पड़ोसी कभी बदले नहीं जा सकते, उससे रिश्ते में तनाव पैदा करना सिर्फ पीड़ा ही देगा : श्वेता दीप्ति
राष्ट्रीयता ! राष्ट्रीयता ! राष्ट्रीयता !!! स्वाधीनता ! स्वाधीनता ! स्वाधीनता !!!
नागरिकता ! नागरिकता ! नागरिकता !!! दो साल पहले जब उसकी सात साल की बेटी
सर्पदंश से बेमौत मरी, क्या राष्ट्रीयता औषधि में अनूदित हुई ?
पिछले साल अकाल से बचने के लिए, बेटे के मुगलान चले जाने पर
क्या स्वाधीनता ने ‘मत जाओ’ कह कर रोका ?
इसी साल, बाढ़ से गाँव बह जाने पर
कहाँ नागरिकता घर बनकर खड़ी रह सकी ?
ये पंक्तियाँ उद्धृत हैं नेपाली कविता और गीत के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट स्थान और अलग पहचान बनाने वाले श्री दिनेश अधिकारी जी की काव्य संग्रह ‘संवेदना के स्वर’ से । इसी कविता की कुछ और पंक्तियाँ—
हर्कबहादुर भूख है
भूख का न कोई देश होता है न वेश, भूख का अपना पराया कोई नहीं होता
हर्कबहादुर चोट है
पीड़ा आकार में आबद्ध नहीं होती, पीड़ा की कोई सीमा और घरबार नहीं होता ।

काठमाण्डौ, ५,मई ,२०१५ | शायद उक्त पंक्तियों को पढ़ते हुए आपको लगे कि मैं ये बेमौसम का राग क्यों आलाप रही हूँ । किन्तु कभी कभी चंद पंक्तियाँ काफी होती हैं वस्तुस्थिति की तस्वीर खड़ी करने के लिए । भूख और जीवन की जदेजहद जब सामने होती है तो कुछ मायने नहीं रखता है । जीवन होगा तो राष्ट्र होगा राष्ट्रीयता होगी नहीं तो महज ये एक शब्द हैं और कुछ नहीं । खाली पेट और जर्जर शरीर जीवन ढूँढता है । ये चंद पंक्तियाँ हमारे देश को परिभाषित करती हैं । प्रकृति ने अपना रूप दिखाया । वक्त गुजर रहा है और गुजर भी जाएगा पर इस पीड़ा से हम सदियों तक नहीं उबर पाएँगे । बस एक सप्ताह पहले की बात है, जब हम और हमारी आँखें सिर्फ मददगार को तलाश रही थीं । उस वक्त हमारी राष्ट्रीयता, हमारी स्वाधीनता कुछ हमारे सामने नहीं थी, अगर कुछ था तो सिर्फ जिन्दगी की तलाश और ऐसे क्षण में सबसे पहला हाथ बढ़ा पड़ोसी राष्ट्र भारत का । आपदा के महज आधे घंटे के भीतर भारतीय प्रधानमंत्री मोदी ने आपातकालीन बैठक बुलाई और नेपाल के लिए हर सम्भव मदद देने की घोषणा की, महज धोषणा ही नहीं सबसे पहले राहत सामग्री वहाँ से आई । और आज फिर जब जीवन थोड़ी सी पटरी पर आई तो राजनीति का गन्दा खेल और अन्धराष्ट्रभक्ति से प्रेरित मन जी खोलकर भारत को गाली दे रहा है । वैसे ये कोई नई बात नहीं है । भारत को जितनी गाली दी जाय राष्ट्रीयता की पहचान उतनी ही अधिक प्रबल रूप में दिखती है । शायद राष्ट्रीयता की परिभाषा ही यही है । खैर, भारत सरकार के द्वारा बढ़ाए गए राहत और मदद को नहीं देख कथित राष्ट्रीयतावादी वहाँ की मीडिया को देख रहे हैं और जी खोलकर भारत विरोधी नारा लगा रहे हैं । जबकि मीडिया का काम होता है कि वो समाचार की प्रस्तुति ऐसे करे कि उनकी टीआरपी बढ़े और यह तो यहाँ की मीडिया भी कर रही है क्योंकि रोचक समाचार ही दर्शक देखना या सुनना पसन्द करते हैं । आपको भारतीय चैनल को नहीं देखना है मत देखिए, उसपर यकीन नहीं करना है मत करिए पर जो हकीकत आपके सामने है उस पर तो यकीन कीजिए । भारत का मीडिया प्राइवेट संस्था है वह भारत की सरकार और नीति को परिभाषित नहीं करता, वह सिर्फ अपनी टीआरपी देखता है । यह तो मानी हुई बात है कि पड़ोसी कभी बदले नहीं जा सकते । इसलिए उससे रिश्ते में तनाव पैदा करना सिर्फ पीड़ा ही देगा । आज उनके मदद के लिए बढ़े हुए हाथ को हम देखें जिनकी हमें जरुरत है । वक्त रिश्तों के बीच पुल बनाने का है दीवार खड़ी करने का नहीं ।
आज आवश्यकता है जिन्दगी को बचाने की, जो राहत हमें मिली है देश विदेश से उसे सही हाथ में पहुँचाने की । पीड़ित भूख और बदहाली से बेजार हो रहे हैं उन्हें कैसे बचाया और बसाया जाय यह वक्त उसका है ना कि खोखली भावनाओं को भड़काकर तनाव उत्पन्न करने का । सरकारी तंत्र में अभी तक वह सजगता नहीं आ पाई है जो आनी चाहिए । सहायता पर्याप्त मात्रा में है पर सरकारी तंत्र की सुस्ती की वजह से अबतक तेजी से कार्यान्वयन नहीं हो रहा है । और हमारा ध्यान यहाँ से हटाकर कहीं और केन्द्रित किया जा रहा है । इसलिए सावधान हो जायँ क्योंकि अपवाहों के पीछे भागकर कहीं हम अपने अधिकारों से वंचित ना हो जायँ और जो सहायता मिलने वाली है वो कहीं और ना चली जाय ।

