भय विनु प्रीत न होय ! : अजय कुमार झा
अजय कुमार झा, हिमालिनी अंक फ़रवरी 025 । अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के कार्यकारी आदेश के साथ ही नेपाल में अमेरिकी अनुदान सहायता से चलाए जा रहे सभी कार्यक्रम भी निलंबित कर दिए गए हैं । संयुक्त राज्य अमेरिका की अंतर्राष्ट्रीय विकास एजेंसी (यूएसएआईडी), जिसकी नेपाल सरकार के साथ पांच साल की रणनीतिक साझेदारी है, ने वित्त मंत्रालय, गैर–सरकारी संगठनों और गैर–लाभकारी कंपनियों को एक पत्र लिखकर सूचित किया है कि नेपाल सरकार के साथ पांच साल की रणनीतिक साझेदारी का अनुदान–वित्तपोषित कार्यक्रम फिलहाल स्थगित कर दिए गए हैं । कारण है अमेरिका का आंतरिक सुरक्षा और आर्थिक सुदृढीकरण । विश्व के सर्वोच्च शक्तिसंपन्न राष्ट्र अमेरिका वर्तमान मे वैश्विक आतंक और विद्य्रोह तथा सांस्कृतिक आतंकवादी षडयन्त्र का केंद्र बनता जा रहा है । अमेरिका ही ए ऐसा राष्ट्र है जहां सभी धार्मिक और सांस्कृतिक संगठनों को फलने फूलने के लिए सुरक्षित स्थान है । जो धीरे धीरे सत्ता लोलुपता और वामपंथी वैचारिक दवाव से अपनी आदर्स और अस्तित्व को खोने लगा था ।
भारतीय यशस्वी प्रधान मंत्री मोदी जी से अंतरंग आत्मीयता और मोदी जी के प्रति विश्व के उच्चतम संस्कारित महामानवों के असीम प्रेम, हार्दिक रुझान और सुंदर तथा सुरक्षित भविष्य के प्रति अटूट भरोसा को हृदयंगम कर उन्होंने अप्रत्यक्ष ही सही लेकिन जो निर्णय लेते जा रहे हैं उसमे मोदी की भावना और प्रेरणा ओतप्रोत है । ध्यान रहे, मोदी जी और योगी जी के प्रति मात्र हिंदुओं मे ही नहीं संसार के सभी मानव मे एक सहज और स्वतःस्फुर्त श्रद्धा है । विश्व को उनमें अवतारित महा पुरुषों के लक्षण देखते हैं । उनसे विश्व मानव कल्याण के मार्ग को प्रशस्त होते देखते हैं । देश और जनता के प्रति मोदी योगी के समर्पण और संरक्षण के भाव को भारतीय ही नहीं पूरा विश्व समझ रहा है । उधर वामपंथ के विनाशकारी अमानवीय सोच तथा क्रियाकलापों से विश्वत्रस्त है । इन सारी घटनाओं तथा वैचारिक आंधी के भावी दुष्परिणामों को हृदयंगम कर डोनाल्ड ट्रम्प के द्वारा उठाए जा रहे राजनैतिक कदम वैश्विक स्तर पर स्वागतयोग्य माना जा रहा है ।
मोदी और ट्रंप दोनों ही वैश्विक नेताओं के साथ अपने ‘व्यक्तिगत संबंधों’ को अन्य मामलों से ज्यादा तरजीह देने के लिए जाने जाते हैं । सितंबर २०१९ में मोदी ने अमेरिका का दौरा किया था, तब मोदी और ट्रंप ने टेक्सस में ‘हाउडी मोदी’ रैली में एक–दूसरे की खूब तारीफ की थी । यहां ट्रंप ने करीब ५० हजार भारतीय अमेरिकियों को संबोधित किया था, जो अमेरिका–भारत संबंधों के लिए एक महत्वपूर्ण क्षण था । इसके बाद फरवरी २०२० में गुजरात में ‘नमस्ते ट्रंप’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया था. यहां ट्रंप ने अमेरिका–भारत संबंधों को मजबूत करने का संकल्प लिया था । ट्रंप ने २०२४ के चुनाव अभियान के दौरान मोदी की प्रशंसा भी की थी । एक पॉडकास्ट में उन्होंने मोदी को ’सबसे अच्छा इंसान’ और ‘दोस्त’ बताया था । भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने इस हफ्ते की शुरुआत में कहा था, “चुनाव के नतीजे चाहे जो भी हों, अमेरिका के साथ हमारे रिश्ते और मजबूत ही होंगे ।”
वैश्विक राजनीति और कूटनीतिक युद्ध का वर्तमान परिदृश्य काफी जटिल और गतिशील है । दुनिया भर में कई तरह के तनाव और संघर्ष देखने को मिल रहे हैं, जो विभिन्न कारकों से प्रभावित हैं ।
