दिल्ली का जंतर मंतर और काठमाण्डु का माइतीघर मण्डला* एक तात्विक विश्लेषण : डा. विजय दत्त
*मोदी जी का वैश्विक संदेश:*
राष्ट्रवाद के सामने धराशायी हुए डीप स्टेट के तंत्र मंत्र

डा. विजय दत्त, काठमांडू, 27 जुलाई *पृष्ठभूमि* –
भारत/हिन्दुस्तान का प्राचीन इतिहास अत्यंत समृद्ध और विविध है, जिसकी शुरुआत सिंधु घाटी सभ्यता,लगभग 2500 ईसा पूर्व, के उन्नत नगर नियोजन और व्यापारिक कौशल से होती है। इसके बाद वैदिक काल में श्रुति-स्मृति वेदों की रचना हुई और सामाजिक तथा धार्मिक नींव मजबूत हुई, जिसने आगे चलकर छठी शताब्दी ईसा पूर्व में जैन और बौद्ध धर्म जैसी बौद्धिक क्रांतियों को जन्म दिया। इसी दौर में मगध महाजनपद का उत्कर्ष हुआ, जिसके परिणामस्वरूप मौर्य साम्राज्य की स्थापना हुई और *सम्राट अशोक* के शासनकाल में अहिंसा और बौद्ध धर्म का वैश्विक प्रसार हुआ। इसके पश्चात, गुप्त काल,4वीं से 6वीं शताब्दी ईस्वी, को भारत का *’स्वर्ण युग* माना जाता है, जिसमें विज्ञान, गणित, खगोलशास्त्र, कला और साहित्य के क्षेत्र में अद्वितीय प्रगति हुई। भारत का यह स्वर्णिम अतीत न केवल इसके विशाल साम्राज्यों की कहानी है, बल्कि यह वह दौर था जिसने अपनी अनूठी संस्कृति, दर्शन और ज्ञान परंपरा से संपूर्ण विश्व को प्रभावित किया था ।
*भारत मे आक्रान्ता का इतिहास* अद्भुत सहनशीलता और पुनर्निर्माण की गाथा है, जिसने मुगलों के आठ शताब्दियों के क्रूर आक्रमणों, धार्मिक उत्पीड़न और सांस्कृतिक विनाश के साथ-साथ दो सौ वर्षों के ब्रिटिश साम्राज्यवादी शोषण, आर्थिक लूट और सामाजिक विभाजन को झेला है। विदेशी ताकतों ने लगातार भारत की आत्मा को कुचलने, इसकी विशाल धन-संपदा को लूटने और इसके गौरवशाली सनातन ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने का प्रयास किया। इन शताब्दियों लंबे भयानक अत्याचारों, अनगिनत बलिदानों और अभूतपूर्व संघर्षों के बावजूद, भारत की सभ्यतागत चेतना कभी पराजित नहीं हुई; वह हर बार अपने धर्म, अदम्य साहस और राष्ट्रीय स्वाभिमान के बल पर उठ खड़ी हुई और आज एक शक्तिशाली, स्वाभिमानी राष्ट्र के रूप में विश्व पटल पर विराजमान है। अखण्ड भारत मे मुगलौ अौर ब्रिटिश का प्रवेश कुछ भारत का ही कुछ अराष्ट्रवादी गद्दारौ के कारण ही हुआ था अौर हजारौ बर्षौ तक राज्य किया था ।
*स्वतन्त्रता के बाद का इतिहास*
1947 से 2013 के दौरान स्वतंत्रता के बाद की शैक्षणिक और सांस्कृतिक नीतियों के संदर्भ में भारतीय सनातन परंपराओं और आत्मिक विरासत की उपेक्षा के गंभीर आरोप लगते रहे हैं। इतिहासकारों और सांस्कृतिक विचारकों के अनुसार, स्वतंत्रता के बाद बनाई गई शिक्षा प्रणाली और शैक्षणिक संस्थाओं, जैसे NCERT,के ढांचे में प्राचीन भारतीय दर्शन, ज्ञान परंपरा, वैज्ञानिक चेतना और सनातनी मूल्यों को मुख्यधारा से दूर रखा गया। औपनिवेशिक मानसिकता के निरंतर प्रभाव और वामपंथी इतिहास लेखन की प्राथमिकता के कारण भारतीय इतिहास के उज्ज्वल सांस्कृतिक पृष्ठों को सीमित कर दिया गया, जिससे भावी पीढ़ियों का अपनी मूल सांस्कृतिक जड़ों, सनातन प्रतीकों और आत्मिक पहचान से अलगाव हुआ।
