Tue. Jul 16th, 2024

डा. श्वेता दीप्ति
हिमालिनी, अंक जून 2024 । भारत की जनता तीसरी बार अपने प्रिय प्रधानमंत्री को सत्ता पर काबिज होते हुए देख रही है । इस पर सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि विश्व की निगाहें टिकी हुई हैं । कैसा रहेगा मोदी का तीसरा कार्यकाल ? क्या पिछले कार्यकाल की ही तरह गठबन्धन की सरकार मजबूत फैसले ले पाएगी ? क्या मोदी के सपनों का भारत गठबन्धन की सरकार में विकास की राह पर पहले की ही तरह आगे बढ़ पाएगा ? देखा जाए तो यह आसान नहीं होगा क्योंकि कई मुद्दे ऐसे हैं जहाँ भाजपा अपने गठबन्धन के साथियों से बिल्कुल अलग विचार रखती है । गठबन्धन के साथी आज भी तुष्टिकरण की राजनीति से अपना मोह नहीं छोड़ पाए हैं । ऐसे में सीएए, मथुरा मुद्दा, मुस्लिम आरक्षण जैसे कई मुद्दे हैं जहाँ भाजपा को अपने साथियों को मनाना मुश्किल होगा । किन्तु इस सच से नकारा नहीं जा सकता कि एक बार फिर भारत एक सुरक्षित और मजबूत नेतृत्व के हाथों में है । जहाँ भारत के विकास की दौड़ पूर्ववत जारी रहेगी ।
भारत की जनता ने मोदी पर अपना विश्वास बनाए रखा है । सीटों की संख्या घटी है किन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं है कि मोदी की लोकप्रियता घटी है । यह सबने देखा कि मोदी जी ने चुनाव में अथाह मेहनत की और उसी कारण इतने भयानक जातीय गोलबंदी के बावजूद भाजपा कांग्रेस से ढाई गुना सीट से आगे है । इसका मतलब है कि मोदी का चेहरा आज भी लोगों में सबसे अधिक मान्य है और भाजपा का मत प्रतिशत पूर्व की भाँति बरकरार रहा है ।
मोदी ने विपक्ष पर ही नहीं भारत विरोधी अन्तर्राष्ट्रीय ताकतों पर जीत हासिल की है । सामने का परिदृश्य यह था कि भाजपा विपक्ष के महागठबन्धन से लड़ रही है, जहाँ विपक्षियों की एकजुटता सिर्फ इस बात के लिए थी कि, किसी भी हाल में भाजपा सत्ता में नहीं आए । यहाँ सवाल भाजपा से अधिक मोदी का था जिसे हर हाल में सत्ता से बाहर करने की कोशिश की जा रही थी । किन्तु यह संभव नहीं हो पाया । यह तो सामने दिख रहा था किन्तु इससे इतर एक पहलू यह था कि मोदी सिर्फ विपक्ष से नहीं लड़ रहे थे, बल्कि वो लड़ रहे थे जॉर्ज सोरोस जैसे विदेशी ताकतों से, जिसने भारत के लोकतंत्र में दखल देने की कोशिश की थी । विदेशी धरती से भारतीय लोकतांत्रिक ढांचे को हिलाने का प्रयास किया जा रहा था । जॉर्ज सोरोस के निशाने पर पीएम मोदी थे । जॉर्ज सोरोस ने अडानी मुद्दे पर पीएम मोदी पर निशाना साधा था । उन्होंने कहा था, मोदी इस मुद्दे पर शांत हैं, लेकिन उन्हें विदेशी निवेशकों और संसद में सवालों के जवाब देने होंगे । सोरोस ने म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस में कहा था कि यह भारत की संघीय सरकार पर मोदी की पकड़ को काफी कमजोर कर देगा और बहुत जरूरी संस्थागत सुधारों को आगे बढ़ाने के दरवाजा खोल देगा । उन्होंने कहा था, मुझे उम्मीद है कि भारत में एक लोकतांत्रिक परिवर्तन होगा । जिस परिवर्तन की उन्हें आकांक्षा थी फिलहाल वह संभव नहीं हो पाया ।
