मुख्यमंत्री सतिशकुमार सिंह की चेतावनी: अब भी नहीं संभले तो भविष्य और भयावह होगा

जनकपुरधाम, 31 जुलाई। नागरिक में प्रकाशित अन्तर्वार्ता के आधार पर एक विश्लेषणात्मक रिपोर्ट । मधेश प्रदेश इन दिनों अभूतपूर्व सूखा और खड़ेरी (drought) की चपेट में है। असार २६ गते प्रदेश सरकार द्वारा संकटग्रस्त क्षेत्र घोषित किए जाने के बाद संघीय सरकार ने तीन महीनों के लिए मधेश को औपचारिक रूप से संकटग्रस्त घोषित किया है। इस कदम के बाद राहत और समाधान की पहलें तेज हुई हैं।
हाल ही में जनमत पार्टी के नेता तथा मधेश प्रदेश के मुख्यमंत्री सतिशकुमार सिंह ने काठमांडू में नागरिक फ्रन्टलाइन श्रृंखला में वरिष्ठ पत्रकार गुणराज लुइँटेल से विस्तृत संवाद करते हुए संकट के कारण, समाधान, और संघीयता की कार्यक्षमता पर गहरी बात की।
खड़ेरी का संकट: तत्काल प्रभाव और दीर्घकालीन खतरे
मुख्यमंत्री सिंह के अनुसार मधेश में इस बार खरीफ बुवाई का लगभग आधा हिस्सा प्रभावित हुआ है। न सिर्फ सिंचाई बल्कि पेयजल की भी चरम कमी है। कुछ क्षेत्रों में तो खेतों की फसलें सूख चुकी हैं और कई जगहों पर बुवाई हो ही नहीं सकी।
उन्होंने चेताया कि यदि जल्द बारिश नहीं हुई तो आने वाले दिनों में मधेश सिर्फ जलसंकट ही नहीं, भयंकर खाद्य संकट से भी जूझ सकता है।
संभावित समाधान और दीर्घकालीन योजना
मुख्यमंत्री ने सुझाव दिया कि सिर्फ बोरिङ (deep boring) समाधान नहीं है। जलभूतल की स्थिति गंभीर है – जहाँ पहले 100–150 फीट पर पानी मिल जाता था, अब 300 फीट तक सूखा है।
उनके समाधान के प्रमुख बिंदु:
रेनवाटर हार्वेस्टिंग को अनिवार्य बनाना
चुरे क्षेत्र में चेक डैम निर्माण
खेती के लिए वैकल्पिक फसलें (जैसे आलू, दाल, तिलहन) को बढ़ावा देना
सिंचाई के लिए नदियों का बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग, सतह को नीचा करने के लिए बालू और पत्थरों का निकासी
सुनकोशी-मरिन डाइभर्सन परियोजना की गति बढ़ाना
स्थानीय और संघीय निकायों की भूमिका
सिंह ने कहा कि तीनों तह — संघ, प्रदेश और स्थानीय सरकारों को समन्वयात्मक भूमिका निभानी होगी। उनका यह कहना भी बहुत महत्वपूर्ण था कि स्थानीय निकायों ने अपने अधिकारों का पूर्ण प्रयोग नहीं किया है, और बजट की भारी कमी भी प्रदेश सरकार की सीमाएं स्पष्ट करती है।
पेयजल आपूर्ति: फिलहाल सेना और अग्निशमन की जिम्मेदारी
बारा, पर्सा और अन्य प्रभावित जिलों में टैंकरों से पानी पहुंचाया जा रहा है। फायर ब्रिगेड, नेपाली सेना और वन विभाग की मदद से राहत पहुंचाई जा रही है। सिंह ने दावा किया कि 10–15 दिन में पेयजल संकट का समाधान कर लिया जाएगा।
जलवायु परिवर्तन और सरकार की तैयारी पर सवाल
मुख्यमंत्री ने स्वीकार किया कि इस संकट का एक बड़ा कारण विश्व तापमान में वृद्धि और जलवायु परिवर्तन है। साथ ही उन्होंने यह भी माना कि सरकार पार्याप्त मौसम विश्लेषण और पूर्वानुमान प्रणाली विकसित नहीं कर पाई।
नदीजन्य पदार्थों की लूट और चुरे का अतिक्रमण
मुख्यमंत्री ने गंभीर चिंता जताई कि चुरे संरक्षण समितियाँ तो बनीं, पर वे प्रभावकारी नहीं रहीं। 20 करोड़ के बजट से चुरे बचाया नहीं जा सकता। साथ ही, नदीजन्य पदार्थों की चोरी और जंगल की अंधाधुंध कटाई पर भी उन्होंने प्रशासनिक कमजोरी स्वीकारी।
प्रशासनिक अकर्मण्यता और संघीय प्रणाली की कमजोरी
सिंह का यह कथन गम्भीर विश्लेषण की मांग करता है कि “सरकार बदलने की अफवाह से कर्मचारी निष्क्रिय हो जाते हैं।” उन्होंने स्पष्ट रूप से प्रशासनिक ढांचे की कार्यक्षमता पर सवाल उठाया और संघीय प्रणाली के सात साल बाद भी पुलिस और वित्तीय अधिकारों की कमी पर चिंता व्यक्त की।
जनमत पार्टी और नेतृत्व का आंतरिक पक्ष
जनमत पार्टी में सिके राउत को एक आदर्श नेता के रूप में चित्रित करते हुए सिंह ने पार्टी के भविष्य और २०८४ चुनाव में मधेश प्रदेश में सबसे बड़ी पार्टी बनने का दावा किया। जयकान्त राउत को लेकर उठे सवालों का उन्होंने खंडन करते हुए कहा कि वह योग्यता और योगदान के आधार पर उपाध्यक्ष बने हैं।
मधेस-पहाड़ खाई पर सिंह का मत
मुख्यमंत्री का मानना है कि मधेस ने सदैव पहाड़ को स्वीकार किया, लेकिन पहाड़ ने मधेस को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया। उन्होंने कहा कि संपूर्ण एकता तभी मुमकिन है जब पहाड़ के लोग भी मधेसी नेताओं को उसी सहजता से स्वीकार करें जैसे मधेस ने किया है।
निष्कर्ष
मुख्यमंत्री सतिशकुमार सिंह की यह बातचीत केवल एक संकट की रिपोर्ट नहीं, बल्कि संघीयता, प्रशासन, पर्यावरणीय नीति, सामाजिक समरसता और राजनीतिक रणनीति का एक समग्र दस्तावेज है।
मधेस में खड़ेरी केवल एक मौसमीय आपदा नहीं, बल्कि नीतिगत विफलता, जलवायु परिवर्तन, और संसाधन प्रबंधन की परीक्षा भी है।
यदि सिंह के सुझावों और चेतावनियों को नीति निर्माताओं ने गंभीरता से नहीं लिया, तो आने वाले वर्षों में संकट और गहरा हो सकता है – न केवल मधेस के लिए, बल्कि पूरे देश के लिए।
यह संवाद उस विमर्श की आवश्यकता को दर्शाता है जिसमें पर्यावरणीय संकट को केवल “राहत” से नहीं, “नीति और संरचना” से हल किया जाए। मधेस को ‘अनाज भंडार’ कहने वाले देश को अब इस संकट से आँख चुराना महँगा पड़ सकता है।

