछड़ा और निम्न स्तर का बताने में कोई कसर नहीं छोड़ी । पश्चिमी शिक्षा में शिक्षित ऐसे स्थानीय लोगों को चुनी हुई आजादी और सुविधाएं दी गई और उन्हें अंग्रेजों की टोली में प्रतिष्ठित स्थान भी प्रदान किए गए । इन सबने हिन्दू वैदिक गुरुकुलीय शिक्षा प्रणाली की तबाही मे शामिल हो खुद को गौरवाशाली समझा था । जिसका अवशेष आज भी वंशवादी विचारधारा पोशाक तथाकथित अंग्रेज के नाजायज संतानों मे देखा जा सकता है । तो एक सवाल यहाँ खड़ा होता है; कि जब सनातनी के विचार, व्यवहार, संस्कार, गुण, दक्षता, शिक्षा, प्रविधि, शक्ति, सामर्थ्य, धन, संपती और ऐश्वर्य को हजार वर्षों तक लूटने और तहस नहस करने के बावजूद भी हमारी भौतिक समृद्धि ज्यों की त्यों बनी रही और उसे पूर्णतः नष्ट करने के लिए हमारी शिक्षा प्रणाली को नष्ट करना पड़ा । तो इससे यह सिद्ध हो जाता है कि हमारी समृद्धि और ऐश्वर्य श्रोत गुरुकुलीय शिक्षा प्रणाली से प्रवाहित होता था । अतः मानव, प्राणी और प्रकृति सभी के संवर्धन और संरक्षण तथा विद्यमान सम्पूर्ण प्राणघाती समस्ताओं के समाधान हेतु गुरुकुलीय वैदिक शिक्षण प्रणाली के द्वारा ही संभव है ।
ध्यान रहे! बौद्धिक आतंकवाद शरीर को नुकसान नहीं पहुंचाता, बल्कि मस्तिष्क में गहरा असर करता है । यह भ्रामक जानकारी देकर लोगों को गुमराह कर न केवल बैंकों या किसी डेटा को बल्कि लोगों को भी हैक करने के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग करता है । समाज में अविश्वास का माहौल पैदा करता है । आज लोग हास्पिटल जाने से प्रकंपित होने लगें हैं । डाक्टर को देखते ही सुटबूट वाले यमराज का दर्शन होने लगता है । यहाँ मरीजों के केवल पैसे ही नहीं लूट जाते, बल्कि कानूनी तरीके से प्राण, आँख, लीभर, किडनी लगायत शरीर के अंग प्रत्यंग भी लूट लिए जाते हैं । मित्रों, इनकी डिग्रियाँ और इनकी सोच मे कोई तालमेल नहीं होता । इनके सामने बड़े–बड़े अपराधी और क्रूर कठोर व्यक्ति भी बौने पड़ रहें हैं । अब आप ही कहो; इन्हें पढे लिखे विद्वान आतंकवादी न कहकर किस नाम से सम्बोधन किया जाए ?
