त्रिभुवन विश्वविद्यालय में दिन की कक्षाओं से छात्रों की परेशानी, सुबह-शाम कक्षा चलाने की मांग
काठमांडू।
त्रिभुवन विश्वविद्यालय केंद्रीय कैंपस में अध्ययनरत विद्यार्थियों ने अधिकांश विभागों में केवल दिन के समय कक्षाएँ संचालित होने से कठिनाई होने की शिकायत की है। केंद्रीय कैंपस के विद्यार्थियों का कहना है कि दिन में कक्षा में अनिवार्य रूप से उपस्थित रहने के कारण उन्हें रोजगार, इंटर्नशिप, शोध, कौशल विकास तथा अन्य व्यावसायिक गतिविधियों से जुड़ने में परेशानी हो रही है।
केंद्रीय कैंपस में अध्ययनरत विद्यार्थी सविन पोखरेल ने बताया कि दिन के समय कक्षा में उपस्थित रहने की बाध्यता के कारण पढ़ाई छोड़ने तक की स्थिति पैदा हो सकती है। उन्होंने कहा, “मैं इस समय स्नातकोत्तर के दूसरे सेमेस्टर में अध्ययन कर रहा हूँ। सेमेस्टर प्रणाली में 80 प्रतिशत उपस्थिति अनिवार्य है। घर से पैसे नहीं आते। रोजगार से जुड़ने का अवसर नहीं मिल रहा है। यदि कक्षाएँ दोपहर के बजाय सुबह या शाम होतीं तो मैं रोजगार से जुड़ सकता था।”
इसी संदर्भ में विद्यार्थियों ने केवल दिन के सत्र में कक्षा संचालन की व्यवस्था का विकल्प तलाशने की मांग करते हुए त्रिभुवन विश्वविद्यालय के उपकुलपति प्रो. डॉ. भोला थापा का भी ध्यान आकर्षित कराया है। ध्यानाकर्षण पत्र में कहा गया है कि प्रबंधन संकाय के अंतर्गत केंद्रीय प्रबंधन विभाग में संचालित स्नातकोत्तर स्तर (एमबीएस) की कक्षाएँ वर्तमान में केवल दिन के सत्र में संचालित हो रही हैं। विद्यार्थियों के अनुसार यह व्यवस्था उनके शैक्षिक अधिकार, आर्थिक आत्मनिर्भरता, पेशागत विकास तथा समान अवसर के सिद्धांत के अनुरूप नहीं है और इसमें तत्काल पुनर्विचार आवश्यक है।
स्नातकोत्तर स्तर के अधिकांश विद्यार्थी 24 से 30 वर्ष की आयु के हैं। यह ऐसा महत्वपूर्ण चरण है, जब विद्यार्थी पढ़ाई के साथ-साथ रोजगार, इंटर्नशिप, शोध, कौशल विकास तथा अन्य व्यावसायिक गतिविधियों से जुड़कर अपना भविष्य निर्माण करते हैं। लेकिन एमबीएस सहित अन्य कक्षाओं के केवल दिन में संचालित होने के कारण विद्यार्थी इन अवसरों से वंचित हो रहे हैं।
विशेष रूप से नेपाल के विभिन्न जिलों और दुर्गम क्षेत्रों से काठमांडू में उच्च शिक्षा के लिए आए विद्यार्थी कमरे का किराया, दैनिक जीवन-यापन, परिवहन तथा अध्ययन का खर्च पूरा करने के लिए रोजगार पर निर्भर हैं। विद्यार्थियों का कहना है कि दिन के सत्र में कक्षा होने के कारण वे नियमित रोजगार नहीं कर पाते, जिससे वे आर्थिक, मानसिक और शैक्षिक रूप से प्रभावित हो रहे हैं। इसका असर पढ़ाई की निरंतरता, शैक्षिक गुणवत्ता और पेशागत क्षमता के विकास पर भी पड़ रहा है।
केंद्रीय कैंपस में स्नातकोत्तर स्तर पर अध्ययनरत एक विद्यार्थी ने कहा, “कुछ प्राध्यापक, उपप्राध्यापक और सहप्राध्यापक सुबह तथा शाम अन्य कॉलेजों में भी पढ़ाने जाते हैं और दोपहर में यहाँ अध्यापन करने आते हैं। यदि सुबह और शाम के सत्र में भी कक्षाएँ संचालित हों तो हम रोजगार से जुड़ सकते हैं।”
विद्यार्थियों के ध्यानाकर्षण पत्र में कहा गया है कि विद्यार्थियों को अध्ययन के साथ काम करने का अवसर उपलब्ध कराना आधुनिक, समावेशी, लचीली और विद्यार्थी-केंद्रित विश्वविद्यालय प्रणाली की बुनियादी आवश्यकता है। इसलिए एमबीएस की कक्षाओं को केवल डे सिफ्ट तक सीमित करना विद्यार्थियों की आर्थिक आत्मनिर्भरता, प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता और पेशागत विकास के अवसरों को सीमित करने वाला कदम है।
विद्यार्थियों ने प्रबंधन केंद्रीय विभाग के अंतर्गत संचालित एमबीएस की कक्षाओं को मॉर्निंग सिफ्ट और इवनिंग सिफ्ट में संचालित करने की व्यवस्था तत्काल लागू करने तथा नए भवन में एमबीएस की सभी कक्षाएँ यथाशीघ्र शुरू करने की मांग की है।
एमबीएस के विद्यार्थियों ने फीस किस्तों में जमा करने की व्यवस्था तत्काल लागू करने की भी मांग की है। इसके साथ ही विद्यार्थी-केंद्रित, लचीला और समावेशी शैक्षिक वातावरण तैयार करने के लिए कक्षा संचालन, प्रशासनिक सेवाओं तथा शैक्षिक प्रबंधन प्रणाली में समयानुकूल सुधार करने की मांग भी उठाई गई है।
विद्यार्थियों के अनुसार प्रबंधन केंद्रीय विभाग पुस्तकालय विकास शुल्क के नाम पर प्रत्येक विद्यार्थी से प्रत्येक सेमेस्टर 2,500 रुपये लेता है। लेकिन विभागीय पुस्तकालय की सुविधा का नियमित उपयोग विद्यार्थी नहीं कर पा रहे हैं। विद्यार्थियों का कहना है कि सेवा उपलब्ध कराए बिना शुल्क वसूलना विद्यार्थी हित के विरुद्ध और अन्यायपूर्ण है। उन्होंने मांग की है कि विभागीय पुस्तकालय को शीघ्र सभी विद्यार्थियों के लिए नियमित रूप से उपयोग योग्य बनाया जाए।
विद्यार्थियों का कहना है कि विश्वविद्यालय की शिक्षा व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए, जिसमें पढ़ाई के साथ-साथ रोजगार और व्यावसायिक अनुभव हासिल करने के अवसर भी मिल सकें। उनका मानना है कि सुबह और शाम के सत्र शुरू होने से न केवल विद्यार्थियों की आर्थिक समस्याएँ कम होंगी, बल्कि उच्च शिक्षा को अधिक व्यावहारिक, समावेशी और रोजगारोन्मुख बनाने में भी मदद मिलेगी।

