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युवाओं की लाश पर लिखा इतिहास : कंचना झा

 

कंचना झा, हिमालिनी अंक सितम्बर 025 । देश में एक नए अध्याय की शुरुआत तो हुई लेकिन जिस कीमत पर इस अध्याय को लिखा गया उसे सोचकर भी मन भारी हो जाता है । इस आंदोलन या कहें जेन –जी के प्रदर्शन ने बहुत कुछ छीन लिया है नेपाल से । जितने भी भवनों को आग लगाई लगी उन सभी को बनाने में कितना समय , कितनी मेहनत और न जाने कितने पैसे लगे हैं ? बनने में कम से कम दो चार साल लगे लेकिन जलकर राख होने में एक दिन भी नहीं लगा । अरबों की क्षति हुई है । लोगों का मनोबल कम हुआ है । लोग डरे सहमें से थे आंदोलन के समय । कुछ अनिष्ट होने का अंदाजा जैसे लग गया था । जिनके बच्चे पलटकर घर नहीं गए उन माँओं की अवस्था क्या होगी अभी ?

वैसे कहने वाले तो यही कहते हैं कि आप इतिहास पलटकर देखें जब भी देश में परिवर्तन हुआ है सत्ता परिवर्तन हुआ है तो रक्तपात हुआ ही है । अब तक ७२ लोगों के शव मिल चुके हैं न जाने कितने और होंगे । कितने लोग लापता हैं । उनके माता पिता अब भी एक आश में बैठ हैं कि कहीं से उनका बच्चा वापस आ जाए । जेन –जी ने भी यह नहीं सोचा होगा कि बात इस कदर बढ़ जाएगी । आंदोलन यह रूप ले लेगा ऐसा सोचकर तो वो भी नहीं आए थे ।

जेन–जी पीढ़ी और आम जनता भी यही कह रही है कि आंदोलन में घुसपैठ हुई । जिसका हर्जाना पूरे नेपाल को भुगतना पड़ा । जिस तरह रामायणकाल में लंका धू–धू कर जली पूरा देश भी इसी तरह जला । देश की जनता ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि देश इस तरह से जलेगा । अभी तक यह पूरी तरह से यह जानकारी नहीं मिल पाई है कि आखिर कितनी क्षति हुई है । अभी तक केवल अनुमान ही लगाया जा रहा है कि अरबों की क्षति हुई है ।
इतनी क्षति होने के बावजूद लोगों में एक संतुष्टि भी है कि कम से कम ओली, देउवा, प्रचंड, आरजू के साथ जो हुआ वो अच्छा हुआ । इन्होंने जनता को जनता समझना बंद कर दिया था । स्वयं को ईश्वर का अवतार मानने लगे थे । उन्हें लगने लगा था कि वो जो चाहेंगे वहीं होगा । बार–बार ८४ का दंभ भर रहे थे । ८४ के चुनाव का इंतजार कर रहे थे । ओली को लग रहा था कि जनता उनके अलावे किसी दूसरे को सोच ही नहीं रही है । जबकि कई बार ऐसा हुआ कि उनके ही कार्यक्रम में युवाओं ने खुलकर उनके खिलाफ नारे लगाए थे । जिसे उन्होंने अनदेखा किया था ।