बहुआयामिक और संस्थागत दृष्टिकोण से देखा जाए तो ‘धर्मनिरपेक्षता’ (Secularism) की जिस अवधारणा को लागू किया गया 1975 मे,उसकी आलोचना ‘एकपक्षीय दृष्टिकोण’ के रूप में की जाती है। 1950 के दशक में *’हिंदू कोड बिल*’ लाकर सनातनी सामाजिक और धार्मिक परंपराओं में कानूनी सुधार किए गए, जबकि अन्य समुदायों के व्यक्तिगत कानूनों को अस्पर्शित छोड़ दिया गया। इसके अलावा, राज्य सरकारों द्वारा हिंदू मंदिरों के प्रबंधन और उनकी संपत्तियों पर नियंत्रण (Religious Endowments Acts) की नीति ने धार्मिक स्वतंत्रता के संतुलन को प्रभावित किया। राम सेतु विवाद, प्राचीन तीर्थस्थलों के जीर्णोद्धार के प्रति उपेक्षा और राष्ट्रीय आख्यानों में सनातन सांस्कृतिक ताने-बाने को गौण करने के प्रयासों ने देश के सामाजिक और आत्मिक जीवन को गहराई से प्रभावित किया।
*वास्तविक स्वतन्त्रता*-
2014 से 2026 के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने वैश्विक पटल पर अभूतपूर्व प्रगति की है। विश्लेषकौ के अनुसार,यही से शुरु होती है भारत कि असली स्वतन्त्रता का युग । वैसे तो श्रद्धेय अटल जी के समय भी स्वर्णीम था मगर बहुत कम समय के लिए । भारत मे सांस्कृतिक, अध्यात्म और वैदिक धरोहर के पुनरुद्धार के माध्यम Soft Power को नई ऊँचाइयाँ मिली हैं। काशी विश्वनाथ धाम, अयोध्या में श्री राम मंदिर का निर्माण, उज्जैन का महाकाल लोक और योग दिवस,21 जून, का वैश्विक प्रसार इस बात के प्रमाण हैं कि भारत ने अपनी प्राचीन वैदिक ज्ञान-परंपरा और आध्यात्मिक पहचान को आधुनिक विश्व के समक्ष गर्व से प्रस्तुत किया है। इसके साथ ही, सामाजिकआर्थिक क्षेत्र में डिजिटल इंडिया, UPI और AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) की क्रांति ने भारत को वैश्विक प्रौद्योगिकी का केंद्र बना दिया है। *सबका हाथ,’सबका साथ, सबका विकास’* के मंत्र के साथ करोड़ों नागरिकों का सशक्तिकरण हुआ है, जिससे भारत दुनिया की प्रमुख आर्थिक महाशक्तियों में मजबूती से स्थापित हुआ है।
*कूटनीतिक (Diplomatic) मोर्चे* पर भारत ने गुटनिरपेक्षता से आगे बढ़कर *राष्ट्र-प्रथम*( Nation First)’ की नीति अपनाई है, जिसने वैश्विक संतुलन में देश की भूमिका को अनिवार्य बना दिया है। G-20 की सफल अध्यक्षता, ग्लोबल साउथ की मुखर आवाज़ बनने और रक्षा व प्रौद्योगिकी साझेदारी के बल पर भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) और G-7 जैसे प्रमुख वैश्विक मंचों पर अपनी दावेदारी को अत्यंत सुदृढ़ किया है। रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में प्रमुख विकल्प के रूप में उभरना और AI के क्षेत्र में वैश्विक नियम-निर्धारण में अग्रणी भूमिका निभाना भारत के बढ़ते दबदबे को दर्शाता है। आज वैश्विक नीतियों और संकटों के समाधान में भारत की सहमति निर्णायक मानी जाती है। अन्तरिक्ष मिसन शतप्रतिशत सफल रहा है ।
