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कौन हैं देश की पहली महिला प्रधानमंत्री कार्की

 

काठमांडू, भादव २८ –  कंचना झा – जेन–जी के आंदोलन और विषम परिस्थिति में नेपाल की पहली महिला प्रधानमंत्री के रुप में पूर्व प्रधानन्यायाधीश सुशीला कार्की ने शपथ ले ली है । बहुतों ने उनके नाम का समर्थन किया है तो बहुतों ने विरोध भी किया लेकिन जेन – जी अपनी मांग पर अड़े रहे । सुशीला कार्की के नाम पर उन्होंने अपनी सहमति दी थी । आखिर युवाओं ने उन्हें ही क्यों इस पद के लिए चुना ? जबकी रेस में कुछ और लोग भी शामिल थे । प्रधानन्यायाधीश रहते हुए कार्की ने निष्पक्ष और संतुलित भूमिका निभाई, जिसके आधार पर वे युवाओं की पसंद बनीं । जानते हैं कौन हैं देश की पहली प्रधानमंत्री सुशीला कार्की ः –
प्रधानमंत्री सुशीला कार्की नेपाल की पूर्व प्रधानन्यायाधीश हैं । वे सर्वोच्च अदालत की पहली महिला प्रधानन्यायाधीश थीं, जिनकी सिफारिश तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की अध्यक्षता में बने संवैधानिक परिषद ने की थी । कार्की न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के खिलाफ शून्य सहिष्णुता की छवि के लिए जानी जाती हैं ।
कार्की का जन्म २००९ जेठ २५ (८ जून १९५२) को मोरंग जिले के विराटनगर स्थित शंखपुर में हुआ था । वह अपने पिता की सात संतानों में सबसे बड़ी हैं । उनका परिवार एक किसान परिवार था । वे विराटनगर में बीपी कोइराला के परिवार के बहुत करीब थे। हालाँकि सुशीला के पिता चाहते थे कि वह डॉक्टर बनें, लेकिन उन्होंने कानून की पढ़ाई चुनी । उनके पति दुर्गा सुबेदी प्रजातांत्रिक सेनानी हैं ।
सुशीला कार्की ने २०२८ (१९७१) में महेन्द्र मोरंग कैंपस से बी.ए., २०३१ (१९७४) में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में एम.ए. और २०३४ (१९७७) में त्रिभुवन विश्वविद्यालय से कानून में स्नातक की डिग्री प्राप्त की। उन्होंने २०४२ से २०४६ (१९८५–१९८९) तक महेन्द्र बहुमुखी कैंपस, धरान में अध्यापन भी किया ।
२०३५ (१९७८) में वकालत शुरू करने के बाद उन्होंने विराटनगर पुनरावेदन अदालत में बार अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी संभाली। २०६१ (२००४) में वे वरिष्ठ अधिवक्ता बनीं, २०६५ (२००८) में सर्वोच्च अदालत की अस्थायी न्यायाधीश और २०६७ (२०१०) में स्थायी न्यायाधीश नियुक्त हुईं। २०७३ (२०१६) में प्रधानन्यायाधीश बनीं कार्की ने लोकमानसिंह कार्की के खिलाफ मामले को पलट कर उन्हें अख्तियार दुरुपयोग अनुसन्धान आयोग (भ्रष्टाचार निरोधक आयोग) के प्रमुख पद से हटाया। इसके अलावा उन्होंने अनेक भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में फैसला सुनाया और कई चर्चित मामलों पर निर्णय भी दिए । उन्होंने तत्कालीन सूचना एवं संचार मंत्री जयप्रकाश प्रसाद गुप्ता को भ्रष्टाचार मामले में दोषी ठहराया था ।
जब वो प्रधानन्यायाधीश थी तभी उनके खिलाफ तत्कालीन सत्ता गठबंधन के सांसदों ने महाभियोग प्रस्ताव दायर किया था, जो असफल रहा था । १७ वैशाख २०७४ (३० अप्रैल २०१७) को सत्तारूढ़ गठबंधन के प्रमुख दल नेपाली कांग्रेस और नेकपा माओवादी केंद्र के २४९ सांसदों के हस्ताक्षर सहित यह प्रस्ताव संसद सचिवालय में दर्ज किया गया था। तत्क्षण उन्हें निलंबित करने का पत्र भी जारी किया गया।
नेकपा एमाले सहित विपक्षी दलों ने इस महाभियोग का विरोध किया। लेकिन संसद अवरोध के कारण प्रस्ताव पर संसद बैठक में सहज चर्चा नहीं हो सकी। २२ वैशाख (५ मई २०१७) को सर्वोच्च अदालत के न्यायाधीश चोलेन्द्र शमशेर राणा की पीठ ने अंतरिम आदेश जारी कर प्रस्ताव को निष्प्रभावी बना दिया और कार्की पुनः अदालत लौटीं।
वैसे तो कार्की कानून की विद्यार्थी थी लेकिन साहित्य में भी उनकी गहरी रुचि थी । उन्हें किताबें पढ़ने का बहुत शौख था । कार्की ने अपनी दो पुस्तकें प्रकाशित की हैं । उनकी पहली आत्मकथात्मक पुस्तक ‘न्याय’, आसोज २०७५ (१७) में प्रकाशित हुई थी और उनकी दूसरी पुस्तक उपन्यास ‘कारा’, मंगसिर २०७६ (१८)में प्रकाशित हुई थी ।
अपनी एक अन्तरवार्ता में उन्होंने कहा कि ः बिना संघर्ष के उच्च पदों पर पहुंचना कठिन है।
निडर, निष्पक्ष और मुखर कार्की को भ्रष्टाचार विरोधी कार्यकर्ता के रूप में भी जाना जाता है। यही कारण है कि मुख्य न्यायाधीश का पद छोड़ने के बाद से उन्होंने कोई राजनीतिक पदभार नहीं संभाला है । यह कार्यकाल उनके लिए चुनौतियों से भरा कार्यकाल रहेगा । लेकिन जेन जी को उन्होंने निराश नहीं किया है ।
देश अभी भी शोक में है । देश ने अपने ५५ युवाओं को खो दिया है उसके भार से देश झुका हुआ है । लोगों में एक उम्मीद, एक आशा का जन्म हुआ है आपके प्रधानमंत्री बनने से । जिस तरह आपने अपने प्रधानन्यायाधीश के पद के साथ न्याय किया था । उम्मीद है जनता के साथ भी आप न्याय कर सकेंगी ।

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