कारण तो बहुत से थे आंदोलन के लेकिन मुख्य कारण नेताओं के प्रति असन्तुष्टि ही थी । ये असंतुष्टि केवल युवाओं में ही नहीं थी देश की हर उस जनता में थी जो अपने देश में रहना चाहते हैं । अपने देश से प्रेम करते हैं ।
हाँ ये सच हैं कि हमने ही उन्हें चुनकर भेजा था लेकिन उन्होंने जनता की पीड़ा को अनदेखा किया था । बारंबार उनका विरोध खुलकर किया जा रहा था लेकिन सत्ता के दंभ ने, अहंकार ने सबकी आँखों पर पर्दा डाल दिया । जब तक आँख खुलती तब तक सब कुछ तहस–नहस हो गया था । कुटिल मुस्कान भरने वाले, कहवी में प्रख्यात ओली ने कब जगह छोड़ दी पता ही नहीं चला । लेकिन शेर बहादुर देउवा और उनकी पत्नी आरजू जब युवाओं के हाथ लगे तो उन्होंने इस दंपति को नहीं छोड़ा । युवाओं की स्पष्ट आवाज आ रही है कि – कैसा लग रहा है ? अब पता चला जब युवा जागते हैं तो क्या होता है ? कितना आक्रोश था युवाओं में । लेकिन जेन –जी का कहना है कि घुसपैठ हुई इसलिए यह सब हुआ ।

अब कहीं न कहीं यह भी लग रहा है कि हमने इतिहास तो रचा लेकिन बहुत बड़ी कीमत चुकाकर । उन्होंने यह नहीं सोचा था कि युवाओं के लाश पर यह इतिहास लिखा जाएगा । हाँ एक बहुत बड़ी उपलब्धि जो हमें मिली है वह यह की इस आंदोलन के बदौलत नेपाल को पहली महिला प्रधानमंत्री मिली हैं । महिला का प्रधानमंत्री बनना तो एक सपने जैसा था नेपाल में । ये देउवा, ओली, प्रचंड के अलावे चौथा चेहरा किसी को नजर ही नहीं आ रहा था ।
वैसे पिछले कुछ दिनों से ओली कह रहे थे कि वो महिला को ही प्रधानमंत्री बनाएंगे । वो नाम तो नहीं ले रहे थे लेकिन इस बात पर जोर दे रहे थे । शायद उनकी ही बोली लग गई और आज नेपाल की पहली महिला प्रधानमंत्री के रूप में सुशीला कार्की मिली है ।
पूर्वप्रधान न्यायाधीश सुशीला कार्की के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार को जो नेपाल मिला है, जिसकी वो अभिभावक बनी हैं वो अभी बहुत सदमे में है । वो नाराज है, आक्रोश में है , गुस्से में है । उन्हें बहुत संभल कर काम करना होगा । उनके सामने बहुत सी गंभीर चुनौतियां हैं । उनके लिए यह सफर बहुत कठिन भी हो सकता है । देखने में जितना सहज और सरल लग रहा है उतना सहज नहीं है । जनता को उनसे बहुत सी अपेक्षाएं हैं जिनपर उन्हें खरा उतरना है ।
जेन जी की वो पसंद हैं । जेन जी ने उन्हें चुना है तो एक विश्वास लेकर चुना है । जनता को, यहाँ के युवाओं को उनपर बहुत विश्वास है । उनके अतीत का अनुभव, साफ–सुथरी छवि और न्यायिक पृष्ठभूमि को देखते हुए जनता ने उनसे बड़ी उम्मीदें लगा रखी हैं ।

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उनके सामने कुछ मुख्य चुनौतियां हैं जो इस प्रकार हैं ः –