इस बहुआयामी प्रगति का ही परिणाम है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर विश्व के सबसे लोकप्रिय नेता के रूप में लगातार शीर्ष पर बने हुए हैं। Morning Consult जैसे वैश्विक सर्वेक्षणों में उनकी स्वीकृति दर (Approval Rating) लगातार दुनिया के अन्य सभी राष्ट्राध्यक्षों से अधिक रही है। रूस-यूक्रेन संघर्ष हो या वैश्विक जलवायु वार्ता, दुनिया के प्रमुख नेता भारत के दृष्टिकोण और नेतृत्व का सम्मान करते हैं। 2014 से 2026 का यह कालखंड केवल नीतियों का नहीं, बल्कि भारत के प्रति विश्व के दृष्टिकोण के परिवर्तन का काल रहा है, जिसने देश को *विश्वगुरु* और वैश्विक व्यवस्था के प्रमुख आधार स्तंभ के रूप में पुनर्स्थापित किया है। भारत आर्थिक विकास के तीसरे स्थान पर जाने कि पुर्ण तैयारी कर ली है । शान्ति सुरक्षा, सुशासन, रोजगारी, उत्पादन सबमे आगे ।
*भारत मे कथित Gen Z प्रोटेस्ट*
संसार के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत की राजनीति में जब-जब कोई बड़ा मोड़ आता है, तब-तब उसकी गूँज देश की सीमाओं को पार कर वैश्विक पटल पर सुनाई देती है। हाल ही में बाहिरी स्रोत से संचालित तथा देश के भितर की दलालो अौर Deep state के सहारे दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शनों, उसके पीछे की भू-राजनीतिक साजिशों और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिए गए संदेश ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि भारत की जनता विशेषकर उसकी स्वाभिमानी GenZ ,युवा पीढ़ी,अब भ्रम नहीं, बल्कि राष्ट्र प्रथम की नीति के साथ मजबूती से खड़ी है।
1. *प्रधानमंत्री का वीडियो संदेश: जन-समर्थन का नया वैश्विक कीर्तिमान*
जंतर-मंतर के घटनाक्रमों के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वीडियो संदेश महज एक राजनीतिक वक्तव्य नहीं था, बल्कि यह भारत के आत्मविश्वास का शंखनाद था। विश्व के सबसे लोकप्रिय नेता के रूप में स्थापित नरेंद्र मोदी के इस संदेश ने डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर देखने, साझा किए जाने और जुड़ाव (engagement) के पिछले सभी वैश्विक रिकॉर्ड तोड़ दिए। पचास करोड से ज्यादा का प्रथम विश्व रेकर्ड है ।
इस संदेश की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि देश की स्वाभिमानी GenZ पीढ़ी ने इसका पूर्ण समर्थन किया। जो युवा डिजिटल दुनिया का सबसे समझदार हिस्सा हैं, उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि वे किसी प्रायोजित नैरेटिव के झांसे में आने वाले नहीं हैं।
2. *दो प्रदर्शनों का विरोधाभास: जंतर-मंतर Vs माइतीघर मंडला*
हालिया घटनाक्रमों में दो पड़ोसियों -भारत और नेपाल के विरोध प्रदर्शनों का अंतर अत्यंत सूक्ष्म और विचारणीय है:-
*दिल्ली का जंतर-मंतर:* जहाँ विरोध के नाम पर कुछ तत्वों द्वारा सनातन धर्म, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और राष्ट्र-निर्माण से जुड़े मूल्यों को निशाना बनाया गया। विरोध का स्तर असहमति से हटकर ‘भारत तोड़ो’ की मानसिकता तक पहुँचता दिखा।