कुछ प्रमुख बिंदु जो वर्तमान स्थिति को परिभाषित करते हैं, वे हैंः
महाशक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धाः अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा वैश्विक राजनीति का केंद्र बिंदु बन गई है । दोनों देश आर्थिक, सैन्य और तकनीकी क्षेत्र में एक–दूसरे को चुनौती दे रहे हैं ।
क्षेत्रीय तनावः कई क्षेत्रों में तनाव बढ़ रहा है, जैसे कि मध्य पूर्व, यूक्रेन, दक्षिण चीन सागर । ये तनाव अक्सर सीमा विवादों, धार्मिक मतभेदों और संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा के कारण होते हैं ।
आतंकवाद का खतराः आतंकवादी संगठन दुनिया भर में अस्थिरता फैला रहे हैं । आईएसआईएस जैसे संगठनों ने कई देशों में हमले किए हैं और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरा बने हुए हैं ।
महामारी का प्रभावः कोविड–१९ महामारी ने वैश्विक अर्थव्यवस्था और राजनीति को गहराई से प्रभावित किया है । महामारी के कारण कई देशों के बीच तनाव बढ़ा है और वैश्विक सहयोग कमजोर हुआ है ।
जलवायु परिवर्तनः जलवायु परिवर्तन एक गंभीर वैश्विक चुनौती है, जो कई देशों के लिए खाद्य सुरक्षा, जल संसाधन और आर्थिक विकास के लिए खतरा पैदा कर रहा है ।
कूटनीतिक युद्ध के मोर्चे परः
आर्थिक प्रतिबंधः देश एक–दूसरे पर आर्थिक प्रतिबंध लगाकर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं ।
सूचना युद्धः देश एक–दूसरे के खिलाफ सूचना युद्ध छेड़ रहे हैं, जिसमें सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों का इस्तेमाल किया जा रहा है ।
सैन्य तैनातीः कई देश अपनी सैन्य तैनाती बढ़ा रहे हैं और नए हथियार विकसित कर रहे हैं ।
वर्तमान स्थिति के निहितार्थः
अनिश्चितताः वर्तमान वैश्विक परिदृश्य अत्यंत अनिश्चित है । कोई भी यह नहीं कह सकता कि भविष्य में क्या होगा ।
संघर्ष का खतराः बढ़ते तनाव और प्रतिस्पर्धा के कारण संघर्ष का खतरा बढ़ गया है ।
सहयोग की आवश्यकताः वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता है, लेकिन वर्तमान में सहयोग की भावना कमजोर है ।
‘भय बिनु होइ न प्रीति’ यह कहावत हमारे संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है । इसका अर्थ है कि प्रेम के लिए एक निश्चित स्तर का भय आवश्यक है । यह भय, सम्मान, आदर और अपनों को खोने के डर से उत्पन्न होता है । यह हमें बताती है कि प्रेम केवल एक सकारात्मक भावना नहीं है, बल्कि इसमें कुछ नकारात्मक भावनाएं भी शामिल होती हैं । यह भय हमें अपने प्रियजनों के प्रति और अधिक सजग और संवेदनशील बनाता है । प्रायः कहा जाता है कि मिमियाते बकरे कसाई के हृदय में परिर्वतन नहीं कर सकते और घिघियाते मनुष्य दुष्टों के हृदय में करुणा नहीं जगा सकते हैं । दया–ममता का उपदेश कोई नहीं सुनता है । भय के बिना तो प्रीति का राग नहीं सुना जा सकता । संसार में चमत्कार को नमस्कार किया जाता है । आज मनुष्य की विनम्रता को उसका संस्कार नहीं, अपितु उसकी कमजोरी समझी जाने लगी है । इस संदर्भ में राष्ट्रीय स्तर पर विचार किया जाए कि हमारी विनम्रता और अहिंसावादी नीति को हमारी मानसिक और भौतिक कमजोरी समझ कर नेपाल के शासकीय वर्ग कभी हमें भारतीय कहकर हमारा उपहास करता है तो कभी कायर या अन्य