हमें गंभीरता से सोचना होगा, एकएक घटना का विश्लेषणात्मक दृष्टि से समझने का प्रयास करना होगा । हमें यह भी ध्यान मे रखना चाहिए कि एक बिंदु पर जाकर बौद्धिक आतंकवाद भौतिक आतंकवाद कामिलन हो जाता है । क्योंकि दोनों विचारधारा के लोगों का मौलिक उद्देश्य आम लोगों को लूटना होता है । प्रत्येक मनुष्य में किसी न किसी रूप में मूढ़ता होती है और वह परिस्थिति के अनुसार प्रकट होती है । जब मूढ़ता संगठित हो जाती है और स्वार्थ के साथ विस्तारित हो जाती है तो वह आतंकवाद का रूप ले लेती है । आतंकवाद उन लोगों द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला एक रणनीतिक उपकरण बन गया है, जिनके पास वास्तविक शक्ति नहीं है । उनमें शक्ति या मूल शक्ति को खÞत्म करने की शक्ति नहीं है । इसलिए वे डर पैदा कर बड़ी पार्टियों में फूट डालने की कोशिश करते हैं । उदाहरण के लिए, जब किसी मिठाई की दुकान से मक्खी को भगाया जाता है तो गुस्से में मक्खी सोचती है कि वह इस दुकानदार के दुकान को ही नष्ट कर देगी, लेकिन वह ऐसा नहीं कर पाती । अतः वह पास बैठे सांढ के कान में घुसकर चिल्लाने लगती है, जिससे उत्तेजित होकर वह साँड दीवारों, दुकानों और सामानों को तहस–नहस कर देता है । बस इसी तरह ये बौद्धिक आतंकवादी दूसरों को उत्तेजित करके अपना स्वार्थ पूरा करते रहते है । बौद्धिक आतंकवादी दूसरों में आक्रोस और हिंसात्मक भाव को बढ़ाने और राज्य या मुख्यधारा को कमजोर करने के लिए खुफिया जानकारी का उपयोग करते हैं । इसके अलावा, अगर यह किसी बड़े संगठन में प्रवेश कर गया, तो परिणाम भयानक होना स्वाभाविक ही है । और ऐसे लोगों को संरक्षण देने के लिए दुनिया भर के संघटन और सरकारें हमेशा उपलब्ध रहते हैं ।
बौद्धिक आतंकवादियों का मुख्य लक्ष्य राजनीतिक एवं सामाजिक अस्थिरता होता है । वे अधिक अदृश्य हैं । सामान्यतः इनका आन्तरिक स्वार्थ समझ से परे होता है । वे जनहित में काम करते हैं, उच्च श्रेणी की राय देते हैं, तथ्यांक में हेरफेर करते हैं । वे लोगों की भावनाओं को समझने के लिए फर्जी सूचनाएं देते हैं और उन्हें मौके पर ही मार देते हैं । ये हमेशा सत्ता में दूसरों के करीबी प्रतीत होते हैं । अस्थिरता उनकी विचारधारा है । युवाओं और बेरोजगारों को आसानी से मानसिक रूप से बरगलाया जाता है, इसलिए वे इस शक्ति का उपयोग करने का प्रयास करते हैं । बौद्धिक आतंकवाद भौतिक आतंकवाद से कई गुना अधिक खतरनाक है । एक परमाणु बम या बंदूक एक निश्चित स्थान पर कुछ लोगों को एक निश्चित अवधि के लिए प्रभावित करता है, लेकिन बौद्धिक आतंकवाद आमतौर पर एक बार में लंबे समय तक प्रभावित करता है ।
स्वचालन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विकास के साथ, जैसे–जैसे लोग धीरे–धीरे श्रम बाजार से विस्थापित हो रहे हैं, आर्थिक रूप से अनुत्पादक वर्ग का आकार बढ़ रहा है । बौद्धिक अराजकता का सबसे अधिक प्रभाव इसी वर्ग पर पड़ेगा, क्योंकि काम में व्यस्तता न होने पर खाली दिमाग शैतान का घर कहा जाता है । जो राज्य के लिए बड़ी समस्या बन सकती है । इसलिए राज्य को ऐसे वर्ग को रोजगार उपलब्ध कराने और उन्हें रचनात्मक कार्यों में व्यस्त करने की नीति बनाना जरूरी है । अब साइबर सुरक्षा और शिक्षा की दिशा में राज्य के निवेश पर अधिक ध्यान देना आवश्यक है । देश भूगोल पर कब्जा करने के बजाय लोगों के दिमाग पर कब्जा करने की ओर बढ़ रहे हैं । देश के दिमाग पलायन करेंगे या अपने ही देश के लिए उत्पादक नहीं रहेंगे, इसकी जानकारी होना और उसके अनुसार नीति तय करना जरूरी लगता है । यदि बौद्धिक अराजकता से बचा नहीं गया तो राजनीतिक अस्थिरता बनी रहेगी ।