देश के भीतर ही नहीं मोदी का मुकाबला बाहर स्थित डीप स्टेट जैसी संस्थाओं से था । सभी जानते हैं कि पूरी दुनिया को अपने हिसाब से चलाने वाले डीप स्टेट यानी मूलतः नाटो और मल्टीनेशनल हाउसों की ताकत इस सीमा तक है कि, वे उन राष्ट्रों में तख्ता पलट करने में सक्षम है जो उनके एजेंडे में फिट नहीं बैठते हैं । पिछले समय में भारत में घटी कुछ घटनाक्रम पर नजर डालें और उसकी गहराई में जाएँ तो पता चलता है कि डीपस्टेट ने किस तरह भारत की राजनीतिक व्यवस्था को हिलाने की कोशिश की है । किन्तु सकरात्मक बात यह रही कि भारत में डीप स्टेट की यह ताकत मोदी राज में उतनी परिणामोन्मुखी साबित नहीं हो पाई जितना इसका सफल इतिहास रहा है । ट्रप, जॉनसन, शिंजो आबे से जुड़े घटनाक्रम विशुद्ध रूप से इसी रणनीति का हिस्सा है इसके बाबजूद भारत में मोदी की लोकप्रियता और वैचारिक समर्थन के मौजूदा प्रभाव के आगे उस वक्त उसकी नहीं चली किन्तु आज जो परिणाम सामने आया है वह बता रहा है कि इसकी कोशिश भीतरी स्तर पर कायम थी ।
भारत में डीप स्टेट लॉबी की जड़े ७० साल पुरानी है कभी रूसी तो कभी चीनी और अमेरिकी जासूसी से लेकर उनके एजेंडे को चलाने वाला एक बहुत ही विस्तृत प्रभाव वाला वर्ग यहां हमेशा से मौजूद रहा है । लेपट लिबरल प्रभाव वाला यह वर्ग इसी डीप स्टेट लॉबी के इशारों पर पिछले आठ सालों से समाज में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कतिपय अधिकारों के नाम पर यहां पूरी ताकत से सक्रिय है ।
मोदी सरकार ने विदेशी चंदे से जुड़े एफसीआरए कानून में संशोधन किया तो फोर्ड फाउंडेशन, ग्रीन पीस, एमनेस्टी जैसे सैंकड़ो संगठन सरकार के विरुद्ध खड़े हो गए । वस्तुतः यह भद्रलोक के रूप में स्लीपर सेल ही है जो डीप स्टेट के एजेंट के रूप में ७० साल से सक्रिय हैं । किसान आंदोलन, नागरिकता संशोधन कानून, और हाल ही में अग्निवीर योजना के विरुद्ध जिस तरह से देश में एक प्रायोजित माहौल खड़ा किया गया उसे देखकर कल की श्रीलंकाई तस्वीरों से मिलान किया जाए तो सब कुछ आसानी से समझा जा सकता है कि कैसे एक पूरा सिंडिकेट भारत के विरुद्ध खड़ा रहा है । ऊपर से ऐसा प्रतीत होता है कि मानों मोदी सरकार के विरुद्ध इस तरह के आंदोलन स्वतःस्फूर्त होते हैं लेकिन सच्चाई यह है कि यह सब कुछ प्रायोजित रहा है ।
२६ जनवरी पर लालकिले का उपद्रव हो या अमेरिकी राष्ट्रपति की मौजूदगी में दिल्ली में दंगे की साजिश, डॉलर और पेट्रो डॉलर से लेकर चीनी चंदा सब जगह भारत के विरुद्ध काम करता हुआ नजर आ जाता है । शिंजो आबे की हत्या के साथ भी भारत में एक वर्ग खड़ा नजर आया था, कांग्रेस पार्टी के एक नेता ने आबे की हत्या भारत में अग्निवीर योजना के साथ जोडने का प्रयास किया था क्योंकि हत्यारा जापान के एक पार्ट टाइम फोर्स का हिस्सा था । सोशल मीडिया पर कुछ पत्रकारों और एकेडेमिकस ने जॉनसन, ट्रप, श्रीलंका के मामलों के तत्काल बाद यही रुख और आशा व्यक्त की थी कि अब अगली बारी मोदी की है ।
किसान आंदोलन, शाहीन बाग, अग्निवीर, लाल किला कांड, नूपुर शर्मा, हिजाब जैसे मुद्दे पर जिस तरह की उग्रता के साथ प्रतिक्रियाएं उस समय सामने आई वह विदेशी षडयंत्र का हिस्सा था । प्रदर्शन के नाम पर एनजीओ और सिविल सोसायटी की भूमिकाएं भी जिस तरह से बेनकाब हुई, वह समाज के अंदर तक देश विरोधी ताकतों की व्याप्ति को रेखांकित करती हैं । नागरिक अधिकारों एवं गरीब कल्याण के नाम पर देश में करीब ४० हजार करोड़ की समानान्तर आर्थिकी पर चोट करने वाले मोदी सरकार के नए कानून की प्रतिक्रियाओं को देश में आन्दोलनजीवियों की गतिविधियों के साथ समझने की आवश्यकता है ।
