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वामपादोल्ल सल्लोहलता कण्टकभूषण। वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी॥

 

मां कालरात्रि अपने भक्त हेतु ब्रह्माण्ड की समस्त सिद्धियों की प्राप्ति के लिए राह खोल देती हैं। मां कालरात्रि का स्वरूप भयानक है लेकिन वह भक्तों को शुभ फल ही देती है। माता अपने भक्तों के लिए ब्रह्माण्ड की समस्त सिद्धियों की प्राप्ति के लिए राह खोल देती हैं। साधक के समस्त पाप धुल जाते हैं और उसे अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।

मां कालरात्रि का अद्भुत स्वरूप – मां का कालरात्रि स्वरूप अति भयावह व उग्र है। भयानक स्वरूप होने के बावजूद शुभ फल देने वाली मां कालरात्रि नकारात्मक, तामसी और राक्षसी प्रवृत्तियों का विनाश करके भक्तों को दानव, दैत्य, राक्षस, भूत-प्रेत आदि से अभय प्रदान करती हैं। मां का यह रूप ज्ञान और वैराग्य प्रदान करता है। घने अंधेरे की तरह एकदम गहरे काले रंग वाली, तीन नेत्र वाली, सिर के बाल बिखरे रखने वाली और अपनी नाक से आगे की लपटों के रूप में सांसें निकालने वाली कालरात्रि, मां दुर्गा का सातवां विग्रह स्वरूप हैं। इनके तीनों नेत्र ब्रह्माण्ड के गोले की तरह गोल हैं। इनके गले में विद्युत जैसी छटा देने वाली सफेद माला सुशोभित रहती है। इनके चार हाथ हैं।

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इनका वाहन गधा है। ये स्मरण करने वाले को शुभ वर प्रदान करती हैं। उनकी रक्षा के लिए हथियार भी रखती हैं। योगी साधकों द्वारा कालरात्रि का स्मरण ‘सहस्त्रार’ चक्र में ध्यान केंद्रित करके किया जाता है। कालरात्रि मां के चार हाथों में से दो हाथों में शस्त्र रहते हैं। एक हाथ अभय मुद्रा में तथा एक वर मुद्रा में रहता है। दाहिनी ओर का ऊपर वाला हाथ हंसिया अथवा चंद्रहास खड्ग धारण करता है जबकि नीचे वाले हाथ में कांटेदार कटार रहती है। मां का ऊपरी तन लाल रक्तिम वस्त्र से तथा नीचे का आधा भाग बाघ के चमड़े से ढका रहता है।

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मां कालरात्रि का भोग एवं साधना मंत्र – नवरात्रि के सातवें दिन मां दुर्गा के इस रूप की पूजा-अर्चना कर गुड़ का नैवेद्य अर्पित करने से साधक को शोकमुक्त रहने का वरदान प्राप्त होता है और भक्तों के पास दरिद्रता नहीं आती। मां कालरात्रि की कृपा प्राप्त करने के लिए नवरात्रि के सातवें दिन यानी की सप्तमी तिथि को ॐ देवी कालरात्र्यै नमः।। साधना मंत्र का जाप अवश्य करना चाहिए।

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