वैदेशिक उदारवाद के प्रभाव के साथ–साथ वैयक्तिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को निरपेक्ष मानने और केवल वैयक्तिक दृष्टि से देखकर सामाजिक आंखें बंद कर लेने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, वैयक्तिक स्तर पर बौद्धिक अराजकता बढ़ रही है । चूँकि ज्ञान मस्तिष्क का उत्पाद है, इसलिए मानव मस्तिष्क पर हमला किया जा रहा है । हालाँकि नेपाल में कोई बड़ा बौद्धिक आतंक का प्रत्यक्ष स्वरूप दिखाई नहीं देता है । देश छोटे होने के कारण भी हो सकता है । परंतु धार्मिक उन्माद, तोडफोड, दंगा, यूरोप, चीन, पाकिस्तान और भारत के राजनीतिक स्वार्थ के केंद्रविंदु होने की पुष्टि सरकार के फेर बदल और गैर सरकारी संस्थाओं के भरमार, विशुद्ध नेपाली युवाशक्ति को देश से पलायन होने पर मजबूर करना, जीने के लिए अपनी इज्जत तक को दाव पर रखकर नेपाली युवतियों को वैदेसिक रोजगार मे जाने के लिए मजबूर होना, चिकित्सक, इंजीनियर, प्राविधिक और नर्स जैसे अत्याधुनिक शिक्षा हासिल करने के वाद भी अपने देश मे कोई स्थान न मिलने के कारण लाखों की संख्या मे दक्ष जनशक्ति विदेश पलायन होने को बाध्य होना । क्या छोटे–मोटे आतंककी स्थिति को दर्शाता है ?प्रश्न यह उठता है; कि, आखिर इस देश मे रहेगा कौन ? अथवा यह देश किस प्रकार के लोगों को रहने के लिए पूर्वनियोजित तरीके से सुरक्षित किया जा रहा है ? चौरासी प्रतिशत हिन्दू के भावना और आकांक्षा को डालर और विदेशी शक्तियों के बल पर सीधे लात मार दिया जाता है । देश को मधेसी, जनजाति, मुस्लिम, ईसाई, किरात, मूलबासी, आदिवासी तथा हिमाली, पहाड़ी, तराई और मधेसियों के नाम पर बड़ी आसानी से खंडित कर दिया गया है । वर्षों के आपसी सद्भाव को इन बौद्धिक आतंकवादियों ने चंद वर्षों में तार–तार करके रख दिया है । और वह भी सम्मान के साथ ।
आज अधिकतर लोग यह कहते मिल जाएंगे की, “सोशल नेटवर्क बौद्धिक आतंक का मुख्य मंच बन गया है । आविष्कारों के विस्फोट के साथ जटिलता और मानवीय मूर्खता भी बढ़ती है । इसलिए, शिक्षा प्रणाली में सुधार किया जाना चाहिए ताकि प्रौद्योगिकी का उपयोग मानव लाभ के लिए किया जाए और दुरुपयोग न किया जाए । चूंकि यह नैतिकता से जुड़ा विषय है इसलिए इसमें मानवीय मूल्यों की शिक्षा देना जरूरी है । हमें मानवीय मूल्यों को प्रौद्योगिकी से जोड़कर चुनौतियों से निपटने के लिए संभव बनाने का प्रयास करना चाहिए । बौद्धिक आतंकवाद का मुख्य साधन मीडिया है । आतंकवादी जनभावना के मुद्दे को उठाते हैं और अपनी निहित स्वार्थ कोछुपाए रहते हैं । मीडिया इसे सार्वजनिक चिंता का विषय बताकर प्रचारित करता है । यहां मीडिया को स्व–प्रेरित और सही तथा जनहित वाली सूचनाओं के बीच अंतर करना चाहिए । दहशत फैलाने वाली सूचनाओं को हतोत्साहित किया जाना चाहिए ।” लेकिन सरकार को जनता से कुछ लेना देना हो तब न !

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