नेपाल की वर्तमान राजनीतिक अवस्था अस्थिर और विभाजित है। बड़े दलों के बीच अविश्वास, सरकार गिराने का खेल और संसद भंग होने का इतिहास नई सरकार को अस्थिर करने का खतरा पैदा करता है । शांति की बात आ रही है , सुरक्षा की बात आ रही है । कार्की की गैर–राजनीतिक पृष्ठभूमि के कारण दलों के बीच सहमति बनाना कठिन हो सकता है ।
इतना ही नहीं कथित बड़े दलों के नेताओं का जो इतना अपमान हुआ है तो क्या वो चुप बैठ जाएंगे ? आज वो चुप हैं लेकिन कल वो चुप नहीं रहेंगे । जेन –जी ने जिस भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए यह आंदोलन किया उसमें भी यही देखा गया कि वहाँ भी भ्रष्टाचारी हैं । वहाँ भी चोर हैं । गुंडा बदमाश है । इस आंदोलन से यह तो समझ में सभी को आ गया है कि यहाँ कोई ईमानदार नहीं है । उदाहरण के लिए प्रधानमंत्री के चुनाव को लिया जा सकता है । कितना समय लगा एक स्वच्छ और ईमानदार चरित्र को खोजने में । जो भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने निकले थे वही समय आया तो सामान लेकर भागने लगे । जेन –जी की पसंद को लेकर भी विरोध के स्वर उठने लगे हैं । ऐसे में यह एक बहुत बड़ी चुनौती है प्रधानमंत्री के समक्ष की वो इन हालातों का सामना कैसे करेंगी ?
नेताओं के मनोविज्ञान को हमने जान लिया है समझ लिया है तो कुछ जेन –जी को भी समझा है । सभी अवसर की तलाश में हैं । जेन –जी ने भी वही किया जो हमारे नेता करते हैं । अंतर केवल इतना कि नेता बड़े स्तर की चोरी करते हैं और जेन जी ने छोटे स्तर पर चोरी की । चोरी चोरी होती है चाहे कोई भी करें । देश का जो ये मनोविज्ञान बन गया है उससे निजात दिलाने में प्रधानमंत्री को चुनौतियों का सामना करना होगा । सुधरने में समय लगेगा ।
आंदोलन में जिन बच्चों की जान गई, उनके परिवार को लेकर, प्रधानमंत्री किस तरह का कदम उठाएगी ? इस पर सबकी निगाहें बनी हुई है । अभिभावकों के इस दुख के समय में वो कितना ढांढस बंधा सकती हैं  ? क्या पहल कर सकती हैं ? इस आंदोलन के बहाने जिन लोगों ने इस तरह का हिंसा किया उसकी तलाश में वो क्या भूमिका निभाएंगी ? उन्हें क्या सजा दें पाएंगी प्रधानमंत्री ? क्योंकि जिन्होंने अपने बच्चों को खोया है उनकी तो यह मांग ही है कि दोषी को कड़ी से कड़ी सजा मिले । यह कहकर नहीं छोड़ा जा सकता है कि आंदोलन में कुछ भी हो सकता है । इतना ही नहीं आंदोलन के नाम पर लूटपाट, चोरी और गुंडागर्दी भी हुई है । इन सबको ढूंढना आसान नहीं होगा । ये भी बहुत बड़ी चुनौती है उनके सामने ।

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हालांकि शुरुआत उन्होंने कर दी है । पहले ही दिन वो घायलों से मिलने के लिए ट्रामा सेंटर गई और उन बच्चों, युवाओं से उनका हाल चाल पूछा ।
फिलहाल देश की सरकार में कोई और दल शामिल नहीं है । लेकिन सरकार संचालन के लिए विभिन्न दलों का समर्थन जरूरी होगा । वैसे तो प्रधानन्यायाधीश रही सुशीला स्पष्ट और कड़ा स्वभाव के कारण भ्रष्टाचार और सत्ता के खेल में डूबे नेता असहज तो होंगे लेकिन कार्की को भी सावधान रहना होगा । गठबंधन दलों के अपने–अपने स्वार्थ और सौदेबाजी की राजनीति बड़ी चुनौती बनेगी ।
जेन –जी का सबसे बड़ा और पहला मुद्दा है भ्रष्टाचार नियंत्रण और सुशासन । आम जनता में अभी यही बातें चल रही है कि कैसे भ्रष्टाचार से मुक्ति मिलेगी ? इसे पूरी तरह से खत्म करना है । सुशीला कार्की की पहचान ही भ्रष्टाचार के प्रति शून्य सहिष्णुता है । लेकिन नेपाली राजनीति में गहराई तक जड़ जमा चुके भ्रष्टाचार को खत्म करना आसान नहीं है । उन्हें बहुत से विरोधों का सामना करना पड़ेगा ।
स्थिर सरकार को लेकर भी चर्चा चल रही है । जनता इस बारी– बारी की सरकार से तंग आ चुकी है । उसे स्थिर सरकार चाहिए । क्योंकि अभी तक तो एक खेल ही चल रहा था । एक सरकार आती । अपने तरीके से कुछ नियम कानून बनाती । काम शुरू होता है कि सरकार गिर जाती । कुछ ही दिन बाद दूसरी सरकार आती । पहले के सरकार द्वारा बनाएं गए सभी नियमों को ताख पर रख देती । नई सरकार नए तरीके से काम की शुरुआत करती । अभी अच्छे तरीके से शुरुआत हुई भी नहीं कि सरकार गिर गई । न पहली सरकार काम कर सकी न दूसरी कर सकी । स्थिर सरकार नहीं होने की वजह से भ्रष्टाचार को भी बढ़ावा मिला और जनता में नाराजगी फैली । इस ओर हमारी प्रधानमंत्री का ध्यान अवश्य जाएं । स्थिर सरकार बहुत बड़ी चुनौती है उनके लिए ।

