Fri. Jul 10th, 2020

भ“वर में है कश्ती

श्रीमन नारायण:नेपाल के चार मुख्य राजनीतिक दलों की रजामन्दी से लाए जा रहे संविधान का विरोध व्यापक रूप में हो रहा है । आनन फानन में संविधान को जारी कर प्रधानमंत्री की कुर्सी एमाले के अध्यक्ष खड्ग प्रसाद शर्मा ओली को सौंपने की तैयारी में जुटे इन सियासी दलों को थारु एवं मधेशियों के द्वारा जारी उग्र विरोध के कारण गहरा झटका लगा है । संघीयता के विषय को हल्के में लेने के कारण अब इन दलों को लेने के देने पड़ रहे हंै ।
संघीयता में जाने की मुख्य वजह यही होती है कि कार्यपालिका, न्यायपालिका एवं व्यवस्थापिका के अधिकारों का विभाजन हो । नेपाल के सत्ताधारी दल नेपाली काँग्रेस एवं एमाले इस हकीकत से रु–व–रु होना हीं नही चाहते । वो जानते हैं कि अधिकारों का विभाजन हो जाने से सदियों से नेपाल के सत्ता प्रतिष्ठान पर कुण्डली मार कर बैठे उनके वर्ग के लोगों को भारी क्षति उठानी होगी । संघीयता के विदू्रप ढाँचे को आगे लाकर इसके प्रति जनता में निराशा फैलाने की दिशा में ये दल उद्धत हैं । कभी अन्धाधुन्ध नगरपालिकाओं की घोषणा करना तो कभी तथाकथित सेवा केन्द्र की स्थापना के नाम पर संघीयता के विषय को ही ठण्डे बस्ते में डालने का काम भी ये दल कर चुके हैं । सिद्धान्ततः ये दोनो दल संघीयता के पक्षधर नही है । शुरु से ही ये लोग इसे राष्ट्र विखण्डन का एक जरिया मानते आए हैं । जब कि देश के बहुसंख्यक आवादी जिसमें मधेसी तथा पहाड़ के आदिवासी एवं जनजाति आते हैं ये शुरु से ही संघीयता के पक्षधर रहे हैं । फिलहाल चार दलों के द्वारा जारी किए गए संघीयता के सीमांकन के प्रारुप का उग्र विरोध मधेसी तथा पहाड़ की जनजातियो के द्वारा हो रहा है । भौगोलिक विकटता एवं अत्याधिक पिछडेÞपन के कारण कर्णाली क्षेत्र के लोग भी अपने लिए एक अलग प्रान्त की चाहत रखते हैं ।
अब तक खुद को मधेसियों से पृथक तथा नेपाली भाषी पहाडि़यो के सदृश आला दर्जा के नागरिक मानकर भ्रम में जी रहे मधेश के थारु भी सड़क पर उतरने को विवश हुए हैं । कल तक नेपाली काँग्रस एवं एमाले के शीर्ष नेताओं के बहकावे में आकर खुद को मधेसी मानने से ही इनकार कर दिया था । गैर सरकारी संस्थाओं से जुडेÞ कुछ थारु बुद्धिजीवियों ने भी अपने को मधेसी मानने से इनकार कर दिया था । मधेसवादी दल के आन्दोलन एवं माँगो के विरोध में ये सड़क पर भी उतरे थे । नतीजतन थारु का मुद्दा कमजोर पड़ता गया । मधेसवादी दलो ने थारुओं को हमेशा से आदिवासी तथा जनजाति माना है । मधेसी में सिर्फ थारु, राजवंशी एवं धानुक आदि जातियाँ अब तक जनजाति एवं आदिवासी जातियाँ मानी जाती रही हैं । मधेसवादी दलो ने जब समग्र मधेश एक प्रदेश का नारा दिया था तब भी सोच यही थी कि पूर्व में झापा से लेकर पश्चिम में कन्चनपुर तक फैले सभी थारु एक जुट होकर अपनी भाषा, संस्कृतिक, विकास ही नही अपितु आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक रूप से भी सबल हो सके परन्तु ये बहकावे में आ गए । जिसे मधेसवादी दल मधेस कहते हंै तथा सत्ताधारी दल के लोग तराई कहते हैं उसे ही थारु लोग थरुहट कहना पसन्द करते हैं । अगर चुरिया पर्वत नीते से लेकर भारत तक की सीमा तथा झापा से लेकर कन्चनपुर तक के भू–भाग को मिलाकर एक प्रदेश कायम की जाती है तथा इसका नाम भले ही थरुहट प्रदेश रहता हो तो किसी को भी कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए । आखिर ये तीनो नाम भूगोल के ही तो है । थारु से सामुदायिकता का बोध नही होता यह एक जाति को दर्शाता है । जबकि मधेसी शब्द अपने आप में सामुदायिकता को दर्शाता है । मधेसी के परिभाषा में हिन्दू, मुस्लिम, सिख, जैन, इसाई भी आते है । परन्तु थारु के सम्बोधन से ऐसा प्रतीत नहीं होता है ।
एमाले ने तो मुसलमानों को भी मधेसी से अलग करने का प्रयास किया परन्तु मुसलमानों को मधेसी से अलग करना लाठी मारकर पानी को अलग करने जैसा है । मुसलमानों की समस्या एवं पीड़ा को मधेसवादी दल ही समझ सकते हैं । बडेÞ दल नहीं । कम से कम धर्मनिरपेक्षता के सवाल पर नेपाली काँग्रेस, एमाले एवं माओवादी के नेताओ ने जो बारबार पलटियाँ मारी है उससे तो सभी को  अहसास भी हो ही गया होगा । वक्त ने थारु एवं मधेशियो को एक ही नाव में सवार होने को मजबूर कर दिया है । किनारा भी सामने है फिर से लगातार अलग दिशा में कश्ती को ले जाने का प्रयास किया जा रहा है और अगर यही हाल रहा तो  डूवना तय है ।

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