दिशा मिले तो जीवन की ऊर्जा बन जाती है, परिवर्तन की शक्ति : बिमल सरार्फ
बिमल सरार्फ, रक्सौल,12 सितम्बर 2026 । जीवन ठहरने का नहीं, निरंतर आगे बढ़ने का नाम है। इसमें गति है, ऊर्जा है, संभावनाएं हैं और कुछ नया करने की अदम्य क्षमता भी। लेकिन केवल गति पर्याप्त नहीं होती। गति को यदि सही दिशा न मिले तो वही ऊर्जा व्यक्ति को मंजिल तक पहुंचाने के बजाय भटकाव में भी डाल सकती है। इसलिए जीवन की सार्थकता केवल आगे बढ़ने में नहीं, बल्कि सही दिशा में आगे बढ़ने में है।
नदी जब अपने निर्धारित मार्ग पर बहती है तो खेतों को सींचती है, प्यास बुझाती है और जीवन को गति देती है। लेकिन जब उसका प्रवाह रुक जाता है तो वही पानी सड़ने लगता है। मनुष्य का जीवन भी कुछ ऐसा ही है। उद्देश्यहीन और दिशाहीन जीवन धीरे-धीरे अपनी संभावनाओं को खो देता है। जिस ऊर्जा से समाज के लिए कुछ सार्थक किया जा सकता था, वही ऊर्जा चिंता, निराशा, असंतोष और आत्मसंघर्ष में व्यर्थ होने लगती है।
हर व्यक्ति के भीतर कोई न कोई क्षमता और प्रतिभा अवश्य होती है। जरूरत उसे पहचानने और सही दिशा देने की है। जीवन में सद्गुरु, शिक्षक, माता-पिता, मार्गदर्शक अथवा कोई प्रेरणादायी व्यक्तित्व इसी भूमिका का निर्वहन करते हैं। वे भटके हुए मन को दिशा देते हैं, चंचल विचारों को स्थिर करते हैं और बिखरी हुई ऊर्जा को किसी सार्थक उद्देश्य से जोड़ते हैं। सही मार्गदर्शन मिलने पर सामान्य-सा दिखने वाला व्यक्ति भी असाधारण कार्य करने की क्षमता विकसित कर सकता है।
आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत प्रतिभाओं को खोजने, पहचानने और तराशने की है। प्रतिभा केवल धन या संसाधनों का दूसरा नाम नहीं है। संपत्ति किसी को विरासत में मिल सकती है, संयोग से प्राप्त हो सकती है अथवा किसी अवसर के माध्यम से हासिल हो सकती है, लेकिन प्रतिभा व्यक्ति की अपनी अर्जित क्षमता है। अध्ययन, संघर्ष, अनुभव, अनुशासन और निरंतर प्रयास से विकसित हुई प्रतिभा ही व्यक्ति के व्यक्तित्व को वास्तविक ऊंचाई देती है।
समाज और राष्ट्र के परिवर्तन के लिए केवल एक प्रकार की प्रतिभा पर्याप्त नहीं होगी। हमें हर क्षेत्र में सक्षम और संवेदनशील लोगों की आवश्यकता है। ऐसे विद्वान चाहिए, जो तर्क और प्रमाण के आधार पर समाज को नई सोच दें। कलाकार और रचनाकार चाहिए, जो अपनी सृजनशीलता से लोगों के हृदय को स्पर्श करें। वैज्ञानिक चाहिए, जो नई खोजों के माध्यम से मानव जीवन को बेहतर बनाएं। शिक्षक चाहिए, जो आने वाली पीढ़ी को केवल शिक्षा नहीं, बल्कि संस्कार और दृष्टि भी दें।
समाज को ऐसे संपन्न लोगों की भी आवश्यकता है, जो अपनी संपदा को केवल सुख-सुविधाओं और विलासिता पर खर्च करने के बजाय लोकहित का साधन बनाएं। ऐसे राजनीतिज्ञ चाहिए, जो राजनीति को व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा नहीं, बल्कि जनसेवा का माध्यम मानें और जनहित की योजनाओं को ईमानदारी से धरातल पर उतारें। सामाजिक कार्यकर्ताओं और युवाओं की ऐसी पीढ़ी चाहिए, जो समस्याओं की चर्चा करने के साथ उनके समाधान का हिस्सा भी बने।
वास्तविक युग-परिवर्तन तब होगा, जब व्यक्ति अपनी प्रतिभा को केवल अपनी सफलता तक सीमित न रखकर उसे समाज के हित से जोड़ देगा। एक दीपक स्वयं सीमित स्थान को रोशन करता है, लेकिन जब अनेक दीपक एक साथ जलते हैं तो अंधकार का स्वरूप ही बदल जाता है। उसी प्रकार जब अलग-अलग क्षेत्रों की प्रतिभाएं एक उद्देश्य के साथ आगे बढ़ेंगी, तो सामाजिक परिवर्तन की एक नई धारा तैयार होगी।
हमें यह समझना होगा कि प्रतिभाएं अचानक पैदा नहीं होतीं। उन्हें अवसर चाहिए, प्रोत्साहन चाहिए, मार्गदर्शन चाहिए और सबसे बढ़कर उन्हें विश्वास चाहिए कि उनकी क्षमता समाज के लिए महत्वपूर्ण है। जिस प्रकार वर्षा की पहली बूंदों के साथ धरती में छिपे बीज अंकुरित होकर खेतों को हरियाली से भर देते हैं, उसी प्रकार उचित वातावरण और अवसर मिलने पर प्रतिभाएं भी समाज में नई चेतना का संचार कर सकती हैं।
इसलिए आज आवश्यकता केवल यह पूछने की नहीं है कि समाज हमें क्या दे रहा है, बल्कि यह सोचने की है कि हमारी ऊर्जा, हमारी योग्यता और हमारी प्रतिभा समाज को क्या दे सकती है। जीवन की वास्तविक सफलता स्वयं आगे बढ़ने में नहीं, बल्कि अपने साथ दूसरों को भी आगे बढ़ाने में है।
गतिशीलता जीवन का स्वभाव है, ऊर्जा उसकी शक्ति है और सही दिशा उसकी सार्थकता। जब व्यक्ति की प्रतिभा, ऊर्जा और उद्देश्य एक साथ जुड़ते हैं, तब वही जीवन व्यक्तिगत उपलब्धि से आगे बढ़कर समाज-निर्माण और युग-परिवर्तन की शक्ति बन जाता है।


