Fri. Oct 9th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

नेपाल का प्रलय ः चित्कारता हिमालय और भारत–चीन का साझा दायित्व : संतोष मेहता

 

नेपाल–चीन सीमावर्ती रसुवा क्षेत्र में भदौ १०(अगस्त २६) की प्रातः काल जो भयानक प्रलयकारी बाढ़ सीमा पार से प्रवेश कर नीचे बह निकली, उसे केवल एक आकस्मिक प्राकृतिक आपदा या मौसम का अल्पकालिक विपर्यय समझ लेना अपनी आंखों पर अज्ञान की पट्टी बांधने के समान है । यह घटना वस्तुतः हिमालय के अति–संवेदनशील एवं जटिल भूगोल, तीव्र गति से मंडराते जलवायु परिवर्तन, सीमा–पार विस्तृत विशाल जलसम्भर प्रणाली, अव्यवस्थित बुनियादी ढांचे के अनियंत्रित विस्तार और मानव जाति की संकीर्ण विकास–दृष्टि का मिला–जुला भीषण परिणाम है ।

हिमाली नदियों में आने वाली विनाशकारी बाढ़ महज उफनते पानी का असामान्य बहाव नहीं होती; वह दरअसल प्रकृति और आधुनिक मानव सभ्यता के बीच दरकते, चरमराते और बिगड़ते संबंधों की एक भयानक दृश्य अभिव्यक्ति है । हम सदियों से बहती नदियों और अटल खड़े पर्वतों को एक स्थिर, बेजान वस्तु मानकर अपनी विकास योजनाओं का खाका खींचते आ रहे हैं । इस भ्रामक दंभ में कि नदियों को बांधा जा सकता है, पहाड़ों को छिन्न–भिन्न कर रास्ते बनाए जा सकते हैं और हिमालय के महान जोखिमों को अपनी सीमित इंजीनियरिंग गणनाओं में कैद किया जा सकता है, हमारा आधुनिक विकास मॉडल निरंतर विनाश की ओर अग्रसर है । परंतु हिमालय कोई निर्जीव या स्थिर भूभाग नहीं है; यह एक निरंतर स्पंदित, अत्यंत संवेदनशील और सूक्ष्मता से अंतर–संबंधित प्राकृतिक चेतना तंत्र है, जहां एक ग्लेशियर का खिसकना या तापमान का एक अंश भी बढ़ना पूरे हिमवत क्षेत्र को झकझोर देता है ।

वैश्विक आंकड़ों पर यदि निष्पक्ष दृष्टि डाली जाए, तो यह कड़वी सच्चाई सामने आती है कि चीन और भारत मिलकर संपूर्ण विश्व के कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का लगभग एक–तिहाई (३३–३४%) हिस्सा उत्सर्जित करते हैं । इन दो विशाल पड़ोसी देशों द्वारा हो रहे अत्यधिक औद्योगिक कार्बन उत्सर्जन और वैश्विक तापन का सबसे पहला और भीषण प्रहार इसी नाजुक हिमालयी क्षेत्र पर पड़ रहा है । इसके साथ ही, चीन द्वारा विकास और बुनियादी ढांचे के विस्तार के नाम पर हिमालयी सीमावर्ती एवं तिब्बती पठारी क्षेत्रों में जो भारी उत्खनन, सुरंग निर्माण और अव्यवस्थित हलचलें की जा रही हैं, वे हिमालय की रीढ़ को अंदर से खोखला कर रही हैं । इन अनुचित गतिविधियों के कारण ग्लेशियरों का संतुलन बिगड़ रहा है, हिम–विस्फोट (न्ीइ) हो रहे हैं और अप्रत्याशित बाढ़ की स्थितियां बार–बार पैदा हो रही हैं। यह प्रलय केवल प्रकृति का तांडव नहीं, बल्कि विकास के नाम पर किए जा रहे मानवीय अत्याचारों का उत्तर है ।

यह भी पढें   नबिल बैंक की 42वीं वार्षिक साधारण सभा संपन्न: 15.80% लाभांश का प्रस्ताव पारित