इसी तरह संविधान कार्यान्वयन और संघीयता को सुदृढ़ करना भी एक चुनौती है । प्रदेश सरकार, स्थानीय निकाय और संघीय सरकार के बीच अधिकारों का विवाद अभी समाप्त नहीं हुआ है । बजट को लेकर हर बार असंतुष्टि जताई जाती है प्रदेशों द्वारा । प्रदेश और स्थानीय स्तर को अधिकार हस्तांतरण, बजट वितरण और नीतियों में स्पष्टता लाना नई सरकार के लिए बहुत बड़ी चुनौती होगी ।
आर्थिक संकट से जूझ रही जनता और बेरोजगारी से परेशान युवा वर्ग, विदेशी रोजगार पर निर्भरता, महंगाई और निवेश की कमी अभी की अर्थव्यवस्था की गंभीर समस्याएँ हैं । फिर उनकी पृष्ठभूमि न्यायिक पृष्ठभूमि है जिसके कारण आर्थिक नीति में उनका अनुभव सीमित है, जिससे व्यावहारिक समाधान के लिए विशेषज्ञ टीम की आवश्यकता बढ़ेगी । विशेषज्ञ टीम का चुनाव भी अपने आप में एक चुनौती होगी उनके लिए ।
मधेश की जनता को हमेशा एक शिकायत रही है केन्द्र से कि उसे दूसरे दर्जे का माना जाता है । उसकी अपनी पहचान है जिसके लिए मधेश की जनता लड़ती आई है । संघीयता, पहचान और अधिकार के मुद्दे अब भी संवेदनशील हैं । मधेश आंदोलन की मांगों, थरुहट÷जनजातीय अधिकार, सीमावर्ती राजनीति जैसे मामलों में समावेशी दृष्टिकोण अपनाना जरूरी होगा । मधेश की जो अपेक्षाएं हैं उसमें कार्की कैसे अपने आप को सफल कर सकेंगी यह भी चुनौती उनके सामने है ।
पहले की सरकारों ने जनता की मांग को अनदेखा किया है । जिसका हर्जाना उन्हें भुगतना पड़ा है । प्रधानमंत्री कार्की को अपनी जनता का भरोसा और विश्वास जीतना होगा । इसमें वो कितनी सफल होंगी ? उन्हें जनता के मांगों का ध्यान रखना है ।