हरकतें करता रहता है । उसकी इस दुष्प्रवृत्ति में निरंतर वृद्धि होती जा रही है जिसका मुख्य कारण मधेसियों के राजनैतिक अदूरदर्शिता, लाभोन्मुख प्रवृति, कमजोर इच्छाशक्ति, अखंडित मानसिक दृढ़ता है । अनेकों संधि और समझौता करने के वावजूद भी नेपाल सरकार अथवा कहें पहाड़ी मानसिकता या मधेस विरोधी अवधारणा को संपोषित करनेवाला वर्ग कार्यान्वयन करने को तैयार नहीं है । हर हालत में अटकाए रखना ही उनका लक्ष्य है । वैश्विक दवाव बढ़ने पर सारे सिद्धांतों को दरकिनार करते हुए राजतन्त्र के डफली बजाकर खस शसान को बचाए रखना ही उनका एकमात्र राजनीतिक एजेंडा,सिद्धांत और उद्देश्य है ।
ऐसी ही प्रवृत्ति के प्रतीक समुद्र्र से तीन दिन तक श्री राम रास्ता देने के लिए विनम्रतापूर्वक अनुरोध करते रहे परंतु समुद्य्र पर कोई असर नहीं पड़ा । फलस्वरूप उनका पौरुष धधक उठा और उन्होंने अग्निबाण लाने के लिए कहा । यहाँ श्रीराम का लक्ष्क्ष अन्याय का विरोध है । अन्याय का विरोध न होने पर उसका प्रचार–प्रसार बढ़ता जाता है । धीरे–धीरे वह इतना प्रचार–प्रसार पा लेता है कि फिर उसको रोकना कठिन हो जाता है और जन–जीवन को इतना संत्रस्त कर देता है कि लोगों का जीवन जीना दूभर हो जाता है । समयोपरांत प्रबुद्ध वर्ग भी अन्यायी का मुँह कुचलने की हिमायत करता है । वह चाहता है कि येन–केन प्रकारेण अन्यायी का सिर इस प्रकार कुचल दिया जाए कि वह फिर कभी सिर न उठा सके । न्याय और सुव्यवस्था बनाए रखने के लिए भी उचित है कि अन्यायी का प्रतिकार दंड से किया जाए, क्योंकि लातों के भूत बातों से नहीं मानते हैं । मधेसी समाज अपनी घिघियाने की प्रवृत्ति और निरीहता को प्रदर्शित कर शत्रुओं को आक्रमण के लिए उसी प्रकार आमंत्रित करता रहा है । मनुष्य कुछ हद तक तो सामान्य स्थितियों तक अन्याय को सहन कर सकता है, किंतु अन्याय सिर पर चढ़कर बोलने लगता है या आसमान को छूने लगता है तो सामान्य आदमी भी प्रतिकार करने के लिए खड़ा हो जाता है । साहित्यकार अपनी रचनाओं के माध्यम से प्रतिकार करते हैं तो वहीं योगी महात्मा अपनी वाणियों के माध्यम से अन्याय का विरोध करते हैं ।
साहित्य समाज का दर्पण है ऐसा हम सभी बचपन से पढ़ते, कहते और सुनते आए हैं । दर्पण में वैसा ही दिखता है ,जैसा होता है । भक्तिकालीन काव्य साहित्य के दर्पण में समाज का नैतिक, राजनीतिक, व्यवहारिक, वैज्ञानिक तथा कूटनैतिक पक्ष के विश्लेषण से भक्ति कालीन कवि भक्त होने के साथ–साथ एक सच्चे समाज सुधारक, लोक नायक, बेबाक वक्ता, राजनैतिक विश्लेषक भी थे । तुलसी के अतिरिक्त अन्य भक्त कवियों ने भी तात्कालिक अवस्थाओं , कुशासन पर प्रहार किया है परंतु जितनी विशद व्याख्या तुलसी के साहित्य में मिलती है उतनी अन्य जगह नहीं । तुलसीदास के समय में जो लुटेरों का शासन था भूमि हड़पना, मंदिर तोड़ना लुटपाट करना, उस लुटेरे शासन पर प्रहार करते हुए तुलसी कहते हैं–
एक तो कराल कलिकाल सूल मूल तामें,
कोढ़ में की खाज सी सनीचरी है मीन की,
वेद धर्म दूर गये, भूमि चोर भूप भये,
साधु सीधे मान जानि, रीति पाप पीन की ।
अर्थात एक तो अति वृष्टि और काल के कारण जनता पहले से ही दुखी है ऊपर से भूमि चोर लुटेरे आज राजा बन गए हैं । जिनके लिए राज धर्म का अर्थ केवल पाप रीति है, कुकृत्य है, अत्याचार है ।
राजनीति बिन धन बिन धर्मा ।
हरिहि समरपे बिन सतकर्मा । ।
विद्या विनुदु विवेक उपजाये ।