भारत की वर्ल्ड आर्डर में स्थिति का अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि कोरोना के बाद भी भारत की अर्थव्यवस्था पटरी पर आ गई और समुन्नत स्वास्थ्य ढांचा न होने के बाबजूद भारत ने इस महामारी का सफलतापूर्वक सामना किया । एक बड़े वर्ग ने भारत के अंदर ही इस महामारी को लेकर जिस तरह का कुप्रचार किया वह उसी डीप स्टेट लॉबी के एजेंडे का हिस्सा रहा था ।
भारत का बढ़ता हुआ कद और मोदी का नेतृत्व विश्व को पच नहीं रहा है । दुनिया के धनी और ताकतवर देश जिनमें यूरोप, अमेरिका और चीन शामिल हैं वे नहीं चाहते कि भारत बदलती विश्व व्यवस्था में मोदी के नेतृत्व में आगे बढ़े । मोदी की लीडरशिप का मतलब है एक मजबूत और स्वतंत्र सोच वाला भारत जिसके लिए नेशन फर्स्ट ही सब कुछ है । यह स्पष्ट समझा जाना चाहिये कि डीप स्टेट यानी मल्टीनेशनल हाउसों का दबाब समूह भारत को ऐसे देश के रूप में उभरने नहीं देना चाहता है जो उसके व्यापारिक हितों के प्रश्नों पर कठपुतली की तरह चले । चीनी कम्पनियों के विरूद्ध ईडी, इनकम टैक्स की कारवाई से किसके हित प्रभावित हो रहे है ? क्या कोई देश चीनी दबदबे के आगे चीनी एप्स को राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर प्रतिबंधित करने का साहस कर पाया है ? परन्तु भारत ने यह हिम्मत की है । जर्मनी से लेकर अमेरिका तक फैले सरकार पलटने वाले खुफिया तंत्र से मोदी की लड़ाई है । यू–ट्यूब और कुछ अन्य सोशल मीडिया प्लेटफार्मों की कोशिश रही कि मोदी को सत्ता से दूर रखा जाए । एक अकेले मोदी लड़ रहे थे चीन से फंड पाने वाली पार्टियों, अर्बन नक्सलियों, पाकिस्तान परस्त विभाजनकारी ताकतों, भारत के उद्योगपतियों के एक ऐसे समूह से जो राष्ट्र विरोधी ताकतों को फंडिंग कर रहे थे, कतर, जर्मनी, यूएस से पोषित होने वाले यू ट्यूबरों व सोशल मीडिया इनफ्लुएंसर्स से । उस पर भी अगर मोदी जनमत की गाड़ी को २९०तक खींच लाए हैं, तो इसे ४०० पार ही समझना चाहिए ।
इन सबके बाद भी भाजपा को आत्मचिंतन और मंथन की आवश्यकता अवश्य है । यदि उम्मीदवारों के चयन में भाजपा संगठन ने थोड़ी भी मेहनत की होती तो आज फिर से भाजपा सबसे बड़ी पार्टी होने के बजाय पूर्ण बहुमत वाली पार्टी होती । उबाऊ, थकाऊ, जÞमीन से कटे, रिपीटेड उम्मीदवारों ने लोगों के असंतुष्टि को एक कारण दे दिया । बहुत से लोग जातीय गोलबंदी के कारण भाजपा के विरोध में पहले से थे लेकिन उनका जमीर किसी अन्य पार्टी को वोट देने से रोक रहा था । लेकिन उम्मीदवारों ने ऐसे लोगों को स्पष्ट मौकÞा दे दिया ।
कुछ और विषय जिस पर भाजपा के प्रवक्ताओं की न कोई ट्रेनिंग हुई और न ही उन्होंने उसे छुआ । वास्तविकता यह है पिछले दस साल में देश में प्राइवेट सेक्टर में अथाह ग्रोथ हुआ है । लोगों को उनके सऊर के अनुसार बहुत रोजÞगार दिया गया है । भाजपा के प्रवक्ता इस बात को बोलने से इनकार करते रहे । सबके जीवन स्तर में अभूतपूर्व सुधार हुआ है । सबके शरीर में बिना फटे कपड़े दिखाई दे रहे हैं, भूख से होने वाली मौत भारत से लगभग समाप्त हो चुकी है । कई करोड़ लोगों के सिर पर छत आ गई । लोगों को इलाज की सुविधा मिली है, इलाज न मिलने के कारण होने वाली मौतें बहुत कम हुई हैं । लेकिन इसको ठीक से कोई बोलने वाला नहीं मिला । महंगाई पिछले एक दशक से सबसे कम दर से बढ़ी लिखने इसको बोलने में हर प्रवक्ता कतराते रहे ।
अकेले मोदी ने दूसरे चरण के बाद जो मेहनत की थी वह यह सीख देता है कि चाहे आपकी उम्र कोई भी हो, चाहे आपकी अवस्था कोई भी हो लेकिन जब आपको व्यक्तिगत रूप से पता चल जाता है कि हमारी तरफÞ चीजें ठीक नहीं चल रहीं तो अथाह मेहनत और परिश्रम करके उसे ठीक करने के लिए जी जान लगा दिया जाता है ।
