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कंचना झा, हिमालिनी अंक जून, 024 ।



‘पानी दे सरकार, अपनी आँखें खोल सरकार, चुरे को नहीं बेच सरकार, चुरे ऐन लागू कर सरकार, चुरे तथा वन का संरक्षण कर सरकार, समस्या का समाधान कर सरकार, पानी दे सरकारपानी ।’
आजकल काठमांडू के माइतीघर मंडला में यही नारा गूँज रहा है । जहाँ मधेश के विभिन्न भागों से महिला और पुरुष २५ दिन के पैदल यात्रा कर काठमांडू पहुँचकर पानी और चुरे को लेकर आंदोलन में बैठ हुए हैं । लेकिन सरकार तक अभी भी इनकी आवाज नहीं पहुँच सकी है । माइती मंडला में इस अनशन में प्रायः महिलाओं की सहभागिता है । महिलाएँ अपना घर आंगन परिवार बच्चे छोड़कर काठमांडू में पानी के लिए लड़ाई लड़ रही हैं । न जाने उन्हें पानी कब मिलेगा या फिर मिलेगा भी की नहीं ?

काठमांडू के माइतीघर में त्रिपाल बिछाकर महिलाएं बैठी हुई हैं । उन्हें सरकार से बहुत आशाएं हैं, लेकिन बहुत दुखी हैं और कहती हैं कि यदि देश में सरकार होती तो आज हम यहाँ इस हाल में नहीं बैठे होते । हमारे पैरों में छाले पड़ गए हैं । २५ दिन की पैदल यात्रा कर हम काठमांडू पहुँचे हैं । हमारा देश कृषि प्रधान देश है, लेकिन अभी पानी के अभाव में खेतीबारी अच्छे से नहीं हो पा रही है । घर के ही बारी में बहुत तरह के साग सब्जी हम उगा लेते थे, लेकिन पानी के अभाव में अब कुछ नहीं कर पाते हैं । अब तो पीने के लिए भी पानी नहीं है । घर का चापाकल, पोखर, कुँआ, छोटी–छोटी नदियां सूख गई हैं । पहले खाने, पीने,और नहाने के लिए पानी मिले तब तो हम कोई और काम करें । लेकिन ऐसा कुछ नहीं हो पा रहा है । इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि चुरे का दोहन किया जा रहा है । चुरे के दोहन के कारण जंगल पर असर पड़ रहा है । अब तो जंगली जानवर भी पानी की तलाश में गाँव की ओर आने लगे हैं । इसलिए हम पानी के साथ साथ चुरे की समस्या का समाधान और चुरे को बेच नहीं सकते का नारा लगा रहे हैं । हम जानते हैं कि चुरे का रहना हमारे लिए कितना आवश्यक है ।
चुरे है तो जल है क्योंकि, जीवन के लिए जल और जल के लिए चुरे का होना तराई वासियों के लिए अत्यन्त आवश्यक है । जल ही जीवन है इस सच्चाई को जानते हुए भी हम जल का संरक्षण नहीं कर पा रहे हैं । जल को लेकर पहले भी कहा गया है कि यदि हम मानव जल का संरक्षण नहीं कर पाए तो आने वाले दिनों में हमें बिना पानी के ही जीना पड़ेगा । और बिन पानी हम नहीं जी सकते हैं । इस यथार्थ को जानकर ही कुछ दशक से बड़े तौर पर, संस्थागत तरीके से देश विदेशों में भी इस पर बहुत कुछ काम किया जा रहा है ।