श्रम फल पढे किए और पाए ।
अर्थात राज्य और सत्ता तभी तक सुरक्षित है जब तक राजा नैतिक हो ,अनैतिक अधर्मी होने पर वह प्रजा के हृदय पर राज नहीं कर सकता । केवल व्यर्थ श्रम ही हाथ लगता है ।
जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी ।
सो नृप अवसि नरक अधिकारी ।
मुखिया मुख सो चाहिए, खान पान कहूं एक ।
पालहि पोषहि सकल अंग, तुलसी सहित विवेक ।
अर्थात राजा कैसा हो ? जिस तरह शरीर में मुख भोजन करता है परंतु शरीर के प्रत्येक अंग को उसकी आवश्यकता अनुसार भोजन वितरित कर के उसे पोषण प्रदान करता है ।
महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका किसी गुजराती व्यक्ति, जो दक्षिण अफ्रीका में रहते थे, का केस लड़ने गए थे । वहां वे कही जाने के लिए रेल के प्रथम श्रेणी का टिकट लेकर प्रथम श्रेणी के डब्बे में बैठे थे । उन्हें कुछ यूरोपियन लोगो ने सामान सहित प्रथम श्रेणी के डब्बे से नीचे फेंक दिया । उन्होंने वहां रह रहे भारतीय लोगो की दयनीय स्थिति देखी, वे किसी सभा में गए और भारतीय को अन्याय के खिलाफ विरोध करने का आह्वान किया । उस सभा ने उन्हें ही अपना नेता चुन लिया । फिर नए नए मुद्दों का सिलसिला चल पड़ा और गांधी जी लगभग २० वर्षों तक अफ्रीका में ही रह गए । बाद भी किसी नेता का नहीं रहा । जबतक मनुष्य खुद ही अपनी आँखों से या अपने जीवन मे अत्याचार नहीं देखता या भोगता है तब तक उसके भीतर की ज्वालाग्नी नहीं धधकती है । तब तक वह समझदारी के अनेक सिद्धांत झारते रहते हैं । हमारे मधेस के कांग्रेस और वामपंथ समर्थक उसी श्रेणी मे आते हैं । उन्हें मधेस शब्द में क्षेत्रीयता, विखंडता और सांप्रदायिकता का दुर्गंध झलकता है । वैसे उन नेताओ के हिसाब से तो ठीक ही है क्योंकि उनके संतान और अपनों के लिए सरकार ने रास्ते खोल रक्खे हैं । उन्हें बस आम नागरिकों को उनके अधिकार के विरुद्ध उन्हें ही तैयार करना है । जिस प्रकार भारतीय कांग्रेस ने हिन्दू के विनास के लिए हिन्दू कार्यकर्ताओं को ही सक्रिय कर रख्खा है ।
अतः सोचना और विचारना हमको है । वामपंथ और जेहादी मानसिकता से जब अमेरिका भयभीत होकर अपनी राष्ट्रीय नीतियों में घनघोर परिवर्तन कर रहा है । चीन भी इन उन्मादी मानसिकता से सतर्कता अपनाते हुए कड़ाई से नियंत्रण कर रहा है । भारत इन उन्मादियों, उग्रवादियों, आतंककारियों, जेहादियों और षडयंत्रकारियों से सैकड़ों वर्षों से सामाना करता या रहा है । लेकिन हम नेपाली अपनों से लड़ने का योजना बनाते हैं, अपनों को ही नष्ट करना चाहते हैं, अपनी ही शक्तियों को कमजोर कर आक्रांताओं को सम्मानित और शक्तिशाली बनाना चाहते हैं । अतः भाई फूटे गवार लूटे की स्थिति में हम नेपाली पहुंचते जा रहे हैं । महाभारत को स्मृति लाने का प्रयास कीजिए । पाँच गाँव के बदले पूरा साम्राज्य के साथ साथ वंश विनाश के भीषण तांडव को दूसरे को नहीं देखना पड़ा था ! हरेक कलह या कहें समस्या सुरुआत मे आती क्षीण, सामान्य ही होते हैं परंतु हम उसमे माल जल देकर सामुद्रिक तूफान का रूप दे देते हैं; और सामूहिक विनाश का लीला मंचन देखकर एक दूसरे को कोसते हैं । यह दूसरे को कोसना, दूसरे को दोषी ठहराना, दुसरेका शिकायत करना खुद के खलनायक होने का प्रमाण भी है । इस हेतु अपनी दृष्टि को आगे की ओर गतिशील रखें । धन्यवाद !

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