*नेपाल का माइतीघर मंडला:* दूसरी ओर, नेपाल के माइतीघर मंडला में होने वाले आंदोलनों में जब जनता सड़क पर उतरती है, तो उनकी असहमति के बीच भी नेपाल राष्ट्र के प्रति अटूट सम्मान और नमन की भावना सर्वोपरि रहती है। सनातन कि वास्तविकता के वास्तु से बंधी हुई दिखाई दी । वैसे नेपाल मे भी धर्मनिरपेक्षता विदेशीयो के इसारे पर थोपा गया है । जनता अभी हिन्दु राष्ट्र के पक्ष मे ही है ।
यह अंतर स्पष्ट करता है कि भारत के कुछ वर्गों में आज भी *वैचारिक गुलामी’* के अंश मौजूद हैं।
”*विरोध लोकतंत्र का आभूषण* है, लेकिन राष्ट्र की संस्कृति, धर्म और उसकी अखंडता पर हमला लोकतंत्र नहीं, बल्कि वैचारिक अराजकता है।”
3. *डीप स्टेट की भूमिका और औपनिवेशिक मानसिकता*
भारत में कुछ राजनीतिक दल और उनके समर्थक आज भी मानसिक गुलामी के चंगुल से बाहर नहीं निकल पाए हैं। जब भी भारत वैश्विक स्तर पर एक महाशक्ति बनकर उभरता है, तब ‘डीप स्टेट’ (Deep State) से जुड़े बाहरी और आंतरिक तंत्र भारत को अस्थिर करने के लिए सक्रिय हो जाते हैं।
जंतर-मंतर के प्रदर्शनों के पीछे की पटकथा भी इसी साजिश का हिस्सा प्रतीत होती है। जब नीतिगत मुद्दों पर सरकार को घेरने में असफलता मिलती है, तो सांस्कृतिक और सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने का प्रयास किया जाता है।
*शिक्षा मंत्री का इस्तीफा: संवेदनशीलता या बेतुका कदम* ?
हाल ही में शिक्षा व्यवस्था या प्रशासनिक घटनाक्रमों को लेकर शिक्षा मंत्री का त्यागपत्र सामने आया। एक तरफ जहाँ इसे नैतिक जिम्मेदारी और संवेदनशीलता के रूप में देखा जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ कई विश्लेषकों का मानना है कि यह एक बेतुका और अनावश्यक कदम था। जब समस्याएँ प्रायोजित हों, तो त्यागपत्र देने के बजाय दृढ़ता से व्यवस्था को मजबूत करना अधिक तर्कसंगत होता।
4. *विपक्षी दल: बिना पानी की मीन*
वर्तमान परिदृश्य में भारत का विपक्ष एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहाँ उसके पास न तो कोई स्पष्ट दूरदृष्टि (Vision) है और न ही कोई राष्ट्रीय विकल्प।
*दिशाहीनता: जनाधार खिसकने के कारण विपक्षी दल “बिना पानी की मीन* (मछली)” की तरह छटपटा रहे हैं।
*नकारात्मक राजनीति*: सकारात्मक विकल्प देने के बजाय सनातन धर्म पर हमला करना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि धूमिल करने वाले आंदोलनों को हवा देना ही अब उनकी रणनीति का हिस्सा बन गया है।
*निष्कर्ष: आगामी चुनावों पर प्रभाव और मजबूत होती बीजेपी*
इन तमाम साजिशों और नरेटिव्स का धरातल पर उलटा असर पड़ता दिख रहा है।
भारतीय जनता अब सजग है। डीप स्टेट के षड्यंत्र, सनातन पर अनर्गल हमले और विपक्ष की अवसरवादी राजनीति ने आम मतदाताओं को और अधिक एकजुट कर दिया है। आने वाले चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) कमजोर होने के बजाय और अधिक मजबूती के साथ उभरकर सामने आएगी।
*प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संदेश और GenZ का उन्हें मिला अटूट समर्थन इस बात का प्रमाण है कि 21वीं सदी का नया भारत अपनी जड़ों, अपनी संस्कृति और अपने राष्ट्रहित की रक्षा करना भली-भांति जानता है।*
*सर्वेभवन्तु सुखिन:*!

vijay.dutta2011@gmail.com