नेपाल जिसे प्रकृति ने बहुत कुछ दिया है जिसमें से पानी भी एक है । जल स्रोत का भंडार होते हुए भी आज नेपाल के बहुत से भूभाग में पानी का अकाल पड़ गया । नल सूख गए हैं । लोगों में पानी को लेकर हाहाकार मचा है । ये सच है कि हमने पानी के महत्व को नहीं समझा इसलिए आज इस मोड़ पर आ गए हैै । कहते हैं प्रकृति के साथ अगर खिलवाड़ करोगे तो वह भी तुम्हारे साथ खिलवाड़ ही करेगी । आज जिस तरह से चुरे का दोहन किया जा रहा है उससे तो ये दिन आना ही था । चुरे को लेकर नेपाल सरकार बहुत ज्यादा गंभीर नहीं दिख रही है । तराई के लोग चुरे को लेकर परेशान हैं क्योंकि चुरे से उनकी जिंदगी बंधी है । उनके लिए पानी का स्रोत है चुरे ।
खासकर मधेश प्रदेश की बात करें तो यहाँ की अवस्था आजकल बहुत खराब है । आम जनता पानी के परेशान हैं क्योंकि जीवन के लिए पानी आवश्यक है । विज्ञों का मानना है कि ये तो होना ही था क्योंकि जिस क्षेत्र की हम बात कर रहे हैं वहाँ पानी का सबसे बड़ा स्रोत चुरे पहाड़ है जिसका दोहन किया जा रहा है । ऐसा नहीं है कि चुरे का महत्व किसी को मालूम नहीं है क्योंकि गणतंत्र नेपाल के पहले राष्ट्रपति रामवरण यादव ने पहले ही इस विनाश को भाप लिया था कि आज न कल पानी के लिए लोगों के बीच त्राहिमाम मचेगी ।

उन्होंने अपने कार्यकाल में राष्ट्रपति चुरे संरक्षण कार्यक्रम की शुरुआत की थी । कारण स्पष्ट था कि वो उस जगह से आते है जहाँ आज से ६० –७० वर्ष पहले पानी की कोई किल्लत नहीं थी । वो धनुषा के सपहि गाँव से आते हैं जो की चुरे की गोद में हैं । राष्ट्रपति ने कई बार अपने साक्षात्कार में बताया कि जब वो छोटे थे, तो उनके गाँव में २० ३० फीट नीचे से ही पानी चापाकल में आ जाता था । उस वक्त न जाने कितनी नदी नाले, कुँआ, तलाब थे । वैसे भी जनकपुर धाम तो नदियों के लिए ही मानी जाता है । उन्होंने कई बार इन बातों का उल्लेख किया है । साथ ही उन्होंने इस बात को भी बताया कि जैसे–जैसे वो बड़े हुए यह फीट बढ़ता चला गया । उनका कार्यकाल आते–आते तो ४००, ५०० फीट में भी पानी नहीं आने लगा । तब उन्होंने यह कार्यक्रम लाया ताकि चुरे का संरक्षण किया जा सके और पानी की जो किल्लत है, वह कम हो सके ।
वैसे तो राष्ट्रपति चुरे संरक्षण कार्यक्रम बहुत ही सुलझा हुआ था लेकिन आज की बात करें तो करोड़ो का निवेश किया जा चुका है, लेकिन कोई ठोस काम नहीं हो सका है । चुरे के जंगलों की कटाई उसी रफ्तार में हो रही है । उसके बहाव से रोड़ा गिट्टी मिट्टी बालु को अलग किया जा रहा है । वैसे इसे अलग करना ही होता है लेकिन उसका एक तरीका होता है जिसे अभी तक सीख नहीं पाए हैं । आंदोलन में बैठे लोगों की मांग के अनुसार चुरे की हिफाजत जरुरी है । सरकार को इसपर ध्यान देना ही चाहिए ।
चुरे क्या है ?
तिब्बती और भारतीय प्लेटों के टकराने से बनी हिमालय शृङ्खला के नीचे महाभारत पर्वत शृङ्खला है । इसके ठीक नीचे चुरे क्षेत्र है । तराई के ऊपर और मध्यपहाड़ के नीचे पूर्व–पश्चिम तक फैले एक संकीर्ण क्षेत्र को हम चुरे कहते हैं ।
चुरे सबसे बाद का पहाड़ है । कहते हैं यह पहाड़ कमजोर तथा कोमल है । पूर्व में यह कमजोर है तुलनात्मक रूप से पश्चिम में कुछ कड़ा है । चुरे नेपाल के पूर्व से लेकर पश्चिम तक फैला है । नेपाल के कुल क्षेत्रफल का १२.७ ८ प्रतिशत क्षेत्र चुरे में पड़ता है । अभी की बात करें तो ३७ जिला चुरे क्षेत्र में पड़ता है । तराई की तुलना में चुरे में ज्यादा पानी पड़ता है । चुरे तराई के पानी का मुख्य स्रोत है । इसलिए चुरे को तराई का लाइफलाइन भी कहा जाता है । तराई में पानी पड़ने का एक कारण चुरे भी है । चुरे से उत्पन्न हुए कतिपय तलाब, नदी में अभी भी १२ महीने पानी बहता है । लेकिन सूखा बढ़ने के साथ ही पानी नीचे तक चला गया । इस तरह चुरे के विनाश के साथ ही पानी की मात्रा भी घटती जा रही है ।