पूर्वीय चेतना और प्रकृति का सह–अस्तित्व

पूर्वीय दार्शनिक विरासत ने कभी भी प्रकृति को मानव से पृथक या मनुष्य के उपभोग की निर्जीव सामग्री नहीं माना। उपनिषदों का अद्वैत दर्शन यह उद्घोष करता है कि संपूर्ण अस्तित्व एक ही चेतना के सूत्र में पिरोया हुआ है; बौद्ध दर्शन का ‘प्रतीत्यसमुत्पाद’ यह सिखाता है कि कोई भी घटना स्वतंत्र रूप से घटित नहीं होती बल्कि वह अंतर–संबंधित कारणों का एक जाल है; और ताओवादी चिंतन प्रकृतिक प्रवाह के साथ पूर्ण सामंजस्य में जीने का मार्ग दिखाता है। पश्चिमी दार्शनिक अर्ने नेस का ‘डीप इकोलॉजी’ सिद्धांत भी इसी सत्य की पुष्टि करता है कि मनुष्य पारिस्थितिक तंत्र का स्वामी नहीं, केवल एक विनम्र घटक है । परंतु विडंबना यह है कि आधुनिक युग में हमने इन सांस्कृतिक मूल्यों को भुलाकर नदियों को केवल मेगावाट बिजली और पहाड़ों को केवल कंक्रीट की खदान समझ लिया है । जब हम किसी नदी पर विशाल बांध बनाते हैं या पहाड़ों की छाती चीरकर सड़कें बनाते हैं, तो हम केवल एक भौतिक संरचना का निर्माण नहीं कर रहे होते, बल्कि लाखों वर्षों से बने एक नाजुक संबंध–तंत्र में हिंसक हस्तक्षेप कर रहे होते हैं ।

प्रकृति में कोई भी तबाही अचानक या शून्य से प्रकट नहीं होती; वह तो ऊर्जा, दबाव और भौतिक अवस्थाओं के क्रमिक संचय का अंतिम परिणाम होती है । जब ग्लेशियर पिघलते हैं, तो हिमझीलों का जल स्तर और दबाव बढ़ता है, पहाड़ों की आंतरिक संरचना ढीली पड़ती है और भूस्खलन की ऊर्जा संचित होती चली जाती है । भारत के उत्तराखंड (चमोली) की त्रासदी हो या सिक्किम में तीस्ता नदी के जलविद्युत बांध का ताश के पत्तों की तरह ढह जाना– ये सभी इस बात के प्रमाण हैं कि प्राकृतिक सीमाओं को लांघने का मूल्य कितना भयानक होता है । जब जोखिम भरे क्षेत्रों में हम अनियंत्रित सड़कें, होटल और बांध बनाते हैं, तो केवल प्रकृतिक जोखिम ही नहीं बढ़ता, बल्कि सामाजिक–आर्थिक तबाही की ऊर्जा भी एकत्रित होती जाती है ।

यह भी पढें   आज का पंचांग: आज दिनांक 6 अक्टुबर 2026 मंगलवार शुभसंवत् 2083

सिस्टम्स दृष्टिकोणः सीमा–पार की परस्पर निर्भरता

भौतिकविद फ्रिटजोफ काप्रा का ‘द वेब ऑफ लाइफ’ और क्वांटम प्रणालीगत दृष्टिकोण हमें यह समझाता है कि इस ब्रह्मांड में सब कुछ एक–दूसरे से अटूट रूप से जुड़ा हुआ है । नेपाल की लगभग सभी प्रमुख नदियों का जलसम्भर (कैचमेंट एरिया) और हिमझीलें अंतरराष्ट्रीय सीमाओं, विशेषकर चीन–शासित तिब्बत क्षेत्र में फैली हुई हैं । तिब्बत के पठार पर होने वाली जÞरा सी पर्यावरणीय हलचल या चीन की तरफ की विकास गतिविधियां नेपाल और भारत के निचले मैदानी इलाकों में जल प्रलय ला सकती हैं । जल का प्रवाह किसी देश की राजनीतिक सीमाओं या नक्शों को नहीं पहचानता । अतः नदी प्रबंधन और आपदा निवारण को केवल किसी एक देश का आंतरिक प्रशासनिक विषय मान लेना भारी भूल है । यदि इस प्राकृतिक तबाही के दुचक्र से बचना है, तो चीन, नेपाल और भारत के बीच वैज्ञानिक डेटा के तुरंत आदान–प्रदान, हिमझीलों की सतत उपग्रह निगरानी और वास्तविक समय पर आधारित पूर्व–सूचना प्रणाली (च्भब–ितष्mभ भ्बचथि ध्बचलष्लन क्थकतझ) की सीमा–पार संयुक्त व्यवस्था अनिवार्य रूप से स्थापित करनी होगी ।