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इसके साथ ही आने वाले चुनाव में उन्हें एक बहुत बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ेगा । आम जनता खुलकर कह रही है कि फागुन में चुनाव होता है तो इस बार केवल युवाओं को ही अवसर मिले । जेन– जी के आंदोलन में खुलकर नाम लेकर कहा गया कि नहीं चाहिए देउवा ओली, नहीं चाहिए प्रचंड । तो इन्हें कैसे रोका जा सकता है ? इस विषय को लेकर कुछ लोगों ने मीडिया में कहा कि सबसे पहला विद्रोह उनके अपने पार्टी के लोग करें । वो ही आवाज उठाएं कि अब आप आराम करें हमें अवसर दें देश की सेवा करने की । आम जनता अपने समूहों में कह रही है कि नीति नियम ही कुछ ऐसा बने कि ये कथित नाम चुनाव नहीं लड़े । प्रधानमंत्री कार्की पसंद हैं जेन –जी की तो उनकी इस मांग को वो कैसे पूरा कर पाएंगी ? कैसे इस चुनौती से बाहर निकलेंगी प्रधानमंत्री ? इसके लिए तो यही कहा जा सकता है कि पिक्चर अभी बाकी है।
ये तो हुई चुनौतियां । अब आम लोगों के द्वारा कुछ सुझाव भी दिए गए हैं प्रधानमंत्री कार्की को जो इस तरह से हैं ः –
सबसे पहला ही सुझाव है भ्रष्टाचार को लेकर, कि भ्रष्टाचार पर नियंत्रण कैसे हो ?, तो इसके लिए पारदर्शिता को मजबूत करना होगा और सरकारी तंत्र में जवाबदेही सुनिश्चित करने की प्रतिबद्धता को पहले ही दिन से व्यवहार में प्रदर्शित की जानी होगी ।

विरोध प्रदर्शन के दौरान हुई मौतों, चोटों और क्षति के बारे में सच्चाई का पता लगाने के लिए एक निष्पक्ष न्यायिक जांच आयोग का गठन किया जाना चाहिए।
देश में शांति, सामाजिक सद्भाव और सौहार्द बनाए रखने के लिए सभी पक्षों को बातचीत और सहयोग में लाने की पहल की जानी चाहिए । एक व्यवस्था यह भी की जानी चाहिए कि विरोध प्रदर्शनों से प्रभावित परिवारों को उचित मुआवजा, उपचार और न्याय तक पहुंच प्रदान की जाए ।

संभव हो तो देश को विकास की ओर उन्मुख करें । हालांकि यह सभी जानते हैं कि इसमें कुछ समय लगेगा । ये एक दिन में होने वाली बात नहीं है । समय लगेगा क्योंकि कुछ भी नामुमकिन नहीं है ।
सुशीला कार्की पर जनता का भरोसा है, लेकिन अगर जेन जी और जनता के अनुसार काम नहीं हुआ तो एक आंदोलन और हो सकता है । देश एक और आंदोलन के लिए तैयार नहीं है ।
बहुत सावधानी से कार्की को चलना होगा क्योंकि जो दल अभी देश के पन्ने पर नहीं है उनमें भी बहुत असंतुष्टि होगी ? अभी भी वो यही कहेंगे कि उन्हें जनता चुनकर लाई है । इसलिए उनसे भी सावधान रहना होगा ।
जिस विश्वास के साथ युवाओं ने उन्हें चुना है यह विश्वास ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है । इस ताकत को बरकरार रखना है उन्हें । सुशीला कार्की की अपनी एक अलग ही छवि है जो उन्हें सफल बना सकती है । उनकी ताकत है—ईमानदारी, निर्भीकता और न्याय का प्रतीक। लेकिन आम जनता में यह डर है कि कहीं यही छवि राजनीति के खेल में उनकी कमजोरी न बन जाए ।
सफल होने के लिए उन्हें संवाद क्षमता, व्यावहारिक राजनीतिक कौशल, दलगत संतुलन और आर्थिक सुधार की ठोस योजनाएं जल्द से जल्द प्रस्तुत करनी होंगी । जनता कार्की से केवल “साफ–सुथरी सरकार” ही नहीं, बल्कि स्थिरता और परिणाम देने वाली शासन व्यवस्था की अपेक्षा कर रही है । वो कितनी सफल होती हैं ये तो भविष्य ही बातें हैं ।

कंचना झा
कार्यकारी संपादक,
हिमालिनी ऑनलाइन, www.himalini.com

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