चुनाव परिणाम के बाद विदेशी मीडिया यह स्थापित करने की कोशिश कर रहा है कि ताजा लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अजेय होने का आभामंडल कमजोर पड़ा है और विपक्ष को नई ताकत मिली है । मोदी को कमजोर साबित कर वो भारत को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं । इसमें अमेरिकी अखबार न्यूयार्क टाइम्स, वाशिंगटन पोस्ट, अमेरिकी अखबार वाल स्ट्रीट जर्नल सबसे आगे हैं । विदित हो कि ये तीनों प्रमुख अमेरिकी अखबारों ने चुनाव प्रचार के दौरान भी प्रधानमंत्री मोदी के प्रति आलोचनात्मक रुख अपनाया था ।
भारत के चुनाव परिणाम का असर नेपाल पर क्या पड़ने वाला है अगर इस बात की ओर दृष्टि डाली जाए तो नहीं लगता कि कोई खास अंतर पड़ने वाला है । चूंकि नेपाल और भारत के बीच सदियों से सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और पारिवारिक रिश्ते हैं, इसलिए वहां की हर गतिविधि नेपाल को प्रभावित करती रही है । इसके अलावा, नेपाल के साथ सीमा विवाद, विभिन्न संधि समझौतों में मतभेद और हिंदू राष्ट्र जैसे मुद्दों को नवगठित सरकार कैसे आगे बढ़ाएगी, इसमें दिलचस्पी होना स्वाभाविक माना जाता है ।
चुनाव परिणाम के पश्चात मोदी ने पहले ही संकेत दे दिया है कि भारत का पुनर्गठन हो रहा है, भारत नये तरीके से आगे बढ़ रहा है । इसी कारण से यह उम्मीद जतायी जा रही है कि दोनों देशों द्वारा स्वीकृति के लिए नेपाल–भारत संयुक्त प्रबुद्ध समूह की रिपोर्ट पर भारत द्वारा पुनर्विचार की संभावना की जा सकती है ।
अब तक तैयार ईपीजी रिपोर्ट को भारत सरकार ने स्वीकार नहीं किया है । मोदी ने खुद २०१४ में नेपाल दौरे पर ईपीजी के गठन का प्रस्ताव रखा था । वहीं पहले यह कयास लगाया जा रहा था कि भारत हिन्दू राष्ट्र के लिए पहल कर सकता है किन्तू अब यह संभावना भी क्षीण नजर आ रही है । अगर भाजपा ने अपनी पुरानी ताकत बरकरार रखी होती तो वह भारत में हिंदू राष्ट्र का मुद्दा उठा सकती थी । परंतु कमजोर शक्ति के कारण भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने का अध्याय बंद हो चुका है । इस कारण यह विश्वास नहीं किया जा सकता कि भारत नेपाल को हिंदू राष्ट्र बनाने की पहल करेगा ।
विगत को देखा जाए तो भारत वर्तमान में विश्व से प्रतिस्पद्र्धा कर रहा है ऐसे में नेपाल के लिए भारत की नीति और नियम में कुछ खास बदलाव के आसार नजर नहीं आ रहे हैं । २०१४ और २०१९ के बाद तीसरी बार सत्ता संभालने के बाद मोदी के पास पिछले १० सालों का अनुभव है । उसके आधार पर वह पहले ही घोषणा कर चुके हैं कि वह अपने तीसरे कार्यकाल में बड़े बदलाव करेंगे । २०१४ में पहली बार प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने नेबरहुड फर्स्ट की नीति के तहत नेपाल से विदेश दौरे शुरू किए, जिससे नेपाल–भारत रिश्ते ऊंचे स्तर पर आ गए थे । उनके दूसरे कार्यकाल के दौरान नेपाल–भारत संबंध इतने मैत्रीपूर्ण नहीं थे । इस दौरान सीमा विवाद हुआ, भारत ने ईपीजी की रिपोर्ट को नहीं समझा और नाकेबंदी तक की स्थिति बन गई । ये कड़वाहट अब भी कायम है । उम्मीद है कि मोदी के तीसरे कार्यकाल में नेपाल–भारत संबंधों में असहजता कम हो जाएगी ।

– हिमालिनी जून २०२४ अंक से

डॉ श्वेता दीप्ति
सम्पादक
हिमालिनी



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