हिमवत–पूर्वीय सभ्यतागत एलायंस का ऐतिहासिक आह्वान

जलवायु परिवर्तन की इस भीषण विभीषिका और पश्चिमी उपभोक्तावादी विकास मॉडल से उपजे वैश्विक संकट का मुकाबला करने के लिए अब समय आ गया है कि भारत और चीन अपनी आपसी राजनीतिक कटुता, सीमा विवाद और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा से ऊपर उठकर एक ऐतिहासिक ‘हिमवत–पूर्वीय सभ्यतागत एलायंस’ (ज्ष्mबखबत–भ्बकतभचल ऋष्खष्ष्शिबतष्यलब िब्ििष्बलअभ) का निर्माण करें । हिमालय कोई साधारण पर्वत श्रृंखला नहीं है; यह भारत, चीन, नेपाल, भूटान और पूरे दक्षिण–पूर्व एशिया की अरबों आबादी की जीवनरेखा, जल–सुरक्षा और सांस्कृतिक पहचान का केंद्र बिंदु है । जब तक भारत और चीन पश्चिमी पूंजीवादी और औद्योगिक विकास के विनाशकारी ढर्रे पर एक–दूसरे से आगे निकलने की दौड़ में अंधे रहेंगे, तब तक हिमालय की यह देवभूमि झुलसती और धंसती रहेगी । इस सभ्यतागत गठबंधन का मूल उद्देश्य केवल व्यापार या कूटनीति नहीं, बल्कि प्राचीन पूर्वीय ज्ञान–परंपरा– जहाँ प्रकृति को ‘माता’ और पूज्य माना गया है– को आधुनिक पारिस्थितिकीय विज्ञान के साथ जोड़कर एक नया विकास–दर्शन गढ़ना होना चाहिए ।

यह भी पढें   सिकल्स हाइड्रोपावर 13.38 प्रतिशत लाभांश वितरित करेगी।

भारत और चीन, जो विश्व के सबसे बड़े कार्बन उत्सर्जक भी हैं और सर्वाधिक आबादी वाले पड़ोसी भी, यदि मिलकर हिमालयी पारिस्थितिकी के संरक्षण के लिए एक साझा नीति बनाते हैं, तो यह न केवल इस क्षेत्र के जीवन की रक्षा करेगा बल्कि संपूर्ण विश्व को जलवायु न्याय का एक नया मार्ग दिखाएगा । इस एलायंस के तहत हिमालयी क्षेत्र में किसी भी बड़े निर्माण से पूर्व निष्पक्ष सीमा–पार पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन (व्यष्लत भ्क्ष्ब्), अनियंत्रित और आक्रामक बुनियादी ढांचा निर्माण पर सीमा–पार प्रतिबंध, ग्लेशियर अनुसंधान का साझा कोष और शून्य–कार्बन हरित विकास की साझा रणनीतियों को लागू किया जाना चाहिए । भारत और चीन का यह सभ्यतागत मिलन हिमालय के विशाल जल संसाधनों और पारिस्थितिकी तंत्र की ढाल बनकर वैश्विक पर्यावरण संरक्षण में एक युगांतरकारी नेतृत्व प्रस्तुत कर सकता है ।

हिमालय को जीतने या उसका दोहन करने का दंभ भरने वाली सभ्यताएं अंततः अपनी ही सीमाओं से टकराकर नष्ट हो जाती हैं, जबकि हिमालय की पुकार को सुनकर उसके साथ संवाद और सह–अस्तित्व स्थापित करने वाली सभ्यताएं ही एक सुरक्षित, स्थायी और समृद्ध भविष्य का निर्माण कर सकती हैं । रसुवा में आई बाढ़ कोई एक मामूली प्राकृतिक दुर्घटना नहीं थी; यह पूरी मानव सभ्यता को, विशेषकर भारत और चीन को हिमालय द्वारा दी गई एक अंतिम चेतावनी है । प्रश्न अब यह है कि क्या हम इस चित्कार को सुनकर अपने विकास–दर्शन को बदलने का साहस करेंगे, या फिर पुरानी गलतियों को दोहराते हुए अपनी ही भावी पीढि़यों के विनाश की पटकथा लिखते रहेंगे ?

संतोष मेहता

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

WP2Social Auto Publish Powered By : XYZScripts.com