आम नागरिक में भी चुरे को लेकर संवेदनशीलता बढ़ी है । वो चाहते हैं कि किसी भी तरह चुरे के वन को बचाया जाए । चुरे में वन और झाड़ी का विनाश किया जा रहा है । इसे रोकना ही होगा । तराई के पानी के स्रोत को यथावत रोकने के लिए भी चुरे में जंगल और हरियाली को बचाना होगा ।

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इसलिए आजकल चुरे क्षेत्र में हो रहे वन विनाश, अनियंत्रित गिट्टी बालु के निकास को रोका जा रहा है । इसे रोकने का उद्देश्य एकमात्र तराई में संभावित मरुभूमीकरण के खतरे को रोकना और चुरे का संरक्षण करना है । इसी उद्देश्य से आ.व. २०६७÷६८ में राष्ट्रीय प्राथमिकता प्राप्त कार्यक्रम रखकर राष्ट्रपति चुरे संरक्षण कार्यक्रम को नेपाल सरकार के गौरव कार्यक्रम के रूप में लागू किया गया ।
खासकर मधेश प्रदेश की बात करें तो यहाँ की अवस्था आजकल बहुत खराब है । आम जनता पानी के परेशान हैं क्योंकि जीवन के लिए पानी आवश्यक है । विज्ञों का मानना है कि ये तो होना ही था क्योंकि जिस क्षेत्र की हम बात कर रहे हैं वहाँ पानी का सबसे बड़ा स्त्र्रोत चुरे पहाड़ है जिसका दोहन किया जा रहा है । इन्हीं बातों को ध्यान में रखकर, जब जलस्तर कम हो गया है लोगों में पानी को लेकर त्रास आया है तो वो सरकार से इसका समाधान मांग रहे हैं और आंदोलन कर रहे हैं ।

पैदल यात्रा का नेतृत्व करने वाले सुनील यादव हैं । यादव चुरे तथा वन जङ्गल संरक्षण के अभियन्ता हैं और चुरे क्षेत्र नजदीक वन जङ्गल को बचाने और अवैध उत्खनन् को रोकने के लिए आंदोलन कर रहे हैं । उन्होंने बताया कि चुरे में भूमिहीन के नाम में भूमाफिया कब्जा कर रहे हैं । और इसकी मार स्थानीय बासी को भोगना पड़ रहा है ।

आंदोलन कर रहे लोगों की मांग है कि चुरे और वहाँ रहे वन को बचाना होगा । उनका कहना है कि जब तक उनकी यह मांग पूरी नहीं होती वे लोग काठमांडू में ही रहेेंगे । उनका कहना है कि इससे पहले भी हम पैदल यात्रा कर काठमांडू आए थे । सरकार ने सहमति भी की थी लेकिन कार्यान्वयन नहीं हो पाया । इसलिए इसबार का आंदोलन आर पार का है ।
इससे पहले भी कई बार आंदोलन हुए । लेकिन हर बार लोग थककर चले जाते हैं । न जाने क्या समझौता होता है और आंदोलनकारी लौट जाते हैं । कम से कम इसबार के इस आंदोलन को सफलता मिले । यह भी सिर्फ नाम का आंदोलन नही बनें । इस आंदोलन के साथ आम लोगों की जो आशाएं हैं वह पूरी हो । सरकार से जो उनकी मांग है वह मिले । पानी केवल उनकी जरूरत नहीं है यह सबकी जरूरत है क्याेंकि जल ही जीवन है । इससे हम बंधे हैं, हमारा जीवन बंधा है ।

कंचना झा
कार्यकारी संपादक
हिमालिनी ऑनलाइन
www.himalini.com



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